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Geography

1. ब्रह्मांड की उत्पत्ति: बिग बैंग थ्योरी

2. ब्रह्मांड के घटक : तारे, तारामंडल व आकाशगंगा

3. सौर प्रणाली

4. सौर मण्डल और इसके ग्रहों की जानकारी

5. क्षुद्रग्रह, धूमकेतु, एवं एवं उल्का पिंड

6.         ग्रहण

7. अंतरिक्ष अन्वेषण

8. मानक समय और समय क्षेत्र

9. अक्षांश, देशांतर, ताप कटिबन्ध और समय निर्धारण का तरीका

10. पृथ्वी की आंतरिक संरचना व चट्टानों के प्रकार

11. पृथ्वी – एक परिचय

12. पृथ्वी की संरचना

13. पृथ्वी की धरातलीय संरचनाये

14. भारत का भूगोल

15. भारत का प्रशासनिक विभाजन

16. भारत की अवस्थिति एवं विस्तार

17. भारत के पड़ोसी देशों व स्थलीय सीमा रेखाओं के नाम

18. भारत का भौतिक विभाजन

19. उत्तर भारत के मैदान का संरचनात्मक विभाजन

20. भारत के द्वीप समूह: अंडमान और निकोबार व लक्षद्वीप

21. भारत का पूर्वी तटीय मैदान

22. भारत का पश्चिमी तटीय मैदान

23. भारत का पश्चिमी तटीय मैदान

24. भारत का पश्चिमी घाट पर्वतीय क्षेत्र

1. ब्रह्मांड की उत्पत्ति: बिग बैंग थ्योरी

ऐसा विश्वास किया जाता है कि ब्रम्हांड की उत्पत्ति लगभग 15 अरब साल पहले घने, गर्म बूँद के रूप में शुरु हुआ था. इस अवधि के दौरान, ब्रह्मांड केवल हाइड्रोजन और हीलियम की एक छोटी राशि से निर्मित था. साथ ही कोई तारे और ग्रहों का उस समय किसी भी प्रकार का कोई अस्तित्व नहीं था. जब यह ब्रह्मांड 100 मिलियन साल पुराना हुआ तो तारों का उद्भव शुरू हुआ जिसमे केवल हाइड्रोजन गैस ही स्थित था. लगभग इसी प्रक्रिया से 4490000000 साल पहले सूर्य की उत्पत्ति की प्रक्रिया शुरू हुई थी.

बिग बैंग थ्योरी

जार्ज लेमैत्रे (1927) ने ही ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के संदर्भ में एक सिद्धांत का प्रतिपादन किया था जिसे बिग बैंग सिद्धांत कहा जाता है. बिग बैंग सिद्धांत के द्वारा ही ब्रह्मांड की उत्पत्ति और ब्रह्मांड के विस्तार की परिकल्पना प्रमाणित है.

अतीत में, ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मांड सघन और गर्म  था. पुरा ब्रह्मांड एक छोटे से बिंदु के अन्दर समाहित था और इसी से पूरे ब्रह्मांड का उदभव माना जाता है. ब्रह्मांड के प्रारंभिक विस्तार के बाद,  ब्रहमांड के ज़मने की प्रक्रिया की शुरुआत हुई. जिसकी वजह से सुब-एटोमिक कणों की रचना हुई. ये सब-एटोमिक कण इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन से मिलकर बने हुए थे. कणों की बहुलता के कारण ही बाद में हाइड्रोजन का निर्माण हुआ और बाद में हीलियम और लिथियम का निर्माण भी संभव हुआ. इन्ही कणों के बाद में संगठित होने की वजह से तारों और ग्रहों का निर्माण संभव हुआ. इनमें मौजूद भारी पदार्थों का इन तारों या सुपरनोवा के अन्दर विश्लेषण हुआ और इनके बनने में भी इन प्रक्रियायों की भारी भूमिका रही. इसलिए, बिग बैंग सिद्धांत ब्रह्मांड की प्रारंभिक स्थिति की व्याख्या नहीं करता, लेकिन इसके यह ब्रह्मांड के सामान्य विकास का वर्णन करता है.

आइन्स्टीन की जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी (General Theory of Relativity) विज्ञान के चमत्कारिक सिद्धांतों में से एक है, और चीजों को देखने का हमारा नज़रिया पूरी तरह बदल देती है. इस थ्योरी को समझना हालांकि अत्यन्त मुश्किल है लेकिन फिर भी इससे ब्रहमांड की उत्पत्ति के संदर्भ में अनेक सुराख़ मिलते हैं.

यह एडविन हब्बल थे जिन्होंने वर्ष 1929 में यह बताया कि सभी गैलेक्सी एक दूसरे से सिकुड़ रहे हैं. उन्होंने इस बात को भी बताया कि दूरस्थ की आकाशगंगाओं के मध्य आपसी सम्बन्ध होता है. और वे रेड्शिफ्ट के माध्यम से एक-दूसरे से सम्बंधित होती हैं. यद्यपि ब्रहमांड की उत्पत्ति के सन्दर्भ में दो सिद्धांतों बिंग-बैंग सिद्धांत और स्टेडी स्टेट थ्योरी मौजूद थें. लेकिन वर्ष 1964 में, कॉस्मिक माइक्रोवेव पृष्ठभूमि विकिरण की खोज के साथ ही बिग बैंग सिद्धांत की पुष्टि की गयी थी. 1992 में, कॉस्मिक बैकग्राउंड एक्स्प्लोरर के लांचिंग के बाद यह पता चला कि ब्रहमांड की उत्पत्ति के प्रथम अवधि में ही इसकी कुल ऊर्जा का 99.7% ऊर्जा उन्मुक्त हो चूका था. इससे यह प्रमाणित होता है कि ब्रहमांड की उत्पत्ति सिर्फ एक विस्फोट का परिणाम थी. जिसकी वजह से इसका नाम बिग-बैंग पड़ा. और इस विस्फोट होने वाले पदार्थ का घनत्व,तापमान और भार काफी अधिक था. यह तथ्य बिग बैंग सिद्धांत की पुष्टि करता है.

 

2. ब्रह्मांड के घटक : तारे, तारामंडल व आकाशगंगा

यह माना जाता है कि हमारा ग्रह पृथ्वी करीब 4.5 अरब  वर्ष पहले अस्तिव में आया था | वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर जीवन का आरंभ करीब 3.5 अरब वर्ष पहले हुआ था।

तारे

तारे गर्म गैसों के बहुत बड़े पिंड होते है और उनसे आग की बहुत बड़ी– बड़ी लपटें निकलती रहती हैं। साथ ही यह बहुत बड़ी मात्रा में ताप और प्रकाश का भी विकिरण करते हैं। इसलिए उनके पास खुद का ताप और प्रकाश होता है। तारों की दूरी प्रकाश वर्ष में मापी जाती है। एक प्रकाश वर्ष का अर्थ होता है- एक वर्ष में प्रकाश द्वारा तय की जाने वाली दूरी। प्रकाश की गति से 3,00,000 किमी/से. होती है| प्रकाश वर्ष दूरी की इकाई है और इसका मान 9,460,000,000,000 किमी या 9.46×1012 किमी. के बराबर होता है।

तारे का रंग उसके सतह के तापमान से निर्धारित होता है। कम तापमान वाले तारे लाल रंग के दिखते हैं, अधिक तापमान वाले तारे सफेद और बहुत अधिक तापमान वाले तारे नीले रंग के दिखाई पड़ते हैं। सूर्य समेत सभी तारे किसी–न–किसी खगोलीय पिंड या पिंडों के समूह के इर्द–गिर्द बहुत तीव्र गति से परिक्रमा करते हैं। हालांकि, पृथ्वी से देखने पर बहुत अधिक गति होने के कारण किन्हीं भी दो तारों के बीच की दूरी बदलती हुई नहीं प्रतीत होती। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि तारे हमसे बहुत दूर स्थित हैं और उनके बीच की दूरी में किसी भी प्रकार का बदलाव को बहुत लंबे समय बाद ही महसूस किया जा सकता है|

तारे पूर्व से पश्चिम की तरफ घूमते प्रतीत होते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पृथ्वी अपने केंद्र के मध्य से गुजरने वाले काल्पनिक अक्ष पर पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर घूमती है। पृथ्वी 24 घंटों में एक परिक्रमा पूरी कर लेती है और तारे भी। इसलिए एक तारा, चार मिनटों में करीब एक डिग्री कोणीय दूरी  तय करता है। चूंकि तारे हर दिन चार मिनट पहले उगते है इसलिए वे पिछले दिन की तुलना में आसमान में एक डिग्री ऊँचे दिखाई देते हैं। इस तरह एक महीने में वे 30 डिग्री तक उपर उठ जाते हैं और 6 महीनों में वे 180 डिग्री तक आगे बढ़ जाएंगे और पश्चिमी क्षितिज के करीब होंगे। इसलिए तारामंडल/नक्षत्र (Constellations) भी पश्चिम की ओर बढ़ता है।

हालांकि एक तारा है जो हमें हमेशा स्थिर दिखाई देता है, इसे पोल स्टार या ध्रुव तारा कहते हैं। उत्तरी तारा या पोलरिस उत्तर की ओर इशारा करता है क्योंकि इसे हमेशा उत्तरी ध्रुव के उपर देखा जा सकता  है। यह पृथ्वी के घूर्णन अक्ष के करीब स्थित होने के कारण यह अन्य तारों की तरह घूमता हुआ प्रतीत नहीं होता है । वास्तव में, सभी तारे पोल स्टार/ ध्रुव तारा के चारों तरफ घूमते दिखाई देते हैं। ध्रुव तारा दक्षिणी गोलार्द्ध से दिखाई नहीं देता है । कुछ अन्य उत्तरी तारामंडलों/नक्षत्रों, जैसे अर्सा मेजर, को भी दक्षिणी गोलार्द्ध के कुछ स्थानों से नहीं देखा जा सकता है।

तारों की उम्र लाखों– करोड़ों वर्ष होती है और ज्यादातर तारे संलयन प्रक्रिया द्वारा अपनी ऊर्जा का उत्पादन करते हैं। जब एक तारा अपने केंद्र में उपस्थिति सम्पूर्ण हाइड्रोजन का उपयोग कर लेता है, तब वह कार्बन में हीलियम को मिलाना/संलयित करना  शुरु कर देता है। अगर एक तारे का द्रव्यमान ,सौर द्रव्यमान का सिर्फ कुछ गुणा हो, तो संलयन की यह प्रक्रिया तारे तक ही सीमित रहती है। तारे के भीतर ऊर्जा के उत्पादन के बंद होते ही ये सिकुड़ जाता है। इसका घनत्व बहुत अधिक हो जाता है और यह श्वेत वामन तारा (whitedwarf star) बन जाता है।

श्वेत वामन तारे का आकार एक ग्रह के बराबर होता है। ऐसे तारों का द्रव्यमान हमेशा सूर्य के द्रव्यमान के करीब 1.44 गुने से  कम होता है। इस सीमा को एक भारतीय एस. चंद्रशेखर ने सिद्ध किया था, इसलिए इसे चंद्रशेखर सीमा कहा जाता है। एक श्वेत वामन तारा मृत तारा होता है, क्योंकि संलयन की प्रक्रिया द्वारा यह स्वयं की ऊर्जा का उत्पादन नहीं करता है। यह अपने जीवनकाल के दौरान खुद में संचित ताप के विकिरण से चमकता है।

बड़े श्वेत वामन तारे सुपरनोवा की तरह विस्फोट करते हैं और अपने आकार के अनुसारन्यूट्रॉन स्टार या ब्लैक होल (जिसमें गुरुत्वाकर्षण की शक्ति इतनी अधिक होती है कि प्रकाश भी उसमें से बाहर नहीं आ सकता) बन जाता है।

तारामंडल

तारों के समूह जो अलग– अलग प्रकार की आकृति बनाते हैं, तारामंडल कहलाते हैं। लघु सप्तऋषि या अर्सा माइनर इसी प्रकार का एक तारामंडल है। वृहद सप्तऋषि, जिसे अर्सा मेजर भी कहा जाता है, दूसरे तारामंडल में स्थित सात तारों का समूह है। यह बिग बीयरतारामंडल के एक हिस्से का निर्माण करता है। गर्मी के मौसम में पूर्व-रात्रि में इसे देखा जा सकता है।

ओरियन या मृग भी एक प्रसिद्ध तारा समूह है, जिसे सर्दियों के के मौसम में देर रात को देखा जा सकता है। आसमान का सबसे बड़ा तारा, स्टार सिरियस ओरियन के करीब स्थित है। उत्तरी आसमान में दिखाई देने वाला एक और प्रमुख तारा– समूह है –कैसियोपिया । यह सर्दियों के मौसम में रात के शुरु होने पर दिखाई देता है।

एक तारा समूह में सिर्फ 5–10 तारे ही नहीं होते हैं बल्कि इसमें बहुत बड़ी संख्या में तारे होते हैं। हालाँकि हम अपनी नंगी आंखों से तारासमूह के सिर्फ कुछ चमकीले तारों को ही देख सकते हैं। तारामंडल का निर्माण करने वाले सभी तारे एक ही दूरी पर स्थित नहीं होते हैं।

आकाशगंगा

आकाशगंगा तारों की एक व्यवस्था है जिसमें बड़ी संख्या में गैस के बादल पाये जाते हैं, जिनमें से कुछ तो  बहुत विशाल  होते हैं। गैस के बने इन्हीं बादलों में नए तारों का जन्म होता है और गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा ये आपस में जुड़े रहते हैं। एक आकाशगंगा में एक दूसरे के करीब रहने वाले अरबों तारे शामिल होते हैं और ब्रह्मांड में ऐसी अरबों आकाशगंगाएं हैं। कुछ आकाशगंगाएं आकार में सर्पिलकार हैं और तो कुछ अण्डाकार। हालांकि, कुछ ऐसी आकाशगंगाएं भी हैं जिनका कोई निश्चित आकार नहीं है।

हमारी आकाशगंगा आसमान के एक छोर से दूसरी छोर की ओर बहने वाली प्रकाश की नदी के समान दिखती है। इसलिए इसे मिल्की वे गैलेक्सी कहा जाता है। यह आकार में सर्पिलाकार  है। भारत में इसे आकाशगंगा के नाम से जाना जाता है। मिल्की वे गैलेक्सी अपने केंद्र पर बहुत धीमी गति से घूर्णन कर रही है। सौर प्रणाली के साथ सूर्य भी आकाशगंगा के केंद्र के चारो तरफ घूमता है। एक परिक्रमा पूरा करने में करीब 250 मिलियन वर्ष लग जाते हैं। हमारा सूर्य मिल्की वे गैलेक्सी में मौजूद अनेक तारों में से सिर्फ एक तारा है। सूर्य आकाशगंगा के केंद्र से करीब 30,000 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है।

बीसवीं सदी के आरंभ में, अमेरिकी खगोल विज्ञानी एडविन हबल (1889– 1953) ने यह बताया था कि अन्य सभी आकाशगंगाएं हमारी आकाशगंगा से दूर जा रही हैं। जिस वेग के साथ वे हमसे दूर जा रही हैं, हमसे दूरी बढ़ने के साथ उसमें बढ़ोतरी हुई है। हमसे दूर वाली आकाशगंगाओं की गति ने ब्रह्मांड के विस्तार के विचार को जन्म दिया है। इस समय अगर सभी आकाशगंगाएं एक दूसरे से दूर जा रही हैं, इसका मतलब है कि अतीत में एक समय ऐसा भी रहा होगा जब सभी आकाशगंगाएं एक ही स्थान पर एक साथ रही हों।

उस समय पूरे ब्रह्मांड का विस्तार क्षेत्र छोटा था। उस समय हुई घटना जिसने आकाशगंगाओं को एक दूसरे से दूर करने का काम किया उसे बिग बैंग कहते हैं। माना जाता है कि उस समय एक बहुत बड़ा विस्फोट हुआ होगा और तब से ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है।

एक अनुमान के अनुसार यह घटना करीब 15 अरब वर्ष (15×109) पहले हुई थी। इसका अर्थ है कि ब्रह्मांड करीब 15 अरब वर्ष पुराना है। कुछ वैज्ञानिक ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि ब्रह्मांड हर समय और हर बिन्दु पर एक जैसा ही दिखता है। उनके अनुसार ब्रह्मांड बदल नहीं रहा है, इसका कोई आरंभ नहीं हुआ और न ही कोई अंत होगा। इस सिद्धांत को स्थिरअवस्था (Steady State) कहते हैं।

 

3. सौर प्रणाली

सौर मंडल सूर्य और उन सभी पदार्थों को संगठित करता है जो इसका चक्कर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगाते रहते हैं. इन पदार्थों के अंतर्गत धूमकेतु और क्षुद्रग्रहों की तरह ग्रहों, बौने ग्रहों और छोटे सौर प्रणाली से सम्बंधित निकायों को शामिल किया जाता हैं. सूरज और उसके ग्रहीय मण्डल को मिलाकर हमारा सौर मण्डल बनता है.  इन पिंडों में आठ ग्रह, उनके 166 ज्ञात उपग्रह, पाँच बौने ग्रह और अरबों छोटे पिंड शामिल होते हैं.

