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अनचाही कॉल्स Editorial page 22nd July 2018

By: D.K Chaudhary
अनचाही कॉल्स और मेसेज से परेशान लोग इन पर रोक लगने की उम्मीद को एक बार फिर अपने भीतर जिंदा कर सकते हैं। दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने इसे लेकर नए नियम बनाए हैं, जिनके मुताबिक किसी भी व्यावसायिक, टेलिमार्केटिंग या उनके लिए काम करने वाली कंपनी को कॉल या संदेश भेजने से पहले उपभोक्ता की मंजूरी लेना अनिवार्य होगा। उपभोक्ता के सामने कंपनी को मंजूरी देने या न देने का विकल्प रखा जाएगा, वह भी थोड़े समय के लिए। 
अनचाही कॉल्स को रोकने के लिए ट्राई ने ब्लॉकचेन तकनीक का इस्तेमाल करने को कहा है। इसे अमल में लाने पर ग्राहकों का ब्योरा केवल अधिकृत लोगों को ही मिल सकेगा। अभी देश में हर दिन 100 करोड़ के लगभग अनचाही कॉल और संदेश भेजे जाते हैं, जो लोगों के लिए किसी सिरदर्दी से कम नहीं है। यात्रा, बैठक या अन्य जरूरी कामों के बीच ऐसे फोन आकर हमें परेशानी में डाल देते हैं। यूपीए सरकार के दौरान जब प्रणब मुखर्जी वित्त मंत्री थे, तब उनके पास भी होम लोन के लिए फोन आया करते थे। उनके झल्लाहट जाहिर करने के बाद अनचाही फोन कॉल्स का मुद्दा जोरशोर से उठा था। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि इन पर रोक लगाने में ट्राई अब तक बिल्कुल नाकाम रहा है। 2010 में उसने डू-नॉट-डिस्टर्ब (डीएनडी) सुविधा के जरिए अनचाही कॉल रोकने की कोशिश की थी, जिसके तहत 23.54 करोड़ से ज्यादा ग्राहकों ने रजिस्ट्रेशन कराकर खुद को अनचाही कॉलों से मुक्त रखने की इच्छा व्यक्त की थी। फिर भी उन्हें ऐसी कॉलों से छुटकारा नहीं मिल सका। नियमों के अनुसार सिर्फ रजिस्ट्रर्ड टेलिमार्केटिंग कंपनियां ही ग्राहकों को मार्केटिंग के लिए कॉल कर सकती हैं। 

अक्टूबर 2016 के आंकड़ों के अनुसार देश में 11,350 टेलि मार्केटिंग कंपनियां ट्राई के साथ रजिस्टर्ड हैं जबकि 2.86 लाख गैर-पंजीकृत टेलिमार्केटर्स को ट्राई द्वारा नोटिस भेजा गया। सोचा जा सकता है कि टेलिमार्केटिंग का गैर-कानूनी कारोबार कितने बड़े पैमाने पर चल रहा है। सचाई यह है कि टेलिकॉम कंपनियों के सहयोग के बिना यह धंधा चल ही नहीं सकता। फिर भी उनके खिलाफ ट्राई ने कोई सख्त कारवाई नहीं की है। टेलिमार्केटिंग का गैर-कानूनी कारोबार डेटा के अवैध लेन-देन पर निर्भर है। इससे ग्राहकों का डेटा बाजार में नीलाम हो रहा है। 

अनेक शहरों में छोटी-छोटी कंपनियां सक्रिय हैं जिनके पास आम लोगों के मोबाइल नंबरों का डेटाबेस है। इन छोटी कंपनियों को ‘डू नॉट कॉल’ के दायरे में लाना आसान नहीं है। इसके अलावा लोग खरीदारी करने या गाड़ी की सर्विसिंग कराने जाते हैं तो वहां अपनी जरूरी सूचनाएं छोड़ते हैं। ये कंपनियां भी गाहे-बगाहे फोन और मेसेज करना शुरू कर देती हैं। इन्हें कैसे रोका जाए, यह भी एक सवाल है। सिर्फ नियम बनाने से कुछ नहीं होने वाला। एक सख्त निगरानी तंत्र की जरूरत है जो इस बात पर नजर रखे कि नियमों का पालन कड़ाई से हो रहा है या नहीं।

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