सौर प्रणाली की संरचना

सौर मंडल का मुख्य भाग सूर्य होता है. सूर्य अपने ज्ञात द्रव्यमान का 99.86% होता है और इसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति इस पर हावी होती है. सूर्य की चार गैस से बने गृह (बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेप्च्यून) शेष द्रव्यमान का 99% बनाते है. इन चार गैस से बने ग्रहों में से, बृहस्पति और शनि एक साथ मिलकर अधिक से अधिक 90% भाग को संगठित करते हैं. इसलिए, सौर प्रणाली का ठोस भाग इसके कुल भार का या कुल द्रव्यमान का 0.0001% संगठित करता हैं.

सौर मंडल के चार छोटे आंतरिक ग्रह बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल ग्रह जिन्हें स्थलीय ग्रह कहा जाता है, मुख्यतया पत्थर और धातु से बने होते हैं. इसमें क्षुद्रग्रह का घेरा, चार विशाल गैस से बने बाहरी गैस दानव ग्रह, काइपर घेरा और बिखरा चक्र शामिल हैं. काल्पनिक और्ट बादल भी सनदी क्षेत्रों से लगभग एक हजार गुना दूरी से परे मौजूद हो सकता है. सूर्य से होने वाला प्लाज़्मा का प्रवाह (सौर हवा) सौर मंडल को भेदता है. यह तारे के बीच के माध्यम में एक बुलबुला बनाता है जिसे हेलिओमंडल कहते हैं, जो इससे बाहर फैल कर बिखरी हुई तश्तरी के बीच तक जाता है.

सौर मंडल का गठन

सौरमंडल का गठन एक विशाल आणविक बादल के छोटे से हिस्से के गुरुत्वाकर्षण पतन के साथ 4.6 अरब साल पहले शुरू होने का अनुमान किया जाता है. अधिकांश द्रव्यमान केंद्र में एकत्र हुआ, सूर्य को बनाया, जबकि बाकी एक प्रोटोप्लेनेटरी डिस्क में सिमट गया जिसमे से ग्रहों, चन्द्रमाओं, क्षुद्रग्रहों और अन्य छोटे सौरमंडलीय निकायों का निर्माण हुआ. आदिग्रह चक्र या प्रोटोप्लैनॅटेरी डिस्क या प्रॉपलिड एक नए जन्में तारे के इर्द-गिर्द घूमता घनी गैस का चक्र होता है. कभी-कभी इस चक्र में जगह-जगह पर पदार्थों का जमावड़ा हो जाने से पहले धूल के कण और फिर ग्रह जन्म ले लेते हैं.

 

4. सौर मण्डल और इसके ग्रहों की जानकारी

सौर मंडल में सूर्य का वर्चस्व है क्योंकि यह पूरे सौर मंडल के करीब 99.9% पदार्थ के लिए जिम्मेदार है। पृथ्वी के लिए यह प्रकाश और ताप का स्रोत है। वैज्ञानिकों का मानना है कि गैसों के गतिशील बादलों, जिसे नेबुला कहा जाता है, से सूर्य और ग्रहों का निर्माण हुआ है। गुरुत्वाकर्षण बल के कारण इनका निर्माण हुआ है। लाखों वर्षों से भी अधिक समय से, धूल और गैसों के बने ये गोले सूर्य के इर्द–गिर्द घूम रहे हैं।

सूर्य अपने चारों तरफ परिक्रमा करने वाले आठ ग्रहों (बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेप्च्यून), उपग्रहों, क्षुद्रग्रहों, उल्का और धूमकेतुओं के साथ सौरमंडल के केंद्र में स्थित है। अपने द्रव्यमान और वजन से सूर्य ग्रहों की गति को नियंत्रित करता है। यह बल गुरुत्वाकर्षण बल कहलाता है।

2006 ई. तक सौरमंडल में नौ ग्रह थे। प्लूटो सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह था। 2006 ई. में, अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (आईएयू) ने ग्रहों की नई परिभाषा को अपनाया जिसके अनुसार प्लूटो ग्रहों की इस परिभाषा के दायरे में नहीं आता है । इसलिए अब इसे सौरमंडल का ग्रह नहीं माना जाता है। अतः वर्तमान में ग्रहों की संख्या आठ रह गयी है |

सूर्य

ऐसा माना जाता है कि सूर्य का जन्म 5 अरब वर्ष पहले हुआ था। उसी समय से, यह लगातार बहुत बड़ी मात्रा में ताप और प्रकाश का उत्सर्जन कर रहा है और आगामी 5 अरब वर्षों तक इसके इसी तरह से ताप और प्रकाश के उत्सर्जन करते रहने की उम्मीद है। सूर्य अनिवार्य रूप से गर्म गैसों का एक क्षेत्र है। सूर्य की डिस्क को फोटोस्फेयर भी कहते हैं । फोटोस्फेयर के उपर की गैस की परत बहुत अधिक गर्म होती हैं लेकिन उनका घनत्व बहुत कम है। ये परतें बहुत हल्की हैं और सूर्य के डिस्क से निकलने वाले तीव्र प्रकाश की उपस्थिति में दिखाई नहीं देतीं। पूर्ण सूर्यग्रहण के समय, जब सूर्य के डिस्क की रोशनी पूरी तरह से रुक जाती है, इसकी सबसे बाहरी परत दिखाई देने लगती है। यह सूर्य के चारो तरफ एक ताज जैसी दिखाई देती है। इस परत को कोरोना कहते हैं।

सूर्य की त्रिज्या (रेडियस) पृथ्वी की त्रिज्या से करीब 100 गुना अधिक है और इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान से करीब दस लाख गुना अधिक है। सूर्य हमारा निकटतम तारा है। सूर्य की रोशनी को हम तक पहुंचने में करीब 8.3 प्रकाश मिनट लगते हैं। सूर्य के सबसे निकटतम तारे (प्रॉक्सिमा या अल्फा सेंटुअरी) की रोशनी पृथ्वी पर करीब 4.3 प्रकाश वर्षों में पहुंचती है।

ग्रह

ग्रह वास्तव में सूर्य के चारों तरफ अंडाकार पथ पर परिक्रमा कर रहे हैं जिसे कक्षा कहा जाता है । ग्रहों की अपनी धुरी के चारों तरफ की गति घूर्णन कहलाती है और सूर्य के चारों तरफ की गति परिक्रमा कहलाती है । तारों के समान ग्रहों में स्वयं की रोशनी और ताप नहीं होता है । प्लैनेट (ग्रह) शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द प्लैनेटिया से हुआ है, जिसका अर्थ है- ‘यात्री’। तारों के सापेक्ष ग्रह अपनी स्थिति बदलते रहते हैं।

  • बुधःयह सूर्य के सबसे नजदीक स्थित और सौर मंडल का सबसे छोटा ग्रह है। इसका आकार और द्रव्यमान करीब–करीब चंद्रमा के बराबर है। सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में यह 88 दिन लगाता है। अपनी धुरी पर यह 59 दिनों में एक बार परिक्रमा पूरी कर लेता है। इसका कोई उपग्रह नहीं हैं। बुध ग्रह पर कोई वायुमंडल भी नहीं है इसकी सतह चट्टानों और पहाड़ों से बनी हुई है। सूर्य की तरफ पड़ने वाली ग्रह की सतह को सबसे अधिक ताप और प्रकाश मिलता है, जबकि ग्रह के दूसरी तरफ की सतह को कभी भी सूर्य का प्रकाश या ताप नहीं मिलता। इसलिए बुध का एक हिस्सा बहुत अधिक गर्म तो दूसरा हिस्सा बहुत ही अधिक ठंडा है।
  • शुक्रःइसका भी कोई उपग्रह नहीं है। यह अपनी धुरी पर असामान्य रूप से अर्थात पूर्व से पश्चिम की तरफ घूमता है। शुक्र ग्रह का द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 4/5 गुना है। सूर्य की परिक्रमा में इसे 255 दिन और अपनी धुरी पर एक परिक्रमा पूरी करने में 243 दिन का समय लगता है। इसलिए अक्सर इसे ‘भोर या सांझ का तारा कहा जाता है। इस ग्रह पर वायुमंडल है, जिसमें मुख्य रूप से कार्बन-डाई-ऑक्साइड गैस है। यह सौर मंडल का सबसे गर्म ग्रह है।
  • पृथ्वीःपृथ्वी पश्चिम से पूर्व की तरफ घूमती है। हमारी पृथ्वी एक गोले के जैसी है, जो उत्तर और दक्षिण में अर्थात ध्रुवों पर थोड़ी सी चपटी है। ध्रुवों पर थोड़ा चपटा होने के कारण पृथ्वी को जियॉड्स जिसका मतलब पृथ्वी जैसे आकार का होता है, के तौर पर वर्णित किया जाता है। सूर्य का यह तीसरा सबसे निकटतम ग्रह है। पानी की उपस्थिति के कारण पृथ्वी को नीला ग्रह भी कहा जाता है। अंतरिक्ष से देखने पर पृथ्वी रंग में नीली– हरी दिखाई देती है। पृथ्वी ही एक मात्र ऐसा ग्रह है जहां अस्तित्व और जीवन की निरंतरता के लिए कुछ विशेष वायुमंडलीय परिस्थितियां विद्यमान हैं। यहां उचित तापमान, पानी, मिट्टी, खनिज, उपयुक्त वातावरण और ओजोन की परत आदि पायी जाती है, जो इस ग्रह पर जीवन को संभव बनाती है।
  • मंगलःइसका आकार पृथ्वी के आकार का करीब आधा है। सूर्य की परिक्रमा करने में इसे करीब 687 दिन और अपनी धुरी की एक परिक्रमा करने में इसे एक दिन लगता हैं। यह हल्का लाल रंग का दिखता है और इसलिए इसे लाल ग्रह भी कहा जाता है। मंगल के दो छोटे प्राकृतिक उपग्रह  हैं – फोबोस और डीमोस ।
  • बृहस्पतिःयह सौर मंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। सूर्य की परिक्रमा करने में इसे 11 वर्ष और 11 माह का समय लगता है, जबकि अपनी धुरी पर यह 9 घंटे 56 मिनट में एक परिक्रमा पूरी कर लेता है। इसके 16 उपग्रह हैं। इसके चारो तरफ धुंधले छल्ले भी दिखाई देते हैं। लाल रंग का बड़ा सा धब्बा इसकी सबसे अलग विशेषता है। अपने अधिक द्रव्यमान के कारण अपने आस– पास से गुजरने वाली अन्य वस्तुओं पर यह बहुत मजबूत गुरुत्वाकर्षण बल लगाता है। गैसीय रूप में हाइड्रोजन और हीलियम इस ग्रह पर मौजूद हैं। बाहरी क्षेत्र के बादलों में गैसीय रूप में मीथेन पाया जाता है जबकि अमोनिया क्रिस्टलीय रूप में मौजूद है।
  • शनिःबृहस्पति के बाद शनि ग्रह स्थित है, जो पीले रंग का दिखाई देता है। तीन खूबसूरत छल्ले इसे सौर मंडल में अलग बनाता है। सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में इसे 29 वर्ष 5 महीने का समय लगता है और अपनी धुरी पर यह 10 घंटे 40 मिनट में एक परिक्रमा पूरी कर लेता है। इसके 18 उपग्रह हैं। सभी ग्रहों में शनि सबसे कम सघन है। इसका घनत्व पानी से भी कम है। आकार, द्रव्यमान और संरचना में यह बृहस्पति से छोटा है। हालांकि यह बृहस्पति की तुलना में ठंडा है।
  • अरुण/यूरेनसःटेलिस्कोप की मदद से खोजा जाने वाला यह सबसे पहला ग्रह था। वर्ष 1781 में विलियम हर्शेल ने टेलिस्कोप की मदद से इसे खोजा था। यूरेनस के वायुमंडल में हाइड्रोजन और मीथेन पाए गए हैं। यह पूर्व से पश्चिम की ओर घूमता है। सबसे अधिक झुका हुआ अक्ष यूरेनस की सबसे उल्लेखनीय विशेषता है। परिणामस्वरुप, अपनी कक्षीय गति में यह अपनी तरफ घूमता दिखाई देता है। सूर्य की एक परिक्रमा करने में इसे 84 वर्ष लगते हैं जबकि अपनी धुरी पर यह एक परिक्रमा 17 घंटे 14 मिनट में पूरी कर लेता है। इसके 17 उपग्रह हैं।
  • नेपच्यूनःसूर्य की एक परिक्रमा करने में इसे 164 वर्ष और अपनी धुरी पर एक परिक्रमा पूरी करने में 16 घंटे 7 मिनट का समय लगता है। इसके 8 उपग्रह हैं।

 

5. क्षुद्रग्रह, धूमकेतु, एवं एवं उल्का पिंड

क्षुद्रग्रह

क्षुद्रग्रह, जिन्हे अप्रधान ग्रह या ऐस्टरौएड भी कहा जाता है, सौरमंडल मे विचरण करने वाले ऐसे खगोलिय पिंड है जो आपने आकार मे ग्रहो से छोटे और उल्का पिंडो से बडे होते हैं. ये सौर प्रणाली के निर्माण के समय बने चट्टानी पिंड हैं. इनकी स्थिति अधिकांशतः मंगल और बृहस्पति के बीच पाई जाती है. वज्ञानिकों के अनुसार यें क्षुद्रग्रह बड़े पैमाने पर सैकड़ों किलोमीटर विस्तृत क्षेत्र में सूर्य की परिक्रमा करते हैं. वज्ञानिकों का एक वर्ग यह विश्वास करता हैं की ये क्षुद्रग्रह गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण ही इन ग्रहों के बीच आज भी चक्कर लगा रहे हैं. उनका यह भी मानना है की अतीत में इन क्षुद्रग्रहों के लम्बे काल तक पृथ्वी से टक्कर के कारण पृथ्वी के निर्माण में मदद मिली है. उल्लेखनीय है की यह टक्कर आज भी हो रहे हैं जैसा कि अभी हाल ही में रूस में इस तरह की घटना हुई है जिसमे काफी मात्रा में नुकसान भी हुआ है.

धूमकेतु

धूमकेतु अपेक्षाकृत छोटे  एवं अनिश्चित आकार के पिंड होते हैं. ये सौर प्रणाली के निर्माण की प्रक्रिया के दौरान ही निर्मित हुए थे और आज भी विद्यमान हैं. ये वे सौर मंडलीय निकाय हैं जो पत्थर, घूल, बर्फ और गैस के बने हुए छोटे-छोटे खंड होते हैं. धूमकेतु की नाभि का विस्तार १०० मीटर से लेकर ४० किलोमीटर से अधिक तक माना जाता है. धुमकेतू में विभिन्न प्रकार के कार्बनिक यौगिक भी होते है. इनमे मिथेनोल, हाइड्रोजन साइनाइड, फोर्मेलड़ेहाइड, इथेनोल और इथेन जैसे कार्बनिक यौगिकों के साथ कुछ अम्ल भी पाए जाते हैं. जब धूमकेतु सूर्य के नजदीक आता है तो सौर-विकिरण के प्रभाव से इसके उपरी सतह की गैसों का वाष्पीकरण हो जाता है. धूमकेतू के तीन मुख्य भाग होते हैं अर्थात नाभि,कोमा और पूंछ. इनकी यह विशेषता होती है की जब ये सूर्य से दूर होते हैं तो ठन्डे होते हैं लेकिन जैसे ही सूर्य के नजदीक  आते है वाष्पीकृत हो जाते हैं. जिसके परिणामस्वरूप बहुत बड़ी मात्रा में निकलने वाली धूल और गैस की यह धारा धुमकेतू के चारों ओर अत्यंत कमजोर वातावरण बनाती है जिसे कोमा कहा जाता है.

कुछ धूमकेतू का पथ परबलयाकार होता है और वो मात्र एक बार ही दिखाई देते है। लम्बे पथ वाले धूमकेतू एक परिक्रमा करने में हजारों वर्ष लगाते है अधिकतर धूमकेतुओ का कक्षीय पथ दीर्घवृत्ताकार होता है और गति करने के दौरान ये ग्रहों की कक्षा का अतिक्रमण करते है और दूसरो ग्रहों की कक्षाओं में प्रवेश कर जाते हैं. धूमकेतु अपनी एक कक्षा पूरा करने के लिए अधिक से अधिक 30 लाख साल का समय लेते हैं. वैज्ञानिको का यह मानना है कि लाखो साल पूर्व पृथ्वी से इनकी बार-बार टक्कर ने पृथ्वी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

उल्का और उल्कापिंड

आकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का और साधारण बोलचाल में टूटते हुए तारेअथवालूका कहते हैं. अंतरिक्ष में भ्रमण करते समय  क्षुद्रग्रह अक्सर एक दुसरे से टक्कर करते रहते हैं और टक्कर के दौरान ही छोटे-छोटे अवशेषों में टूट जाते हैं. ये इस रूप में भ्रमण करते हैं जैसे की सौर प्रणाली के अंग हों. उल्लेखनीय है की उल्काओं का जो अंश वायुमंडल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुँचता है उसे उल्कापिंड कहते हैं अधिकांश उल्कापिंडचट्टानी संरचना के बने होते हैं और आकर में अत्यंत छोटे होते हैं. अधिकांशत: लोहे, निकल या मिश्रधातुओं से बने होते हैं और कुछ सिलिकेट खनिजों से बने पत्थर सदृश होते हैं. कभी-कभी इनका आकार एक बास्केटबॉल से भी बड़ा होता है. इनकी संरचना में विविधता पाई जाती है जिसकी वजह से उल्कापिंडों का  वर्गीकरण उनके संगठन के आधार पर किया जाता है. कुछ पिंड धात्विक और कुछ आश्मिक उल्कापिंड कहे जाते हैं. इसके अतिरिक्त कुछ पिंडों में धात्विक और आश्मिक पदार्थ प्रायः सामान मात्र में पाए जाते हैं उन्हें धात्वाश्मिक उल्कापिंड कहते हैं.

 

6.    ग्रहण

ग्रहण तभी होता है जब किसी पिंड की तरफ जाने वाला प्रकाश स्रोत बंद हो जाता है और हमारी आँखों की तरफ आने वाला प्रकाश स्रोत प्रतिबंधित हो जाता है जिससे हमें उस पिंड का कोई भी हिस्सा नहीं दिखाई देता. ग्रहण के कई कारण हो सकते है जैसे हो सकता है के दो पिंडो के बीच कोई दुसरा पिंड आ जाये या उस पिंड से आने वाला प्रकाश स्रोत बंद हो जाये. इसी तरह सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण होते हैं. उल्लेखनीय है की जब सूर्य और पृथ्वी के बीच चन्द्रमा आता है तो सूर्य से पृथ्वी पर आने वाला प्रकाश प्रतिबंधित हो जाता है और सूर्य ग्रहण लगता है. इसी तरह जब सूर्य और चन्द्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है तो सूर्य से चन्द्रमा पर पहुँचाने वाला प्रकाश स्रोत पृथ्वी के द्वारा प्रतिबंधित हो जाता है और चन्द्र ग्रहण की स्थिति बनती है. दोनों प्रकार के ग्रहण के बारे में विस्तृत जानकारी निम्नवत दी जा रही है.

चंद्र ग्रहण

चंद्रग्रहण उस खगोलीय स्थिति को कहते हैं जब चंद्रमा पृथ्वी के ठीक पीछे उसकी प्रच्छाया में आ जाता है। अर्थात चूँकि चन्द्रमा का आकार छोटा होता है इसलिए वह पृथ्वी के द्वारा थोड़े प्रकाश के ही प्रतिबंधित करने के कारण अंधकारमय हो जाता है ऐसा तभी हो सकता है जब सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा इस क्रम में लगभग एक सीधी रेखा में अवस्थित हों। इस ज्यामितीय प्रतिबंध के कारण चंद्रग्रहण केवल पूर्णिमा की रात्रि को घटित हो सकता है। चंद्रग्रहण का प्रकार एवं अवधि चंद्र आसंधियों के सापेक्ष चंद्रमा की स्थिति पर निर्भर करते हैं। पूर्ण  ग्रहण के दौरान चंद्रमा पूरी तरह से धुंधला नहीं हो पाता लेकिन लाल हो जाता है. इस स्थिति में चन्द्रमा का रंग और चमकीलापन पृथ्वी के वायुमंडल और उसकी स्थिति पर निर्भर करता है. चूँकि चन्द्रमा का स्वयं का कोई प्रकाश होता नहीं है इसलिए सूर्य से पृथ्वी पर जाने वाला प्रकाश पृथ्वी द्वारा अपवर्तित कर दिया जाता है जिससे चन्द्रमा थोडा बहुत प्रकाशित रहता  है

सूर्यग्रहण

सूर्य और पृथ्वी के बीच जैसे ही चन्द्रमा आता है इस घटना को सूर्य ग्रहण कहा जाता है. सूर्य ग्रहण तीन प्रकार के होते हैं जिन्हें पूर्ण सूर्य ग्रहण, आंशिक सूर्य ग्रहण व वलयाकार सूर्य ग्रहण कहते हैं. यह घटना सर्वदा अमावस्या के दिन घटित होती है. जब सूर्य व पृथ्वी के बीच में चन्द्रमा आ जाता है तो चन्द्रमा के पीछे सूर्य का बिम्ब कुछ समय के लिए ढ़क जाता है, उसी घटना को सूर्य ग्रहण कहा जाता है. अक्सर चन्द्रमा, सूरज के सिर्फ़ कुछ हिस्से को ही ढ़कता है. यह स्थिति खण्डग्रहण कहलाती है। पूर्ण-ग्रहण के समय चाँद को सूरज के सामने से गुजरने में दो घण्टे लगते हैं. 1968 में लार्कयर नामक वैज्ञानिक नें सूर्य ग्रहण के अवसर पर की गई खोज के सहारे वर्ण मंडल में हीलियम गैस की उपस्थिति का पता लगाया था. ध्यान रहे है कि सम्पूर्ण सूर्यग्रहण की वास्तविक अवधि अधिक से अधिक 11 मिनट ही हो सकती है उससे अधिक नहीं.

प्राचीन समय और कुछ संस्कृतियों में आज भी सूर्य ग्रहण को राहू और केतु से जोड़ा जाता है. अर्थात यह माना जाता है की राहू और केतु द्वारा ग्रसित करने के कारण ही सूर्य ग्रहण लगता है. जबकि यह परम्परा आज के वज्ञानिक युग में नहीं मानी जाती है.

वस्तुतः प्राचीन परंपरा के अनुसार आज भी सूर्य ग्रहण के लिए निम्न स्थितियों का होना अत्यंत जरुरी होता है जैसे- उस दिन पूर्णिमा या अमावस्या(क्रमशः चाँद के पुर्णतः एवं पुर्णतः नहीं दिखायीं देने की अवस्था) होनी चाहिये, चन्दमा का रेखांश राहू या केतु के पास होना चाहिये,चन्द्रमा का अक्षांश शून्य के निकट होना चाहिए.

उल्लेखनीय है की सूर्यग्रहण अधिकतम 10 हजार किलोमीटर लम्बे और 250 किलोमीटर चौडे क्षेत्र में ही देखा जा सकता है.

अन्य ग्रहण

वस्तुतः एक छोटी वस्तु का उससे बड़े आकर की किसी वस्तु द्वारा ढकने की अवस्था को ही आमतौर पर प्रच्छादन कहा जाता है. चन्द्रमा के द्वारा प्रच्छादन करने की प्रक्रिया को ही काफी लम्बे काल तक चंद्रमा की सटीक स्थिति को जानने के लिए इस्तेमाल किया जाता था.

 

7. अंतरिक्ष अन्वेषण

अंतरिक्ष अन्वेषण का तात्पर्य है खगोलविदों द्वारा उन्नत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के माध्यम से बाह्य अंतरिक्ष में आकाशीय पिंडों की निरंतर खोज और अन्वेषण करना. इसके अंतर्गत खगोलविदों के द्वारा अंतरिक्ष की दूरबीन के द्वारा अध्ययन, और रोबोट के माध्यम से जांच-पड़ताल की जाती है. इस प्रक्रिया में मानव स्पेस-क्राफ्ट का भी इस्तेमाल किया जाता है.

कई बार अंतरिक्ष की खोज के साथ-साथ इन स्पेस-क्राफ्ट का इस्तेमाल शीत युद्ध के समय देशों के बीच एक एजेंट के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.

अंतरिक्ष अन्वेषण का इतिहास

  • 4 अक्टूबर 1957 को, पहले मानव निर्मित ऑब्जेक्ट स्पुतनिक-1 को पूर्व सोवियत संघ के द्वारा पृथ्वी की परिक्रमा के लिए लांच किया गया था.
  • 20 जुलाई 1969 को, अमेरिकन यान अपोलो-11 नें सर्वप्रथम चंद्रमा पर कदम रखा था.
  • वर्ष 1961 में सोवियत-संघ नें अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम के अंतर्गत पहला मानव अंतरिक्ष यान वोस्तोक-1 को भेजा था जिसके साथ यूरी गागरिन भी गए थे.
  • अगले वर्ष 18 मार्च 1965 को अलेक्सेई लेनेव द्वारा प्रथम स्पेस-क्राफ्ट को लांच किया गया था. इसके बाद पहला स्वचालित लैंडिंग ऑब्जेक्ट 1966 ईस्वी में लांच किया गया. इसके बाद वर्ष 1971 में पहली बार अंतरिक्ष स्टेशन सैल्युत-1 को अंतरिक्ष में स्थापित किया गया.

बाद में, अंतरिक्ष की खोज के लिए ध्यान केंद्रित किया गया और अंतरिक्ष शटल कार्यक्रम की शुरुआत की गयी.

वर्ष 1998 के दौरान प्रथम अमेरिकन अंतरिक्ष स्टेशन, अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) को अंतरिक्ष में स्थापित किया गया. यह स्टेशन रूसी प्रोटोन और सोयुज रोकेट की ही तरह था. अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) एक ऐसा प्रयोगशाला है जिसमे वैज्ञानिक समुदाय के माध्यम से अनेक खगोलिकी, जीव विज्ञान, भौतिक विज्ञान, आदि से सम्बंधित अनुसन्धान किये जाते हैं.

अक्टूबर 1942 को 3, जर्मन वैज्ञानिकों के द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वी-2 रॉकेट का परीक्षण करते समय, अंतरिक्ष ए-4 में एक कृत्रिम वस्तु को रखने में सफलता प्राप्त की गयी थी. इस युद्ध के बाद, अमेरिका ने भी जर्मन वैज्ञानिकों से अनुसंधान के क्षेत्र में उनके रॉकेट से मदद ली. 10 मई 1946 को  पहली ब्रह्मांडीय विकिरण प्रयोग अमेरिका के द्वारा वी-2 रॉट से लान्च किया गया. यह अंतरिक्ष से पृथ्वी की छवियों को लेने की पहली घटना थी. इसी तरह वैज्ञानिक अन्वेषण हेतु वर्ष 1947 में, पहली बार जानवर एवं मधुमक्खियों पर प्रयोग हेतु संशोधित वि-2s  यान को लांच किया गया.

वर्ष 1947 में ही रूस के वैज्ञानिकों ने जर्मनी के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर, अपने स्वयं के यान के साथ-साथ उप कक्षीय वी-2 रॉकेट का शुभारंभ किया. इस लांच का मुख्य उद्देश्य विकिरण का पशुओं पर प्रयोग था.

 

8. मानक समय और समय क्षेत्र

मानक समय एक आम समय का मानक होता है जो विविध भौगोलिक क्षेत्रों के समय के निर्धारण में इस्तेमाल किया जाता है. यह मध्याह्न रेखा पर निर्भर करता है. मानक समय की इस अवधारणा के आनुसार पृथ्वी को दो भागों में अर्थात पूर्वी गोलार्ध और पश्चिमी गोलार्ध. इस मानक रेखा के ठीक विपरीत रेखा को इंटरनेशनल डेटलाइन के नाम से जाना जाता है. इस रेखा के उद्भव के साथ ही अन्य प्रधान मध्याह्न रेखाओं के इस्तेमाल को बंद कर दिया गया.

11 दिसंबर 1847 में, ब्रिटिश रेलवे ने पहली बार एक मानकीकृत समय प्रणाली का इस्तेमाल किया था. चूँकि जगह जगह के समय प्रणाली में काफी अंतर होता था और उनके भौगोलिक विविधता की वजह से समय के निर्धारण में समस्या का सामना करना पड़ता था. अतः ग्रीनविच मीन टाइम (जीएमटी) का इस्तेमाल जरुरी हो गया था.

संयुक्त राज्य अमेरिका में, पेनसिल्वेनिया रेलरोड में सर्वप्रथम “एलेघेनी टाइम” प्रणाली का इस्तेमाल किया था. इस समय प्रणाली की इस्तेमाल वस्तुतः खगोलीय समय प्रणाली को व्यवस्थित रखने के लिए किया जाता था.  इसकी खोज पिट्सबर्ग के एलेघनी वेधशाला में शमूएल पिएर्पोर्ट  लैंगली द्वारा की गयी थी. नीदरलैंड के एम्स्टर्डम में  मई 1909 में डच टाइम को सबसे पहली बार प्रस्तुत किया गया था.

टाइम जोन एक ऐसा क्षेत्र होता है जिसमें स्थिरता होती है और जिसका इस्तेमाल  कानूनी, वाणिज्यिक और सामाजिक उद्देश्यों के लिए एक सुसंगत मानक समय के निर्धारण के लिए किया जाता था. साथ ही यह माना जाता था कि यह रेखा लंदन में रॉयल वेधशाला को पार करती है. बाद में, सभी सरकारी संस्थाओं के द्वारा रेडियो समय का समन्वित वैश्विक समय (यूटीसी),  के साथ सामंजस्य बनाते हुए इस्तेमाल किया जाने लगा. यह टाइम एक प्रकार का एटोमिक समय हैं जोकि .9 सेंकंड तक के समय को भी बरकरार रखने के लिए लीप इयर का इस्तेमाल करती थी. इस समय प्रणाली को अब (यूनिवर्सल टाइम 1) समय प्रणाली कहा जाता है.

वर्त्तमान में कई देशों के द्वारा कानूनी तौर पर यूटीसी के लिए अपने मानक समय का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन अभी भी बहुत से ऐसे देशों जैसे यूनाइटेड किंगडम के द्वारा जीएमटी का इस्तेमाल किया जाता है. यूटीसी को ज़ुलु समय के रूप में भी जाना जाता है. इस समय प्रणाली का इस्तेमाल सभी खगोलविदों के द्वारा वर्त्तमान में किया जाता है और साथ ही उन देशों के द्वारा भी जोकि कुछ घटनाओं के सन्दर्भ में घटित होते हैं,  व्यवस्थित करने की जरूरत होती है, द्वारा दुनिया भर में प्रयोग किया जाता है.

यह सत्य है की टाइम जोन पूरी तरह से प्रधान मध्यान्ह रेखा पर निर्भर होती है. अर्थात सौर समय जीएमटी पर आधारित होता हैं. वर्तमान में अब परमाणु घड़ियों से व्युत्पन्न समय प्रणाली को इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें UT1 के एक सेकंड के स्तर तक को व्यवस्थित किया जाता है जैसे की पृथ्वी की धुर्णन गति स्थिर नहीं होती है. जीएमटी और परमाणु समय दोनों के समय में काफी हद तक संतुलन रहता है. परमाणु घड़ियों की रीडिंग एक सुसंगत समय प्रदान करने के लिए की जाती है.

9. अक्षांश, देशांतर, ताप कटिबन्ध और समय निर्धारण का तरीका

पृथ्वी चपटे अंडाकार आकृति की है। इसलिए बिना गणितीय प्रणाली का उपयोग किए इस पर स्थानों का पता लगाना मुश्किल है। पृथ्वी पर दो अलग– अलग बिन्दुएं हैं– उत्तरी ध्रव और दक्षिणी ध्रुव। इन दो बिन्दुओं की मदद से भूमध्य रेखा खींचना संभव है, क्योंकि यह दोनों ध्रुवों के बिल्कुल बीच में स्थित है। पृथ्वी की सतह पर स्थानों का सटीक पता लगाने के लिए ग्लोब पर रेखाओं का नेटवर्क खींचा जाता है। क्षैतिज रेखाएं अक्षांश रेखाएं हैं और ऊर्ध्वाधर रेखाएं देशांतर रेखाएं हैं। ये रेखाएं एक दूसरे को आपस में समकोण पर काटती हैं और एक नेटवर्क बनाती हैं जिसे ग्रिड (Graticule) कहते हैं। ग्रिड पृथ्वी की सतह पर स्थानों का सटीक पता लगाने में हमारी मदद करती है।

अक्षांश

हमारी पृथ्वी अपने केंद्र से गुजरने वाले काल्पनिक अक्ष पर लगातार घूमती रहती है। इस अक्ष का उत्तरी छोर उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी छोर दक्षिणी ध्रुव कहलाता है। सबसे बड़ा संभावित वृत्त जिसे ग्लोब पर खींचा जा सकता है, वह है भूमध्य रेखा (Equator)। यह ग्लोब को दो समान हिस्सों में बाँट देता है। इसका उत्तरी आधा हिस्सा उत्तरी गोलार्द्ध और दक्षिणी आधा हिस्सा दक्षिणी गोलार्द्ध कहलाता है। चूंकि दोनों में से किसी भी ध्रुव से भूमध्य रेखा की दूरी पृथ्वी के गोल चक्कर का एक चौथाई है, इसे इस प्रकार मापा जाएगा – 360o का ¼ यानि 900। इस प्रकार 900 उत्तरी अक्षांश उत्तरी ध्रुव को और 900 दक्षिणी अक्षांश दक्षिणी ध्रुव को बताता है।

भूमध्यरेखा के समानांतर काल्पनिक रेखाओं का एक सेट खींचा गया है जो पृथ्वी को घेरता है और पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर घूमता है। इन्हें अक्षांश (latitudes) कहा जाता है। चूंकि ये सभी रेखाएं भूमध्य रेखा के साथ– साथ एक दूसरे के भी समानांतर होती हैं, इसलिए इन्हेंअक्षांश समानांतर कहा जाता है। अक्षांश किसी स्थान की भूमध्यरेखा से कोणीय दूरी है, जो या तो उत्तर या दक्षिण दिशा में होता है। इसे किसी भी ध्रुव की दिशा में भूमध्य रेखा से अंशों (डिग्री) में मापा जाता है। एक अंश (0) को साठ बराबर हिस्सों में बांटा जाता है और प्रत्येक इकाई को एक मिनट (‘) कहते हैं। एक मिनट को फिर साठ बराबर हिस्सों में बांटा जाता है और प्रत्येक इकाई को एक सेकेंड (”)कहते हैं।

भूमध्यरेखा से ध्रुवों की तरफ अक्षांश रेखाएं छोटी होती जाती हैं। ध्रुव पर यह एक बिन्दु में बदल जाती हैं। भूमध्यरेखा का मान शून्य है। भूमध्यरेखा के उत्तर के सभी बिन्दु ‘उत्तरी अक्षांश’ और दक्षिण के सभी बिन्दु ‘ दक्षिणी अक्षांश’ कहलाते हैं। इसलिए प्रत्येक अक्षांश के मान के बाद ‘N’ या ‘S’ अक्षर लिखे जाते हैं।

भूमध्य रेखा (00) ,उत्तरी ध्रुव (900N) वदक्षिणी ध्रुव (900S) के अलावा हमारे पास चार अन्य महत्वपूर्ण अक्षांश समानांतर हैं-

  • कर्क रेखा (23030’N)
  • मकर रेखा (23030’S)
  • आर्कटिक वृत्त (66030’N)
  • अंटार्कटिक वृत्त (66030’S)

ताप कटिबंध

कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच सभी अक्षांशों पर वर्ष में कम– से– कम एक बार दोपहर का सूर्य सिर के ऊपर स्थित होता है। इसलिए इस क्षेत्र में सबसे अधिक गर्मी होती है और इसे उष्णकटिबंध कहा जाता है। 21 जून को सूर्य कर्क रेखा के ठीक उपर होता है। 22 दिसंबर को सूर्य मकर रेखा के ठीक उपर होता है। ये दो अक्षांश उष्णकटिबंध की बाहरी सीमा बनाते हैं। उष्णकटिबंध पृथ्वी का सबसे गर्म हिस्सा है। ज्यादातर रेगिस्तान यहीं स्थित हैं।

कर्क रेखा और मकर रेखा के पार किसी भी अक्षांश पर दोपहर का सूर्य सिर के ऊपर स्थित नहीं होता है। हम जैसे – जैसे ध्रुवों की तरफ बढ़ते हैं, सूर्य की किरणों का कोण कम होता चला जाता है। उत्तरी गोलार्द्ध में कर्क रेखा और आर्कटिक वृत्त और दक्षिणी गोलार्द्ध में मकर रेखा और अंटार्कटिक वृत्त के बीच आने वाले क्षेत्रों का तापमान मध्यम होता है, यानि इन इलाकों में न तो बहुत अधिक गर्मी पड़ती है और न ही बहुत अधिक ठंड। इसलिए येशीतोष्ण कटिबंध हैं।

उत्तरी गोलार्द्ध में आर्कटिक वृत्त और उत्तरी ध्रुव के बीच के क्षेत्र और दक्षिणी गोलार्द्ध में अंटार्कटिक वृत्त और दक्षिणी ध्रुव के बीच के क्षेत्र बहुत ठंडे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि यहां क्षितिज पर सूर्य बहुत अधिक नहीं चमकता। इसलिए यहां हमेशा सूर्य की तिरछी किरणें ही पड़ती हैं और इसी वजह यह शीत कटिबंध है।

देशांतर

पृथ्वी को पूर्वी गोलार्द्ध और पश्चिमी गोलार्द्ध में बांटने वाली काल्पनिक रेखाओं का सेट जो पृथ्वी पर उत्तर दक्षिण दिशा में घूमता हैं, देशांतर (longitudes) कहलाता हैं। ये रेखाएं एक दूसरे के समानांतर नहीं होती। ध्रुवों पर ये सभी एक हो जाती हैं। इनके बीच की दूरी ‘ देशांतर अंश’ में मापी जाती है। ये गोलार्द्ध का निर्माण करती हैं। देशांतर की शिरोबिन्दु (meridians of longitudes) और अक्षांश के समानांतर मिलकर एक नेटवर्क का निर्माण करते हैं, जिसे ग्रिड कहा जाता है। अक्षांश के समानांतर के विपरीत, देशांतर की शिरोबिन्दुएं लंबाई में एकसमान होती हैं।

अगर कोई भूमध्य रेखा से ध्रुवों की तरफ जाता है तो दो देशांतरों के बीच की दूरी कम होती चली जाएगी। लंदन शहर के पास ग्रीनविच वेधशाला के उपर से गुजरने वाले देशांतर को ग्रीनविच मीन टाइम (जीएमटी)  मानने पर एक समझौता हुआ था। इसे 00 देशांतर माना जाता है और यहां से हम 1800 पूर्व और 1800 पश्चिम की गणना करते हैं। 1800 पूर्व और 1800  पश्चिम देशांतर का एक ही रेखा होना दिलचस्प है। गड़बड़ी से बचने के लिए देशांतरों के मान के साथ ‘E’ और ‘W’ अक्षर को क्रमशः पूर्वी गोलार्द्ध और पश्चिमी गोलार्द्ध्  के लिए लिखा जाता है।

समय का निर्धारण

एक घूर्णन पूरा करने में पृथ्वी करीब 24 घंटे का समय लेती है। घूर्णन की यह अवधि पृथ्वी–दिवस (अर्थ डे) कहलाती है। इसका अर्थ है कि 24 घंटे में पृथ्वी 360 डिग्री पूरा कर लेती है। इसलिए, प्रत्येक 150 डिग्री को पूरा करने के लिए यह एक घंटा या प्रत्येक डिग्री को पूरा करने के लिए यह 4 मिनट का समय लेती है। तदनुसार, पृथ्वी को एक घंटे के 24 समय मंडल में बांटा गया है। चूंकि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की तरफ घूमती है अतः अलग– अलग स्थानों पर अलग– अलग समय पर दिन की शुरुआत होती है। ग्रीनविच मीन टाइम (जीएमटी)  से पूर्व स्थित स्थानों पर ग्रीनविच मीन टाइम (जीएमटी)  के पश्चिम में स्थित स्थानों की तुलना में सूर्योदय पहले होता है।

  • भारत 6807′ से 97025′ E देशांतर केई मध्य विस्तृत है। इसलिए देश के स्थानीय समय के लिए किसी देशांतर को मानक समय के तौर पर अपनाए जाने की जरूरत महसूस की गई थी।
  • इसके लिए भारत में 82030′ E को स्वीकार किया गया है। इसे भारतीय मानक समय (IST) के रूप में जाना जाता है।
  • ग्रीनविच मीन टाइम भारतीय मानक समय से 5 घंटे 30 मिनट पीछे है। वैश्विक संदर्भ में ग्रीनविच (00) समय  का पालन किया जाता है, जिसे ग्रीनविच मीन टाइम (जीएमटी) कहा जाता है।

10. पृथ्वी की आंतरिक संरचना व चट्टानों के प्रकार

पृथ्वी की आंतरिक संरचना कई संकेंद्रित परतों से बनी है अर्थात पृथ्वी के आंतरिक भाग को क्रस्ट (ऊपरी परत), मैंटल (मध्य परत) और कोर(निचली परत) नाम की तीन परतों में बाँटा जाता है |

  • क्रस्ट:क्रस्ट पृथ्वी की सतह का सबसे उपरी परत है, जो महाद्वीपों में करीब 35 किमी और समुद्र के तल में सिर्फ 5 किमी मोटी होती है। क्रास्ट का निर्माण सिलिका और एल्यूमिना  से होता है, इसलिए इसे सियाल (sial) भी कहा जाता है।
  • मैंटल: क्रस्ट के नीचे पाई जाने वाली परत मैंटल है और इसकी गहराई 2900 किमी. तक है। इसका निर्माण मुख्य रूप से सिलिका और मैग्नीशियम से होता है, इसलिए इसे सीमा (si– सिलिका, ma– मैग्नीशियम); कहा जाता है।
  • कोर: पृथ्वी की सबसे भीतरी परत कोर है, जिसका अर्धव्यास (रेडियस) करीब 3500 किमी. है। यह मुख्य रूप से निकल और लोहे से बना है और इसेनिफे (nife, ni– निकल और fe– फेरस यानि लोहा) कहा जाता है।

चट्टानें

पृथ्वी का क्रस्ट (ऊपरी परत) अलग– अलग प्रकार की चट्टानों से बना है जो रंग, आकार और बनावट में अलग हो सकते हैं।चट्टानों में खनिज पाये जाते हैं | खनिज विशेष भौतिक गुणों और निश्चित रसायनिक संरचना वाले प्राकृतिक पदार्थ होते हैं। इनका उपयोग – लोहा, एल्युमीनियम, सोना, यूरेनियम आदि जैसे उद्योगों, दवाओं, ऊर्वरकों आदि में होता है। कोयला, प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम आदि खनिज के उदाहरण हैं | चट्टानों के तीन प्रमुख प्रकार हैं– आग्नेय (Igneous) चट्टान, अवसादी (Sedimentary)चट्टान और रुपांतरित (Metamorphic) चट्टान |

  • आग्नेयचट्टानें: पिघले हुए मैग्मा के ठंडा होकर ठोस होने के बाद ये चट्टानें बनती हैं। आग्नेय चट्टान दो प्रकार की होती हैः अंतर्भेदी चट्टानें (Intrusive rocks) और बहिर्भेदी चट्टानें (Extrusive rocks)। बहिर्भेदी चट्टानें पृथ्वी के भीतर से निकलने वाले पिघले हुए मैग्मा के उसकी सतह पर आने, तेजी से ठंडा होने और जम जाने से बनती हैं, जैसे– बेसाल्ट। अंतर्भेदी चट्टानों का निर्माण पिघले मैग्मा के पृथ्वी के नीचे ठंडा होकर जम जाने से होता है, जैसे-ग्रेनाइट|
  • अवसादीचट्टानें: यह हवा, पानी आदि द्वारा चट्टानों के छोटे टुकड़ों के एक जगह से दूसरी जगह ले जाने और जमा होने से बनती है और ये ढीले तलछट चट्टान की परतें बनाने के लिए संकुचित और सख्त बनते हैं। इन चट्टानों में मृत पौधे, पशुओं और अन्य सूक्ष्मजीवों के जीवाश्म पाये जाते हैं ,जैसे – बलुआ पत्थर रेत के कणों से बना है।
  • रुपांतरितचट्टानें: आग्नेय और अवसादी चट्टानों पर बहुत अधिक ताप और दबाव पड़ने से ये चट्टानें बनती हैं। उदाहरण– मिट्टी का स्लेट में और चूना पत्थर का संगमरमर में बदलना।

शैल चक्र

एक चक्रीय तरीके से कुछ विशेष परिस्थितियों में एक प्रकार की चट्टान दूसरे प्रकार में बदलती है। एक चट्टान से दूसरे चट्टान में बदलने की यह प्रक्रिया शैल चक्र कहलाती है। जब पिघला हुआ मैग्मा ठंडा होता है तो जम कर आग्नेय चट्टान बन जाता है। जब आग्नेय चट्टान छोटे कणों में टूटती है तो इसे विभिन्न माध्यमों के जरिए एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है और जिसके जमा होने से अवसादी चट्टान बनती है। जब आग्नेय चट्टान और अवसादी चट्टानों पर ताप और दबाव डाला जाता है तो ये रुपांतरित चट्टानों में बदल जाती हैं।

11. पृथ्वी – एक परिचय

पृथ्वी  पूरे ब्रह्मांड में एक मात्र एक ऐसी ज्ञात जगह है जहां जीवन का अस्तित्व है। इस ग्रह का निर्माण लगभग 4.54 अरब वर्ष पूर्व हुआ था और इस घटना के 1 अरब वर्ष पश्चातï यहां जीवन का विकास शुरू हो गया था। तब से पृथ्वी के जैवमंडल ने यहां के वायु मण्डल में काफी परिवर्तन किया है। समय बीतने के साथ ओजोन पर्त बनी जिसने पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के साथ मिलकर पृथ्वी पर आने वाले हानिकारक सौर विकरण को रोककर इसको रहने योग्य बनाया।
पृथ्वी का द्रव्यमान 6.569&1021 टन है। पृथ्वी बृहस्पति जैसा गैसीय ग्रह न होकर एक पथरीला ग्रह है। पृथ्वी सभी चार सौर भौमिक ग्रहों में द्रव्यमान और आकार में सबसे बड़ी है। अन्य तीन भौमिक ग्रह हैं- बुध, शुक्र और मंगल। इन सभी ग्रहों में पृथ्वी का घनत्व, गुरुत्वाकर्षण, चुम्बकीय क्षेत्र, और घूर्णन सबसे ज्यादा हैं।
ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी सौर-नीहारिका (nebula) के अवशेषों से अन्य ग्रहों के साथ ही बनी। निर्माण के बाद पृथ्वी गर्म होनी शुरू हुई। इसका अंदरूनी हिस्सा गर्मी से पिघला और लोहे जैसे भारी तत्व पृथ्वी के केंद्र में पहुँच गए। लोहा व निकिल गर्मी से पिघल कर द्रव में बदल गए और इनके घूर्णन से पृथ्वी दो ध्रुवों वाले विशाल चुंबक में बदल गई। बाद में पृथ्वी में महाद्वीपीय विवर्तन या विचलन जैसी भूवैज्ञानिक क्रियाएँ पैदा हुईं। इसी प्रक्रिया से पृथ्वी पर महाद्वीप, महासागर और वायुमंडल आदि बने।
पृथ्वी की गतियाँ
पृथ्वी अपने अक्ष पर निरंतर घूमती रहती है। इसकी दो गतियाँ हैं-
घूर्णन (Rotation)
पृथ्वी के अपने अक्ष  पर चक्रण को घूर्णन कहते हैं। पृथ्वी पश्चिम से पूर्व दिशा में घूमती है और एक घूर्णन पूरा करने में 23 घण्टे, 56 मिनट और 4.091 सेकेण्ड का समय लेती है। इसी से दिन व रात होते हैं।
परिक्रमण (Revolution)
पृथ्वी सूर्य के चारों ओर अंडाकार पथ पर 365 दिन, 5 घण्टे, 48 मिनट व 45.51 सेकेण्ड में एक चक्कर पूरा करती है, जिसे उसकी परिक्रमण गति कहते हैं। पृथ्वी की इस गति की वजह से ऋतु परिवर्तन होता है।
अक्षांश रेखाएँ (Latitude)
ग्लोब पर पश्चिम से पूर्व की ओर खींची गईं काल्पनिक रेखाओं को अक्षांश रेखाएं कहते हैं। अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 180 है। प्रति 1श की अक्षांशीय दूरी लगभग 111 किमी. के बराबर होते हैं। अक्षांश रेखाओं में

तीन प्रमुख रेखाएं हैं

  • कर्क रेखा (Tropic of cancer)– यह रेखा उत्तरी गोलाद्र्ध में भूमध्यरेखा के समानांतर 23 30′ पर खींची गई है।
  • मकर रेखा (Tropic of Capricorn)– यह रेखा दक्षिणी गोलाद्र्ध में भूमध्य रेखा के समानांतर 23 30′ अक्षांश पर खींची गयी है।
  • विषुवत अथवा भूमध्य रेखा (Equator)– यह रेखा पृथ्वी को उत्तरी गोलाद्र्ध (Northern Hemisphere) और दक्षिणी गोलाद्र्ध (Southern Hemisphere)-दो बराबर भागों में बाँटती है। इसे शून्य अंश अक्षांश रेखा भी कहते हैं।

 

प्रत्येक वर्ष दो संक्रांति होती हैं
कर्क संक्रांति (Summer Solistice) – 21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस स्थिति को कर्क संक्रांति (Summer Solistice) कहते हैं।
मकर संक्रांति (Winter Solistice)– 22 दिसम्बर को सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस स्थिति को मकर संक्रांति (Winter Solistice) कहते हैं।
देशांतर रेखाएँ (Longitudes)
पृथ्वी पर  दो अक्षांशों के मध्य कोणीय दूरी को देशांतर कहा जाता है। भूमध्य रेखा पर 1श के अंतराल पर देशांतरों के मध्य दूरी 111.32 किमी. होती है। दुनिया का मानक समय इसी रेखा से निर्धारित किया जाता है। इसीलिए इसे प्रधान मध्यान्ह देशांतर रेखा (Prime Meridian) कहते हैं। लंदन का एक नगर ग्रीनविच इसी रेखा पर स्थित है, इसलिए इस रेखा को ग्रीनविच रेखा भी कहते हैं। 1श देशांतर की दूरी तय करने में पृथ्वी को 4 मिनट का समय लगता है।

  • स्थानीय समय (Local Time)-पृथ्वी पर स्थान विशेष के सूर्य की स्थिति से परिकल्पित समय को स्थानीय समय कहते हैं।
  • मानक समय (Standard Time)-किसी देश अथवा क्षेत्र विशेष में किसी एक मध्यवर्ती देशांतर रेखा के स्थानीय समय को पूरे देश अथवा क्षेत्र का समय मान लिया जाता है जिसे मानक समय कहते हैं। भारत के 82 30′ पूर्व देशांतर रेखा के स्थानीय समय को पूरे देश का मानक समय माना गया है।
  • अंतर्रा्रीय तिथि रेखा (International Date Line) –यह एक काल्पनिक रेखा है जो प्रशांत महासागर के बीचों-बीच 180श देशांतर पर उत्तर से दक्षिण की ओर खींची गई है। इस रेखा के पूर्व व पश्चिम में एक दिन का अंतर होता है।

 

सूर्य ग्रहण चंद्र ग्रहण
पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है जबकि चंद्रमा पृथ्वी का। जब सूर्य एवं चंद्रमा के मध्य पृथ्वी आ जाती है तो पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पडऩे लगती है, जिससे ग्रहण पड़ता है जो  चंद्र ग्रहण कहलाता है। जब पृथ्वी एवं सूर्य के मध्य चंद्रमा आ जाता है तो उसकी छाया पृथ्वी पर पड़ती है जिससे सूर्यग्रहण की घटना होती है।

 

12. पृथ्वी की संरचना

पृथ्वी की संरचना

पृथ्वी की आकृति लध्वक्ष गोलाभ (Oblate spheroid) के समान है। यह लगभग गोलाकार है जो ध्रुवों  पर थोड़ा चपटी है। पृथ्वी पर सबसे उच्चतम बिंदु माउंट एवरेस्ट है जिसकी ऊँचाई 8848 मी. है। दूसरी ओर सबसे निम्नतम बिंदु प्रशांत महासागर में स्थित मारियाना खाई है जिसकी समुद्री स्तर से गहराई 10,911 मी. है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना कई स्तरों में विभाजित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना के तीन प्रधान अंग हैं- ऊपरी सतह भूपर्पटी (Crust), मध्य स्तर मैंटल (mantle) और आंतरिक स्तर धात्विक क्रोड (Core)। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5′ भाग भूपर्पटी का है जबकि 83′ भाग में मैंटल विस्तृत है। शेष 16′ भाग क्रोड है।
भूपर्पटी अथवा क्रस्ट की मोटाई 8 से 40 किमी. तक मानी जाती है। इस परत की निचली सीमा को मोहोरोविसिक असंबद्धता या मोहो असंबद्धता कहा जाता है। पृथ्वी पर महासागर और महाद्वीप केवल इसी भाग में स्थित हैं।
मैंटल की मोटाई लगभग 2895 किमी. है। यह अद्र्ध-ठोस अवस्था में है। एक संक्रमण परत जो मैंटल को क्रोड या कोर से विभक्त करती है उसे गुटेनबर्ग असंबद्धता कहते हैं।
बाह्म्तम क्रोड की विशेषता यह है कि यह तरल अवस्था में है जबकि आंतरिक क्रोड का पदार्थ ठोस पदार्थ की भांति व्यवहार करता है। इसकी त्रिज्या लगभग 1255 किमी. है। आंतरिक क्रोड के घूर्णन का कोणीय वेग पृथ्वी के कोणीय वेग से थोड़ा अधिक होता है।

पृथ्वी का निर्माण आयरन (32.1 फीसदी), ऑक्सीजन (30.1 फीसदी), सिलिकॉन (15.1 फीसदी), मैग्नीशियम (13.9 फीसदी), सल्फर (2.9 फीसदी), निकिल (1.8 फीसदी), कैलसियम (1.5 फीसदी) और अलम्युनियम (1.4 फीसदी) से हुआ है। इसके अतिरिक्त लगभग 1.2 फीसदी अन्य तत्वों का भी योगदान है। क्रोड का निर्माण लगभग 88.8 फीसदी आयरन से हुआ है। भूरसायनशास्त्री एफ. डल्ब्यू. क्लार्क के अनुसार पृथ्वी की भूपर्पटी में लगभग 47 फीसदी ऑक्सीजन है।

 

पथ्वी की आंतरिक परतें

गहराई (किमी.) परत
0-35 भूपर्पटी या क्रस्ट
35-60 ऊपरी भूपर्पटी
35-2890 मैंटल
2890-5100 बाहरी क्रोड
5100-6378 आंतरिक क्रोड

 

प्लेट टेक्टोनिक्स
महाद्वीपों और महासागरों के वितरण को स्पष्ट करने के लिए यह सबसे नवीन सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार स्थलमंडल कई दृढ़ प्लेटों के रूप में विभाजित है। ये प्लेटें स्थलमंडल के नीचे स्थित दुर्बलतामंडल के ऊपर तैर रही हैं। इस सिद्धांत के अनुसार भूगर्भ में उत्पन्न ऊष्मीय संवहनीय धाराओं के प्रभाव के अंतर्गत महाद्वीपीय और महासागरीय प्लेटें विभिन्न दिशाओं में विस्थापित होती रहती हैं। स्थलमंडलीय प्लेटों के इस संचलन को महाद्वीपों तथा महासागरों के वर्तमान वितरण के लिए उत्तरदायी माना जाता है। जहां दो प्लेटें विपरीत दिशाओं में अपसरित होती हैं उन किनारों को रचनात्मक प्लेट किनारा या अपसारी सीमांत कहते हैं। जब दो प्लेटें आमने-सामने अभिसरित होती हैं तो इन्हें विनाशशील प्लेट किनारे अथवा अभिसारी सीमांत कहते हैं।
सबसे पुरानी महासागरीय भूपर्पटी पश्चिमी प्रशांत में स्थित है। इसकी अनुमानित आयु 20 करोड़ वर्ष है। अन्य प्रमुख प्लेटों में भारतीय प्लेट, अरब प्लेट, कैरेबियाई प्लेट, दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित नाज्का प्लेट और दक्षिणी अटलांटिक महासागर की स्कॉटिया प्लेट शामिल हैं। लगभग 5 से 5.5 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय व ऑस्ट्रेलियाई प्लेटें एक थी।
प्रमुख प्लेटें

 प्लेट का नाम  क्षेत्रफल (लाख किमी. में)
 अफ्रीकी प्लेट  78.0
 अंटार्कटिक प्लेट  60.9
 इंडो-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट  47.2
 यूरेशियाई प्लेट  67.8
 उत्तरी अमेरिकी प्लेट  75.9
 प्रशांत प्लेट  103.3

 

स्थलाकृतियां
पृथ्वी का तल असमान है। तल का 70.8 फीसदी भाग जल से आच्छादित है, जिसमें अधिकांश महासागरीय नितल समुद्री स्तर के नीचे है। धरातल पर कहीं विशाल पर्वत, कहीं ऊबड़-खाबड़ पठार तो कहीं पर उपजाऊ मैदान पाये जाते हैं। महाद्वीप और महासागरों को प्रथम स्तर की स्थलाकृति माना जाता है जबकि पर्वत, पठार, घाटी निचले स्तरों के अंतर्गत रखे जाते हैं।

पृथ्वी का तल भूवैज्ञानिक समय काल के दौरान प्लेट टेक्टोनिक्स और क्षरण की वजह से लगातार परिवर्तित होता रहता है। प्लेट टेक्टोनिक्स की वजह से तल पर हुए बदलाव पर मौसम, वर्षा, ऊष्मीय चक्र और रासायनिक परिवर्तनों का असर पड़ता है। हिमीकरण, तटीय क्षरण, प्रवाल भित्तियों का निर्माण और बड़े उल्का पिंडों के पृथ्वी पर गिरने जैसे कारकों की वजह से भी पृथ्वी के तल पर परिवर्तन होते हैं।

चट्टान
पृथ्वी की सतह से 16 किमी. की गहराई तक पृथ्वी की भूपर्पटी में पाए जाने वाले 95′ पदार्थ चट्टानों के रूप में पाए जाते हैं। इनकी रचना विभिन्न प्रकार के खनिजों का सम्मिश्रण है। विभिन्न आधारों पर किया चट्टानों का वर्गीकरण इस प्रकार है-
आग्नेय शैल (Igneous Rock) – आग्नेय शैल की रचना धरातल के नीचे स्थित तप्त एवं तरल मैग्मा के शीतलन के परिणामस्वरूप उसके ठोस हो जाने पर होती है। उदाहरण- माइका, ग्रेनाइट आदि।
अवसादी शैल (Sedimentary Rocks) – अपक्षय एवं अपरदान के  विभिन्न  साधनों द्वारा मौलिक चट्टानों के विघटन, वियोजन एवं चट्टान-चूर्ण के परिवहन तथा किसी स्थान पर जमाव के फलस्वरूप उसके अवसादों (debris) से निर्मित शैल को अवसादी शैल कहा जाता है। उदाहरण- कोयला, पीट, बालुका पत्थर आदि।
रूपांतरित शैल (Metamorphic rock)- अवसादी एवं आग्नेय शैलों में ताप एवं दबाव के कारण परिवर्तन या रूपांतरण हो जाने से रूपांतरित शैलों का निर्माण होता है। उदाहरण- संगमरमर, क्वाटर्जाइट आदि।
क्वाटर्ज, फेल्सपार, एम्फीबोल, माइका, पाइरोक्सिन और ऑलिविन जैसे सिलिकेट खनिज पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। पृथ्वी की सबसे बाहरी परत को पीडोस्फीयर कहते हैं। इस परत का निर्माण मृदा से हुआ है और इस स्तर पर लगातार मृदा उत्पादन की प्रक्रिया जारी रहती है। पृथ्वी पर स्थलमंडल का निम्नतम बिंदु मृत सागर है जिसकी गहराई समुद्र स्तर से 418 मी. नीचे है जबकि उच्चतम बिंदु माउंट एवरेस्ट है जिसकी समुद्री स्तर से ऊँचाई 8848 मी. है। स्थलमंडल की औसत ऊँचाई 840 मी. है।
महाद्वीप
पृथ्वी पर 7 महाद्वीप स्थित हैं-
एशिया क्षेत्रफल – 44,614,000 वर्ग किमी.
एशिया सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह विश्व के कुल स्थल क्षेत्र के 1/3 भाग पर स्थित है।  यहाँ की 3/4 जनसंख्या अपने भरण-पोषण के लिए कृषि पर निर्भर है। एशिया चावल, मक्का, जूट, कपास, सिल्क इत्यादि के उत्पादन के मामले में पहले स्थान पर है।
अफ्रीका – क्षेत्रफल – 30,216,000 वर्ग किमी.
अफ्रीका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है। अफ्रीका का 1/3 हिस्सा मरुस्थल है। यहाँ की मात्र 10′ भूमि ही कृषियोग्य है। हीरे व सोने के उत्पादन में अफ्रीका सबसे ऊपर है।
उत्तर अमेरिका क्षेत्रफल- 24,230,000 वर्ग किमी. यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह दुनिया के 16′ भाग पर स्थित है। कृषीय संसाधनों की दृष्टिïकोण से यह काफी धनी क्षेत्र है। विश्व के कुल मक्का उत्पादन का आधा उत्पादन यहीं होता है। वन, खनिज व ऊर्जा संसाधनों के दृष्टिïकोण से यह काफी समृद्ध क्षेत्र है।
दक्षिण अमेरिका– क्षेत्रफल- 17,814,000 वर्ग किमी. यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा महाद्वीप है। इस महाद्वीप का 2/3 हिस्सा विषुवत रेखा के दक्षिण में स्थित है। इसके बहुत बड़े हिस्से में वन हैं।
अंटार्कटिका क्षेत्रफल- 14,245,000 वर्ग किमी. यह विश्व का पाँचवा सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह पूरी तरह दक्षिणी गोलाद्र्ध में स्थित है और दक्षिण ध्रुव इसके मध्य में स्थित है। इस महाद्वीप का 99′ हिस्सा वर्षपर्यन्त बर्फ से ढंका रहता है। यहाँ की भूमि पूरी तरह बंजर है।
यूरोप – क्षेत्रफल-10,505,000 वर्ग किमी. यूरोप एकमात्र ऐसा महाद्वीप है जहाँ जनसंख्या घनत्व अधिक होने के साथ-साथ समृद्धता भी है। यहाँ वन, खनिज, उपजाऊ मिट्टी व जल बहुतायत में है। यूरोप के महत्वपूर्ण खनिज संसाधन कोयला, लौह अयस्क, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस हैं।
ऑस्ट्रेलिया क्षेत्रफल – 8,503,000 वर्ग किमी. यह एकमात्र देश है जो सम्पूर्ण महाद्वीप पर स्थित है। यह देश पादपों, वन्यजीवों व खनिजों के मामले में समृद्ध है लेकिन जल की यहाँ काफी कमी है।

 

महाद्वीपों के आंकड़े

नाम भूमि क्षेत्रफल का प्रतिशत क्षेत्रफल वर्ग किमी. में जनसंख्या (करोड़ में)
एशिया 29.5 44,614,000 387.9
अफ्रीका 20.0 30,216,000 87.7
उत्तर अमेरिका 16.3 24,230,000 50.1
दक्षिण अमेरिका 11.8 17,814,000 37.9
यूरोप 6.5 10,505,000 72.7
ऑस्ट्रेलिया 5.2 8,503,000 3.2
अंटार्कटिका 9.6 14,245,000

 

 

पृथ्वी का भूगर्भिक इतिहास

वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 4.6 अरब वर्ष है। पृथ्वी के सम्पूर्ण भूगर्भिक इतिहास को निम्नलिखित कल्पों (Eras) में विभाजित किया जा सकता है-
पूर्व कैम्ब्रियन (Pre Cambrian Era) – इसी काल से पृथ्वी की शुरुआत हुई। यह कल्प लगभग 57 करोड़ वर्ष पूर्व समाप्त हुआ। इस कल्प के दौरान भूपर्पटी, महाद्वीपों व महासागरों इत्यादि का निर्माण हुआ और जीवन की उत्पत्ति भी इसी काल के दौरान हुई।

पुराजीवी काल (Palaeozoic Era)- 57 करोड़ वर्ष पूर्व से 22.5 करोड़ वर्ष तक विद्यमान इस कल्प में जीवों एवं वनस्पतियों का विकास तीव्र गति से हुआ। इस कल्प को निम्नलिखित शकों (Periods) में विभाजित किया गया है-

  • कैम्ब्रियन (Cambrian)
  • आर्डोविसियन (Ordovician)
  • सिल्यूरियन (Silurian)
  • डिवोनियन (Divonian)
  • कार्बनीफेरस (Carboniferous)
  • पर्मियन (Permian)

मेसोजोइक कल्प (Mesozoic era)- इस कल्प की अवधि 22.5 करोड़ से 7 करोड़ वर्ष पूर्व तक है। इसमें रेंगने वाले जीव अधिक मात्रा में विद्यमान थे। इसे तीन शकों में विभाजित किया गया है-

  • ट्रियासिक (Triassic)
  • जुरासिक (Jurassic)
  • क्रिटैशियस (cretaceous)

सेनोजोइक कल्प (Cenozoic era)– इस कल्प का आरंभ आज से 7.0 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था। इस कल्प में ही सर्वप्रथम स्तनपायी जीवों का आविर्भाव हुआ। इस युग को पाँच शकों में विभाजित किया गया है-

  • पैलियोसीन (Paleocene)
  • इयोसीन (Eocene)
  • ओलिगोसीन (Oligocene)
  • मायोसीन (Miocene)
  • प्लायोसीन (Pliocene)

इस युग में हिमालय, आल्प्स, रॉकीज, एण्डीज आदि पर्वतमालाओं का विकास हुआ।
नियोजोइक या नूतन कल्प (Neozoic Era) – 10 लाख वर्ष पूर्व से वर्तमान समय तक चलने वाले इस कल्प को पहले चतुर्थक युग (Quaternary Epoch) में रखकर पुन: प्लीस्टोसीन हिमयुग (Pleistocene) तथा वर्तमान काल जिसे होलोसीन (Holocene) कहा जाता है, में वर्गीकृत किया जाता है।
पर्वत 
पर्वत धरातल के ऐसे ऊपर उठे भागों के रूप में जाने जाते हैं, जिनका ढाल तीव्र होता है और शिखर भाग संंकुचित क्षेत्र वाला होता है। पर्वतों का निम्नलिखित चार भागों में वर्गीकरण किया जाता है-
मोड़दार पर्वत (Fold Mountains) – पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों द्वारा धरातलीय चट्टानों में मोड़ या वलन पडऩे के परिणामस्वरूप बने हुए पर्वतों को मोड़दार अथवा वलित पर्वत कहते हैं। उदाहरण- यूरोप के आल्प्स, दक्षिण अमेरिका के एण्डीज व भारत की अरावली शृंखला।
अवरोधी पर्वत या ब्लॉक पर्वत (Block Mountains)- इन पर्वतों का निर्माण पृथ्वी की आंतरिक हलचलों के कारण तनाव की शक्तियों से धरातल के किसी भाग में दरार पड़ जाने के परिणामस्वरूप होता है। उदाहरण- यूरोप में ब्लैक फॉरेस्ट तथा वासगेस (फ्रांस) एवं पाकिस्तान में साल्ट रेंज।
ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic) – इन पर्वतों का निर्माण ज्वालामुखी द्वारा फेंके गए पदार्थों से होता है। उदाहरण- हवाई द्वीप का माउंट माउना लोआ व म्यांमार का माउंट पोपा ।
अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains) – इनका निर्माण विभिन्न कारकों द्वारा अपरदन से होता है। उदाहरण- भारत के अरावली, नीलगिरि आदि।
पठार
साधारणतया अपने सीमावर्ती धरातल से पर्याप्त ऊँचे एवं सपाट तथा चौड़े शीर्ष भाग वाले स्थलरूप को ‘पठार’ के नाम से जाना जाता है। इनके निम्नलिखित तीन प्रकार होते हैं-
अन्तरापर्वतीय पठार (Intermountane Plateau) – ऐसे पठार चारों ओर से घिरे रहते हैं। उदाहरण- तिब्बत का पठार, बोलीविया, पेरू इत्यादि के पठार।
पीडमॉण्ट पठार (Piedmont Plateau)- उच्च पर्वतों की तलहटी में स्थित पठारों को ‘पीडमॉण्ट’ पठार कहते हैं। उदाहरण – पीडमॉण्ट (सं. रा. अमेरिका), पेटागोनिया (दक्षिणी अमेरिका) आदि।
महाद्वीपीय पठार (Continental Plateau) – ऐसे पठारों का निर्माण पटल विरूपणी बलों द्वारा धरातल के किसी विस्तृतभू-भाग के ऊपर उठ जाने से होता है। उदाहरण- भारत के कैमूर, राँची तथा कर्नाटक के पठार।

13. पृथ्वी की धरातलीय संरचनाये

पर्वत
पर्वत धरातल के ऐसे ऊपर उठे भागों के रूप में जाने जाते हैं, जिनका ढाल तीव्र होता है और शिखर भाग संंकुचित क्षेत्र वाला होता है। पर्वतों का निम्नलिखित चार भागों में वर्गीकरण किया जाता है-
मोड़दार पर्वत (Fold Mountains) – पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों द्वारा धरातलीय चट्टानों में मोड़ या वलन पडऩे के परिणामस्वरूप बने हुए पर्वतों को मोड़दार अथवा वलित पर्वत कहते हैं। उदाहरण- यूरोप के आल्प्स, दक्षिण अमेरिका के एण्डीज व भारत की अरावली शृंखला।
अवरोधी पर्वत या ब्लॉक पर्वत (Block Mountains)– इन पर्वतों का निर्माण पृथ्वी की आंतरिक हलचलों के कारण तनाव की शक्तियों से धरातल के किसी भाग में दरार पड़ जाने के परिणामस्वरूप होता है। उदाहरण- यूरोप में ब्लैक फॉरेस्ट तथा वासगेस (फ्रांस) एवं पाकिस्तान में साल्ट रेंज।
ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic) – इन पर्वतों का निर्माण ज्वालामुखी द्वारा फेंके गए पदार्थों से होता है। उदाहरण- हवाई द्वीप का माउंट माउना लोआ व म्यांमार का माउंट पोपा ।
अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains) – इनका निर्माण विभिन्न कारकों द्वारा अपरदन से होता है। उदाहरण- भारत के अरावली, नीलगिरि आदि।

पठार
साधारणतया अपने सीमावर्ती धरातल से पर्याप्त ऊँचे एवं सपाट तथा चौड़े शीर्ष भाग वाले स्थलरूप को ‘पठार’ के नाम से जाना जाता है। इनके निम्नलिखित तीन प्रकार होते हैं-
अन्तरापर्वतीय पठार (Intermountane Plateau) – ऐसे पठार चारों ओर से घिरे रहते हैं। उदाहरण- तिब्बत का पठार, बोलीविया, पेरू इत्यादि के पठार।
पीडमॉण्ट पठार (Piedmont Plateau)– उच्च पर्वतों की तलहटी में स्थित पठारों को ‘पीडमॉण्ट’ पठार कहते हैं। उदाहरण – पीडमॉण्ट (सं. रा. अमेरिका), पेटागोनिया (दक्षिणी अमेरिका) आदि।
महाद्वीपीय पठार (Continental Plateau) – ऐसे पठारों का निर्माण पटल विरूपणी बलों द्वारा धरातल के किसी विस्तृतभू-भाग के ऊपर उठ जाने से होता है। उदाहरण- भारत के कैमूर, राँची तथा कर्नाटक के पठार।
मरुस्थल
शुष्क जलवायु वाले प्रदेशों में पाये जाने वाले वे क्षेत्र जहाँ वर्षा कम या नहीं के बराबर होती है एवं वनस्पतियां नहीं उगती हैं, मरुस्थल कहलाते हैं। ऐसे प्रदेशों में बालुकाभित्ति, कंकड़-पत्थर एवं चट्टान की अधिकता रहती है। मरुस्थल निम्न प्रकार के होते हैं-
वास्तविक मरुस्थल- इसमें बालू की प्रचुरता पाई जाती है।
पथरीले मरुस्थल– इसमें कंकड़-पत्थर से युक्त भूमि पाई जाती है। इन्हें अल्जीरिया में रेग तथा लीबिया में सेरिर के नाम से जाना जाता है।
चट्टानी मरुस्थल- इनमें चट्टानी भूमि का हिस्सा अधिकाधिक होता है। इन्हें सहारा क्षेत्र में हमादा कहा जाता है।

ज्वालामुखी 

ज्वालामुखी का तात्पर्य उस छिद्र व दरार से होता है जिसके माध्यम से पृथ्वी के आंतरिक भाग में स्थित लावा तथा अन्य पदार्थ धरातल के ऊपर आते हैं। सामान्य रूप से ज्वालामुखी तीन प्रकार के होते हैं-
जाग्रत ज्वालामुखी (Active Volcano)- इस प्रकार के ज्वालामुखी से लावा, गैसों इत्यादि का लगातार उद्गार होता रहता है। उदाहरण- इटली के एटना तथा स्ट्रॉमबोली।
प्रसुप्त ज्वालामुखी (Dormant Volcano)- जिन ज्वालामुखियों में शांतकाल के पश्चात् अचानक उद्गार होता है, उन्हें प्रसुप्त ज्वालामुखी कहते हैं। उदाहरण- इटली का विसूवियस।
शांत ज्वालामुखी (Extinct Volcano)- ये वे ज्वालामुखी हैं  जिनके भविष्य में उद्गार की कोई संभावना नहीं रहती है। उदाहरण- ईरान के कोल सुल्तान व म्यांमार का पोपा आदि।
झील
महाद्वीपों के मध्यवर्ती भाग अर्थात धरातल पर उपस्थित जलपूर्ण भागों को झील  कहते हैं। झीलों की सबसे बड़ी विशेषता उनका स्थल से घिरा होना है। झील निम्न प्रकार की होती हैं-
खारे पानी की झीलें– जिन झीलों में बाहर से पानी आकर मिलता तो है किन्तु निकलकर बाहर नहीं जाता है, वे प्राय: खारी झीलें होती हैं। कैस्पियन सागर विश्व की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है।
ताजे या मीठे पानी की झीलें– वे झीलें  जिनमें नदियों के माध्यम से निरंतर ताजे जल का प्रवाह होता रहता है मीठे पानी की झीलें होती हैं क्योंकि इनमें विभिन्न प्रकार के लवणों का जमाव नहीं होने पाता है। भारत में नैनीताल, भीमताल, कोडाईकनाल आदि मीठे पानी की प्रमुख झीलें हैं।
विवर्तनिक झीलें– भूभर्गिक हलचलों के कारण निर्मित झीलों को विवर्तनिक झीलों के अंतर्गत रखा जाता है।
भ्रंशन द्वारा बनी झीलें– भूगर्भिक हलचलों के कारण धरातल के किसी भाग के नीचे धंस जाने या ऊपर उठ जाने से बनी बेसिनों में जल भर जाने के परिणामस्वरूप ऐसी झीलों का निर्माण होता है।
दरार घाटी झीलें– धरातल की दो समानांतर दरारों के मध्यवर्ती भाग के नीचे धंस जाने एवं उसमें जल भर जाने के फलस्वरूप ऐसी झीलों का निर्माण होता है। इजरायल का मृत सागर इसका उदाहरण है।
क्रेटर झीलें– शांत ज्वालामुखियों के वृहदाकार मुखों या के्रटरों में जल भर जाने से ऐसी झीलों की उत्पत्ति होती है। इसका प्रमुख उदाहरण अफ्रीका की विक्टोरिया झील है।
हिमनद
हिमनद बर्फ का एक विशाल संग्रह होता है, जो निम्न भूमि की ओर धीर-धीरे बढ़ता है। ये तीन तरह के होते हैं-

(1) गिरिपद हिमनद

(2) महाद्वीपीय हिमनद

(3) घाटी हिमनद।

नदी की तरह से हिमनद भी अपरदन, परिवहन और निक्षेपण का कार्य करते हैं। अपरदन के अंतर्गत यह उत्पादन, अपकर्षण और प्रसर्पण का कार्य करते हैं।
मैदान
धरातल पर मिलने वाले अपेक्षाकृत समतल और निम्न भू-भाग को मैदान कहा जाता है। इनका ढाल एकदम न्यून होता है। निर्माण की प्रक्रिया के आकार के आधार पर मैदानों के प्रकार निम्नलिखित हैं-
रचनात्मक मैदान (structural Plains)- रचनात्मक मैदानों का निर्माण पटल विरुपणी बलों के परिणामस्वरूप समुद्री भागों में निक्षेपित जमावों के ऊपर उठाने से होता है। उदाहरण- कोरोमण्डल व उत्तरी सरकार (भारत)।
अपरदनात्मक मैदान (Erosional Plains)- ऐसे मैदानों का निर्माण अपक्षय तथा अपरदन की क्रियाओं के परिणामस्वरूप होता है। उदाहरण- उत्तरी कनाडा, उत्तरी यूरोप, पश्चिमी सर्बिया आदि।

निक्षेपात्मक मैदान (Depositional plains)- अपरदन के कारकों द्वारा धरातल के किसी भाग से अपरदित पदार्थों को परिवहित करके उन्हें दूसरे स्थान पर निक्षेपित कर देने से ऐसे मैदानों की उत्पत्ति होती है। उदाहरण- गंगा-ब्रह्मïपुत्र का मैदान (उत्तर भारत), ह्वांगो (चीन) आदि।

14. भारत का भूगोल

भारत का भूगोल

 

देश में वर्षा का वितरण

अधिक वर्षा वाले क्षेत्र– यहाँ वार्षिक वर्षा की मात्रा 200 सेमी. से अधिक होता है। क्षेत्र- असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, सिक्किम, कोंकण, मालाबार तट, दक्षिण कनारा, मणिपुर एवं मेघालय।
साधारण वर्षा वाले क्षेत्र- इस क्षेत्र में वार्षिक वर्षा की मात्रा 100 से 200 सेमी. तक होती है। क्षेत्र- पश्चिमी घाट का पूर्वोत्तर ढाल,  पं. बँगाल का दक्षिणी- पश्चिमी क्षेत्र, उड़ीसा, बिहार, दक्षिणी-पूर्वी उत्तर प्रदेश इत्यादि।

 

न्यून वर्षा वाले क्षेत्र- यहाँ 50 से 100 सेमी. वार्षिक वर्षा होती है। क्षेत्र- मध्य प्रदेश, दक्षिण का पठारी भाग, गुजरात, कर्नाटक, पूर्वी राजस्थान, दक्षिणी पँजाब, हरियाणा तथा दक्षिणी उत्तर प्रदेश।
अपर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्र- यहाँ वर्षा 50 सेमी. से भी कम होती है। क्षेत्र- कच्छ, पश्चिमी राजस्थान, लद्दाख आदि।

 

भूगर्भिक इतिहास
भारत की भूगर्भीय संरचना को कल्पों के आधार पर विभाजित किया गया है। प्रीकैम्ब्रियन कल्प के दौरान बनी कुडप्पा और विंध्य प्रणालियां पूर्वी व दक्षिणी राज्यों में फैली हुई हैं। इस कल्प के एक छोटे काल के दौरान पश्चिमी और मध्य भारत की भी भूगर्भिक संरचना तय हुई। पेलियोजोइक कल्प के कैम्ब्रियन, ऑर्डोविसियन, सिलुरियन और डेवोनियन शकों के दौरान पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में कश्मीर और हिमाचल प्रदेश का निर्माण हुआ। मेसोजोइक दक्कन ट्रैप की संरचनाओं को उत्तरी दक्कन के अधिकांश हिस्से में देखा जा सकता है। ऐसा माना जाता है कि इस क्षेत्र का निर्माण ज्वालामुखीय विस्फोटों की वजह से हुआ। कार्बोनिफेरस प्रणाली, पर्मियन प्रणाली और ट्रियाजिक प्रणाली को पश्चिमी हिमालय में देखा जा सकता है। जुरासिक शक के दौरान हुए निर्माण को पश्चिमी हिमालय और राजस्थान में देखा जा सकता है।
टर्शियरी युग के दौरान मणिपुर, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और हिमालियन पट्टिका में काफी नई संरचनाएं बनी। क्रेटेशियस प्रणाली को हम मध्य भारत की विंध्य पर्वत श्रृंखला व गंगा दोआब में देख सकते हैं। गोंडवाना प्रणाली को हम नर्मदा नदी के विंध्य व सतपुरा क्षेत्रों में देख सकते हैं। इयोसीन प्रणाली को हम पश्चिमी हिमालय और असम में देख सकते हैं। ओलिगोसीन संरचनाओं को हम कच्छ और असम में देख सकते हैं। इस कल्प के दौरान प्लीस्टोसीन प्रणाली का निर्माण ज्वालमुखियों के द्वारा हुआ। हिमालय पर्वत श्रृंखला का निर्माण इंडो-ऑस्ट्रेलियन और यूरेशियाई प्लेटों के प्रसार व संकुचन से हुआ है। इन प्लेटों में लगातार प्रसार की वजह से हिमालय की ऊँचाई प्रतिवर्ष 1 सेमी. बढ़ रही है।
भारतीय प्लेट: भारत पूरी तरह से भारतीय प्लेट पर स्थित है। यह एक प्रमुख टेक्टोनिक प्लेट है जिसका निर्माण प्राचीन महाद्वीप गोंडवानालैंड के टूटने से हुआ है। लगभग 9 करोड़ वर्ष पूर्व उत्तर क्रेटेशियस शक के दौरान भारतीय प्लेट ने उत्तर की ओर लगभग 15 सेमी प्रति वर्ष की दर से गति करना आरंभ कर दिया। सेनोजोइक कल्प के इयोसीन शक के दौरान लगभग 5 से 5.5 करोड़ वर्ष पूर्व यह प्लेट एशिया से टकराई। 2007 में जर्मन भूगर्भशास्त्रियों ने बताया कि भारतीय प्लेट के इतने तेजी से गति करने का सबसे प्रमुख कारण इसका अन्य प्लेटों की अपेक्षा काफी पतला होना था। हाल के वर्र्षों में भारतीय प्लेट की गति लगभग 5 सेमी. प्रतिवर्ष है। इसकी तुलना में यूरेशियाई प्लेट की गति मात्र 2 सेमी प्रतिवर्ष ही है। इसी वजह से भारत को च्फास्टेस्ट कांटीनेंटज् की संज्ञा दी गई है।
जल राशि
भारत में लगभग 14,500 किमी. आंतरिक नौपरिवहन योग्य जलमार्ग हैं। देश में कुल 12 नदियां ऐसी हैं जिन्हें बड़ी नदियों की श्रेणी में रखा जा सकता है। इन नदियों का कुल अपवाह क्षेत्रफल 2,528,000 वर्ग किमी. है। भारत की सभी प्रमुख नदियां निम्नलिखित तीन क्षेत्रों से निकलती हैं-
1. हिमालय या काराकोरम श्रृंखला
2. मध्य भारत की विंध्य और सतपुरा श्रृंखला
3. पश्चिमी भारत में साह्यïद्री अथवा पश्चिमी घाट
हिमालय से निकलने वाली नदियों को यहां के ग्लेशियरों से जल प्राप्त होता है। इनकी खास बात यह है कि पूरे वर्ष इन नदियों में जल रहता है। अन्य दो नदी प्रणालियां पूरी तरह से मानसून पर ही निर्भर हैं और गर्मी के दौरान छोटी नदियां मात्र बन कर रह जाती हैं। हिमालय से पाकिस्तान बह कर जाने वाली नदियों में सिंधु, ब्यास, चिनाब, राबी, सतलुज और झेलम शामिल हैं।
गंगा-ब्रह्म्ïापुत्र प्रणाली का जल अपवाह क्षेत्र सबसे ज्यादा 1,100,000 वर्ग किमी. है। गंगा का उद्गम स्थल उत्तरांचल के गंगोत्री ग्लेशियर से है। यह दक्षिण-पूर्व दिशा में बहते हुए बंगाल की खाड़ी में जाकर गिरती है। ब्रह्म्ïापुत्र नदी का उद्गम स्थल तिब्बत में है और अरुणाचल प्रदेश में यह भारत में प्रवेश करती है। यह पश्चिम की ओर बढ़ते हुए बांग्लादेश में गंगा से मिल जाती है।
पश्चिमी घाट दक्कन की सभी नदियों का स्रोत है। इसमें महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियां शामिल हैं। ये सभी नदियां बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। भारत की कुल 20 फीसदी जल अपवाह इन नदियों के द्वारा ही होता है।
भारत की मुख्य खाडिय़ों में कांबे की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी और मन्नार की खाड़ी शामिल हैं। जल संधियों में पाल्क जलसंधि है जो भारत और श्रीलंका को अलग करती है, टेन डिग्री चैनल अंडमान को निकोबार द्वीपसमूह से अलग करता है और ऐट डिग्री चैनल लक्षद्वीप और अमिनदीवी द्वीपसमूह को मिनीकॉय द्वीप से अलग करता है। महत्वपूर्ण अंतरीपों में भारत की मुख्यभूमि के धुर दक्षिण भाग में स्थित कन्याकुमारी, इंदिरा प्वाइंट (भारत का धुर दक्षिण हिस्सा), रामा ब्रिज और प्वाइंट कालीमेरे शामिल हैं। अरब सागर भारत के पश्चिमी किनारे पर पड़ता है, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर भारत के क्रमश: पूर्वी और दक्षिणी भाग में स्थित हैं। छोटे सागरों में लक्षद्वीप सागर और निकोबार सागर शामिल हैं। भारत में चार प्रवाल भित्ति क्षेत्र हैं। ये चार क्षेत्र अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, मन्नार की खाड़ी, लक्षद्वीप और कच्छ की खाड़ी में स्थित हैं। महत्वपूर्ण झीलों में चिल्क झील (उड़ीसा में स्थित भारत की सबसे बड़ी साल्टवाटर झील), आंध्र प्रदेश की कोल्लेरू झील, मणिपुर की लोकतक झील, कश्मीर की डल झील, राजस्थान की सांभर झील और केरल की सस्थामकोट्टा झील शामिल हैं।
प्राकृतिक संसाधन
भारत के कुल अनुमानित पुनर्नवीनीकृत जल संसाधन 1,907.8 किमी.घन प्रति वर्ष हैं। भारत में प्रतिवर्ष 350 अरब घन मी. प्रयोग योग्य भूमि जल की उपलब्धता है। कुल 35 फीसदी भूमिजल संसाधनों का ही उपयोग किया जा रहा है। देश की प्रमुख नदियों व जल मार्र्गों से प्रतिवर्ष 4.4 करोड़ टन माल ढोया जाता है। भारत की 56 फीसदी भूमि खेती योग्य है और कृषि के लिए प्रयोग की जाती है।
एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत में 5.4 अरब बैरल कच्चे तेल के भंडार हैं। इनमें से अधिकांश बांबे हाई, अपर असम, कांबे, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी बेसिन में स्थित हैं। आंध्र प्रदेश, गुजरात और उड़ीसा में लगभग 17 खरब घन फीट प्राकृतिक गैस के भंडार हैं। आंध्र प्रदेश में यूरेनियम के भंडार हैं।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा माइका उत्पादक देश है। बैराइट व क्रोमाइट उत्पादन के मामले में भारत का दूसरा स्थान है। कोयले के उत्पादन के मामले में भारत का दुनिया में तीसरा स्थान है, वहीं लौह अयस्क के उत्पादन के मामले में भारत का चौथा स्थान है। यह बॉक्साइट और कच्चे स्टील के उत्पादन के मामले में छठवें स्थान पर है और मैंगनीज अयस्क उत्पादन के मामले में सातवें स्थान पर है। अल्म्युनियम उत्पादन के मामले में इसका आठवां स्थान है। भारत में टाइटेनियम, हीरे और लाइमस्टोन के भी भंडार प्रचुर मात्रा में हैं। भारत में दुनिया के 24 फीसदी थोरियम भंडार मौजूद हैं।
नमभूमि
नमभूमि वह क्षेत्र है जो शुष्क और जलीय इलाके से लेकर कटिबंधीय मानसूनी इलाके में फैली होती है और यह वह क्षेत्र होता है जहां उथले पानी की सतह से भूमि ढकी रहती है। ये क्षेत्र बाढ़ नियंत्रण में प्रभावी हैं और तलछट कम करते हैं। भारत में ये कश्मीर से लेकर प्रायद्वीपीय भारत तक फैले हैं। अधिकांश नमभूमि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर नदियों के संजाल से जुड़ी हुई हैं। भारत सरकार ने देश में संरक्षण के लिए कुल 71 नमभूमियों का चुनाव किया है। ये राष्ट्रीय पार्र्कों व विहारों के हिस्से हैं। कच्छ वन समूचे भारतीय समुद्री तट पर परिरक्षित मुहानों, ज्वारीय खाडिय़ों, पश्च जल क्षार दलदलों और दलदली मैदानों में पाई जाती हैं। देश में कच्छ क्षेत्रों का कुल क्षेत्रफल 4461 वर्ग किमी. है जो विश्व के कुल का 7 फीसदी है। भारत में  मुख्य रूप से कच्छ वन अंडमान व निकोबार द्वीपसमूह, सुंदरबन डेल्टा, कच्छ की खाड़ी और महानदी, गोदावरी और कृष्णा नदियों के डेल्टा पर स्थित हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल के कुछ क्षेत्रों में भी कच्छ वन स्थित हैं।
सुंदरबन डेल्टा दुनिया का सबसे बड़ा कच्छ वन है। यह गंगा के मुहाने पर स्थित है और पं. बंगाल और बांग्लादेश में फैला हुआ है। यहां के रॉयल बंगाल टाइगर प्रसिद्ध हैं। इसके अतिरिक्त यहां विशिष्ट प्राणि जात पाये जाते हैं।
भारत की प्रमुख जनजातियां
भारत में जनजातीय समुदाय के लोगों की काफी बड़ी संख्या है और देश में 50 से भी अधिक प्रमुख जनजातीय समुदाय हैं। देश में रहने वाले जनजातीय समुदाय के लोग नेग्रीटो, ऑस्ट्रेलॉयड और मंगोलॉयड प्रजातियों से सम्बद्ध हैं। देश की प्रमुख जनजातियां निम्नलिखित हैं-
आंध्र प्रदेश: चेन्चू, कोचा, गुड़ावा, जटापा, कोंडा डोरस, कोंडा कपूर, कोंडा रेड्डी, खोंड, सुगेलिस, लम्बाडिस, येलडिस, येरुकुलास, भील, गोंड, कोलम, प्रधान, बाल्मिक।
असम व नगालैंड: बोडो, डिमसा गारो, खासी, कुकी, मिजो, मिकिर, नगा, अबोर, डाफला, मिशमिस, अपतनिस, सिंधो, अंगामी।
झारखण्ड: संथाल, असुर, बैगा, बन्जारा, बिरहोर, गोंड, हो, खरिया, खोंड, मुंडा, कोरवा, भूमिज, मल पहाडिय़ा, सोरिया पहाडिय़ा, बिझिया, चेरू लोहरा, उरांव, खरवार, कोल, भील।
महाराष्ट्र: भील, गोंड, अगरिया, असुरा, भारिया, कोया, वर्ली, कोली, डुका बैगा, गडावास, कामर, खडिया, खोंडा,  कोल, कोलम, कोर्कू, कोरबा, मुंडा, उरांव, प्रधान, बघरी।
पश्चिम बंगाल: होस, कोरा, मुंडा, उरांव, भूमिज, संथाल, गेरो, लेप्चा, असुर, बैगा, बंजारा, भील, गोंड, बिरहोर, खोंड, कोरबा, लोहरा।
हिमाचल प्रदेश: गद्दी, गुर्जर, लाहौल, लांबा, पंगवाला, किन्नौरी, बकरायल।
मणिपुर: कुकी, अंगामी, मिजो, पुरुम, सीमा।
मेघालय: खासी, जयन्तिया, गारो।
त्रिपुरा: लुशाई, माग, हलम, खशिया, भूटिया, मुंडा, संथाल, भील, जमनिया, रियांग, उचाई।
कश्मीर: गुर्जर।
गुजरात: कथोड़ी, सिद्दीस, कोलघा, कोटवलिया, पाधर, टोडिय़ा, बदाली, पटेलिया।
उत्तर प्रदेश: बुक्सा, थारू, माहगीर, शोर्का, खरवार, थारू, राजी, जॉनसारी।
उत्तरांचल: भोटिया, जौनसारी, राजी।
केरल: कडार, इरुला, मुथुवन, कनिक्कर, मलनकुरावन, मलरारायन, मलावेतन, मलायन, मन्नान, उल्लातन, यूराली, विशावन, अर्नादन, कहुर्नाकन, कोरागा, कोटा, कुरियियान,कुरुमान, पनियां, पुलायन, मल्लार, कुरुम्बा।
छत्तीसगढ़: कोरकू, भील, बैगा, गोंड, अगरिया, भारिया, कोरबा, कोल, उरांव, प्रधान, नगेशिया, हल्वा, भतरा, माडिया, सहरिया, कमार, कंवर।
तमिलनाडु: टोडा, कडार, इकला, कोटा, अडयान, अरनदान, कुट्टनायक, कोराग, कुरिचियान, मासेर, कुरुम्बा, कुरुमान, मुथुवान, पनियां, थुलया, मलयाली, इरावल्लन, कनिक्कर,मन्नान, उरासिल, विशावन, ईरुला।
कर्नाटक: गौडालू, हक्की, पिक्की, इरुगा, जेनु, कुरुव, मलाईकुड, भील, गोंड, टोडा, वर्ली, चेन्चू, कोया, अनार्दन, येरवा, होलेया, कोरमा।
उड़ीसा: बैगा, बंजारा, बड़होर, चेंचू, गड़ाबा, गोंड, होस, जटायु, जुआंग, खरिया, कोल, खोंड, कोया, उरांव, संथाल, सओरा, मुन्डुप्पतू।
पंजाब: गद्दी, स्वागंला, भोट।
राजस्थान:मीणा, भील, गरसिया, सहरिया, सांसी, दमोर, मेव, रावत, मेरात, कोली।
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह: औंगी आरबा, उत्तरी सेन्टीनली, अंडमानी, निकोबारी, शोपन।
अरुणाचल प्रदेश: अबोर, अक्का, अपटामिस, बर्मास, डफला, गालोंग, गोम्बा, काम्पती, खोभा मिसमी, सिगंपो, सिरडुकपेन।

15. भारत का प्रशासनिक विभाजन

भारत को प्रशासनिक रूप से 29 राज्यों व 7 संघ राज्य क्षेत्रों में बांटा गया है| भारत की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्वयं एक संघ राज्य क्षेत्र है| इसके अतिरिक्त प्रत्येक राज्य की एक राजधानी है, जो सामान्यतः उस राज्य का सबसे प्रमुख शहर होता है|

भारत का नवीनतम राज्य तेलंगाना है| भारत के राज्य व संघ राज्य क्षेत्र आकार, संस्कृति, भाषा, इतिहास व आर्थिक विकास आदि की दृष्टि से एक दूसरे से काफी भिन्न हैं| भारत के राज्य व संघ राज्य क्षेत्रों का विभाजन प्रायः ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भाषायी व आर्थिक विकास के आधार पर किया गया है|

भारतीय राज्यों की सूची
1. आंध्र प्रदेश
2. अरुणाचल प्रदेश
3. असम
4. बिहार
5. कर्नाटक
6. केरल
7. छत्तीसगढ़
8. उत्तर प्रदेश
9. गोवा
10. गुजरात
11. हरियाणा
12. हिमाचल प्रदेश
13. जम्मू एवं कश्मीर
14. झारखंड
15. पश्चिम बंगाल
16. मध्य प्रदेश
17. महाराष्ट्र
18. मणिपुर
19. मेघालय
20. मिजोरम
21. नागालैंड
22. ओडिशा
23. पंजाब
24. राजस्थान
25. सिक्किम
26. तमिलनाडु
27. तेलंगाना
28. त्रिपुरा
29. उत्तराखंड

 

भारत के संघ राज्य क्षेत्रों की सूची
1. अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह
2. पुद्दुचेरी
3. दादर एवं नागर हवेली 
4. दमन एवं दीव 
5. दिल्ली
6. चंडीगढ़
7. लक्षद्वीप

क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत के पाँच सर्वाधिक क्षेत्रफल वाले राज्य (घटते क्रम में) निम्नलिखित हैं:

  1. राजस्थान
    2. मध्य प्रदेश
    3. महाराष्ट्र
    4. उत्तर प्रदेश
    5. जम्मू एवं कश्मीर

क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत के पाँच न्यूनतम क्षेत्रफल वाले राज्य (बढ़ते क्रम में) निम्नलिखित हैं:

  1. गोवा
    2. सिक्किम
    3. त्रिपुरा
    4. नागालैंड
    5. मिजोरम

महत्वपूर्ण तथ्य

  • पुद्दुचेरी संघ राज्य क्षेत्र तीन राज्यों में विस्तृत है: पुद्दुचेरी- तमिलनाडु, यनम-आंध्र प्रदेश और माहे-केरल\
  • दिल्ली व पुद्दुचेरी दो ऐसे संघ राज्य क्षेत्र हैं, जहाँ विधानसभा पायी जाती है\
  • दिल्ली एकमात्र ऐसा संघ राज्य क्षेत्र है, जिसका अपना एक अलग उच्च न्यायालय है|
  • भारत के जम्मू एवं कश्मीर राज्य को भारतीय संविधान के अनुच्छेद-370 के तहत बाकी राज्यों से अलग विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है|
  • भारत के दो द्वीपसमूह हैं, जिनके नाम ‘अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह’ (बंगाल की खाड़ी में स्थित) तथा ‘लक्षद्वीप’ (अरब सागर में स्थित) हैं| यह दोनों भारत के संघ राज्य क्षेत्र हैं|
  • भाषायी आधार पर गठित भारत का पहला राज्य आंध्र प्रदेश था\
  • भारत के गृह मंत्रालय द्वारा भारत के राज्यों व संघ राज्य क्षेत्रों को क्षेत्रीय आधार पर पूर्वी क्षेत्रीय परिषद , पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद, दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद, उत्तरी क्षेत्रीय परिषद व मध्य क्षेत्रीय परिषद में बाँटा गया है\
  • 100 चैनल (100उ. अक्षांश) अंडमान को निकोबार से अलग करता है और 80 चैनल (80उ. अक्षांश) मिनीकॉय (लक्षद्वीप) को मालदीव से अलग करता है | इसी तरह 90 चैनल (90उ. अक्षांश) मिनीकॉय को लक्षद्वीप के बाकी द्वीपों से अलग करता है|

16. भारत की अवस्थिति एवं विस्तार

भारत अक्षांशीय दृष्टि से उत्तरी गोलार्द्ध और देशांतरीय दृष्टि से पूर्वी गोलार्द्ध में स्थित देश है|भारत का अक्षांशीय विस्तार 804’ उ. से 3706’ उ. तक तथा देशांतरीय विस्तार 6807’ पू. से 97025’ पू. तक है| अत्यधिक देशांतरीय विस्तार के कारण भारत के पूर्वी भाग की तुलना में पश्चिमी भाग के सूर्योदय में लगभग दो घंटे का अंतर पाया जाता है| लेकिन सम्पूर्ण भारत में समय की एकता को बनाए रखने के लिए 82030’  पू. देशांतर के स्थानीय समय को सम्पूर्ण भारत के मानक समय निर्धारित किया गया है, जिसे ‘भारतीय मानक समय’ (IST) कहा जाता है और 82030’  पू. देशांतर को भारत की मानक मध्याह्न रेखा (Standard Meridian of India) कहा जाता है| भारत का कुल क्षेत्रफल 3.28 मिलियन वर्ग किमी. है और क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा देश है| यहाँ सम्पूर्ण विश्व के क्षेत्रफल का लगभग 2% भाग भारत में स्थित है|

कर्क रेखा भारत को लगभग दो भागों में बाँटती है,इसीलिए कर्क रेखा के उत्तर में स्थित भारतीय भूभाग को ‘उपोष्ण भारत’ (Sub-tropical India) और कर्क रेखा के दक्षिण में स्थित भूभाग को उष्ण-कटिबंधीय भारत (Tropical India) कहा जाता है|

भारत का उत्तर से दक्षिण विस्तार 3214 किमी. और पूर्व से पश्चिम विस्तार 2933 किमी. है| इसकी स्थलीय सीमा 15,200 किमी. लंबी है और मुख्य भूमि व द्वीपों सहित तटीय सीमा की लंबाई 7516 किमी. है| भारत की मुख्य भूमि के तटीय भाग की लंबाई 6100 किमी. है|

भारत उत्तर में हिमालय पर्वत, पश्चिम में थार मरुस्थल, पूर्व में उत्तर पूर्व की पहाड़ियों और दक्षिण में पठारी भाग से घिरा हुआ है| दक्षिणी पठारी भाग को भारतीय प्रायद्वीप कहा जाता है, क्योंकि यह तीन ओर से सागर से घिरा हुआ है| प्रायद्वीप के पश्चिम में अरब सागर और पूर्व में बंगाल की खड़ी स्थित है| मन्नार की खड़ी के द्वारा यह श्रीलंका से अलग होता है|

  1. भारत कीस्थलीय सीमानिम्नलिखित सात देशों से मिलती है:

चीन, बांग्लादेश,पाकिस्तान, अफगानिस्तान,भूटान,नेपाल और म्यांमार |

  1. भारत कीजलीय सीमानिम्नलिखित सात देशों से मिलती है:

पाकिस्तान,श्रीलंका,मालदीव, बांग्लादेश, म्यांमार, थायलैंड और इंडोनेशिया|

  1. भारत कीजलीय स्थलीय सीमासे लगे देश निम्नलिखित हैं:

बांग्लादेश, म्यांमार और पाकिस्तान|

17. भारत के पड़ोसी देशों व स्थलीय सीमा रेखाओं के नाम

क्षेत्रफल व जनसंख्या की दृष्टि से भारत दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा देश है, जिसकी सीमाएँ सात देशों से मिलती हैं| भारत के 17 राज्यों की सीमाएँ इन पड़ोसी देशों से मिलती हैं|

पड़ोसी देश सीमा रेखा की लंबाई(किमी. में) सीमा से लगे भारतीय राज्यों की संख्या सीमा से लगे भारतीय राज्यों के नाम
बांग्लादेश 4096.7 5 पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम
चीन 3488 5 जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश
पाकिस्तान 3323 4 जम्मू एवं कश्मीर, पंजाब, राजस्थान, गुजरात
नेपाल 1751 5 उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, बिहार
म्यांमार 1643 4 अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम
भूटान 699 4 सिक्किम , पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश
अफगानिस्तान 106 1 जम्मू एवं कश्मीर (PoK)
  • रेडक्लिफ रेखा– यह रेखा भारत और पाकिस्तान व भारत और बांग्लादेश को अलग करती है| मूलतः भारत और पाकिस्तान के बीच की इस रेडक्लिफ रेखा का निर्धारणसर सायरिल रेडक्लिफ द्वारा वर्ष 1947 में किया गया था| इस रेखा के निर्धारण के समय बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था और पाकिस्तान का ही हिस्सा था| बाद में पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश के रूप में स्वतंत्र होने के बाद रेडक्लिफ रेखा भारत और बांग्लादेश के बीच की भी सीमा रेखा बन गयी|
  • मैकमोहन रेखा– मैकमोहन रेखा भारत को चीन से अलग करती है और इसका निर्धारणसर हेनरी मैकमोहन द्वारा वर्ष 1914 में किया गया था|
  • डूरंड रेखाडूरंड रेखा भारत को अफगानिस्तान से अलग करती है| इस रेखा का निर्धारण सर हेनरी मोर्टिमर डूरंड द्वारा वर्ष 1896 में किया गया था| भारत के विभाजन से पूर्व, भारत व पाकिस्तान एक ही देश थे, भारत व अफगानिस्तान की सीमा का निर्धारण डूरंड रेखा द्वारा ही होता था| यह भारत की सबसे छोटी सीमा रेखा है और वर्तमान में ‘पाक-अधिकृत कश्मीर’ (PoK) और अफगानिस्तान को अलग करती है|

वर्ष 1947 में भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान भारत और पाकिस्तान के मध्य स्थित तब तक स्वतंत्र जम्मू-कश्मीर रियासत पर स्थानीय जनजातियों के सहयोग से पाकिस्तान ने आक्रमण कर दिया| इसके बाद जम्मू-कश्मीर रियासत के महाराज हरी सिंह ने भारत से मदद मांगी और भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये| भारतीय सेना द्वारा आक्रमणकारियों को खदेड़ दिया गया लेकिन जम्मू-कश्मीर के जिस क्षेत्र पर पाकिस्तान द्वारा कब्जा कर लिया गया था उसे वापस नहीं लिया जा सका क्योंकि यह सीमा विवाद संयुक्त राष्ट्र संघ में चला गया| अतः भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य का वह हिस्सा जो पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है, ‘पाकअधिकृत कश्मीर (PoK) कहलाता है|

18. भारत का भौतिक विभाजन

भारत में लगभग सभी प्रकार के भौगोलिक उच्चावच पाये जाते हैं| इसका कारण भारत का वृहद विस्तार व तटीय अवस्थिति है| भौगोलिक रूप से भारत को पाँच इकाईयों में बांटा जाता है:

  • उत्तर का महान पर्वतीय भाग
  • उत्तरी भारतीय मैदान
  • प्रायद्वीपीय पठार
  • तटीय मैदान
  • द्वीप

भारत के प्रशासनिक विभाजन के बारे मैं जानने के लिए क्लिक करें:

भारत का प्रशासनिक विभाजन

उत्तर का महान पर्वतीय भाग

उत्तर के महान पर्वतीय भाग को दो भागों में बांटा जाता है-

  1. ट्रांस हिमालय
  2. हिमालय

ट्रांस हिमालय पर्वतीय भाग हिमालय के उत्तर में स्थित है, जिसमें काराकोरम, लद्दाख और जास्कर पर्वत श्रेणियाँ शामिल हैं| इस पर्वतीय क्षेत्र की चौड़ाई 150 किमी. से 400 किमी. के बीच पायी जाती है| विश्व की दूसरी सबसे ऊँची चोटी, K-2 (गॉडविन आस्टिन) सहित कुछ अन्य सबसे ऊँची पर्वत चोटियाँ पायी जाती हैं| काराकोरम में बाल्टोरो और सियाचिन जैसे वृहद ग्लेशियर पाये जाते हैं|

सिंधु नदी से लेकर दिहांग या सिंधु नदी तक के पर्वतीय भाग को हिमालय श्रंखला कहा जाता है| हिमालय का अर्थ होता है- ‘हिम का घर’| हिमालय पर्वत श्रंखला का निर्माण तृतीयक कल्प/टर्शियरी युग में अवसादों के मुड़ने से वलित पर्वतों के रूप में हुआ है| प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के अनुसार हिमालय का निर्माण भारतीय प्लेट और यूरोपीय प्लेट के आपस में टकराने और संभवतः भारतीय प्लेट के यूरोपीय प्लेट के नीचे धँसने के कारण अवसादों के मुड़ने से हुआ है| इसीलिए हिमालय को ‘नवीन वलित पर्वत श्रंखला’ कहा जाता है|

हिमालय में उत्तर से दक्षिण तीन समानान्तर पर्वत श्रेणियाँ पायी जाती हैं, जिनकी ऊँचाई दक्षिण से उत्तर की ओर क्रमशः बढ़ती जाती है| इन श्रेणियों के नाम हैं:

  1. ‘वृहत हिमालय’ या ‘हिमाद्रि’
  2. ‘मध्य हिमालय’ ‘हिमाचल’ या ‘लघु हिमालय’
  3. ‘शिवालिक’

हिमालय की सबसे उत्तरी श्रेणी को ‘वृहत हिमालय या ‘हिमाद्रि के नाम से जानते हैं| यह हिमालय की सबसे ऊँची श्रेणी है, जिसकी औसत ऊँचाई 6000 मी. है| इसी श्रेणी में भारत की सर्वोच्च चोटी ‘कंचनजुंगा’ (सिक्किम) स्थित है और इसी श्रेणी में नेपाल में विश्व की सबसे ऊँची पर्वत चोटी ‘एवरेस्ट’ (8,848 मी.) स्थित है|

वृहद हिमालय श्रेणी के दक्षिण में स्थित हिमालयी पर्वत श्रेणी को मध्य हिमालय’, ‘हिमाचलया ‘लघु हिमालय कहा जाता है| इसकी औसत ऊँचाई 4000-4500 मी. है| डलहौजी, शिमला, धर्मशाला, मसूरी जैसे पर्वतीय पर्यटक स्थल इसी श्रेणी में स्थित हैं|इनकी ढालों पर वन व घास के मैदान पाये जाते हैं|इसकी औसत चौड़ाई लगभग 80 किमी. है|

लघु हिमालय के दक्षिण में हिमालय की सबसे दक्षिणी श्रेणी को ‘शिवालिक कहा जाता है| यह हिमालय की सबसे निचली पर्वत श्रेणी है, जिसकी औसत ऊँचाई 1200-1500 मी. के बीच है| इस श्रेणी का निर्माण अवसादी चट्टानों, असंगठित पत्थरों व सिल्ट से हुआ है|यह पश्चिम से पूर्व तक लगातार विस्तृत न होकर पूर्व में अन्य श्रेणियों से मिल जाती है| इसकी चौड़ाई 10-50 किमी. के बीच पायी जाती है| इस श्रेणी में पायी जाने वाली कुछ संकरी घाटियों को ‘दून कहा जाता है, जैसे-देहारादून इसी तरह की एक घाटी में स्थित शहर है|

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म्यांमार की सीमा के सहारे विस्तृत हिमालय के पूर्वी विस्तार को पूर्वान्चल की पहाड़ियाँकहा जाता है| पूर्वान्चल में पटकई बूम, गारो-ख़ासी-जयंतिया, लुशाई हिल्स, नागा हिल्स और मिज़ो हिल्स जैसी हिल्स शामिल हैं|

उत्तरी भारतीय मैदान

उत्तर के महान पर्वतीय भाग के दक्षिण में ‘उत्तरी भारतीय मैदान’ पाया जाता है| हिमालय के निर्माण के समय शिवालिक के दक्षिण में एक खाई का निर्माण हो गया था, जिसमें गंगा और ब्रह्मपुत्र की नदियों द्वारा लाये गए अवसादों के निक्षेपण से भारत के उत्तरी मैदान का निर्माण हुआ है| यह मैदान पश्चिम में सतलज नदी से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक लगभग 2500 किमी. की लंबाई में फैला हुआ है| इसका निर्माण नदी द्वारा लाये गए जलोढ़ से हुआ है, इसीलिए यह भारत के सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्र हैं| इस मैदान की पुरानी जलोढ़ को ‘बांगरकहा जाता है और नवीन जलोढ़ को ‘खादर कहा जाता है| पश्चिम से पूर्व की ओर इस मैदान की चौड़ाई कम होती जाती है| भारत के उत्तरी मैदान को वृहद रूप से निम्नलिखित दो उप-भागों में बांटा जाता है:

  1. गंगा का मैदान
  2. ब्रह्मपुत्र का मैदान

यह दोनों मैदान एक सँकरे भाग द्वारा आपस में जुड़े हुए हैं|

प्रायद्वीपीय पठार

उत्तर भारतीय मैदान के दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार स्थित है, जोकि भारत का सर्वाधिक प्राचीन भाग है| भारत का प्रायद्वीपीय पठार प्राचीन गोंडवानालैंड का हिस्सा है, जो गोंडवानालैंड के विभाजन के बाद उत्तर की ओर खिसककर अपने वर्तमान स्वरूप में आ गया है| इसका निर्माण प्राचीन व कठोर आग्नेय चट्टानों से हुआ है|

प्रायद्वीपीय पठार को वृहद रूप से दो मुख्य भागों में बांटा जाता है:

  1. मध्य उच्चभूमि
  2. दक्कन का पठार

विंध्य पर्वतों के उत्तर में स्थित प्रायद्वीप के उत्तरी भाग को ‘मध्य उच्चभूमि’ के नाम से जाना जाता है| यह उत्तर-पश्चिम में अरावली पर्वत, उत्तर में गंगा के मैदान से घिरा हुआ है| मध्य उच्चभूमि को भी पश्चिम से पूर्व विभिन्न पठारों में बांटा गया है:

मध्य उच्चभूमि के पश्चिमी भाग को ‘मालवा पठार के नाम से जाना जाता है तथा पूर्वी भाग को ‘छोटानागपुर के पठार’ के नाम से जाना जाता है और इन दोनों के मध्य में ‘बुंदेलखंड व ‘बघेलखंड का पठार पाया जाता है|

दक्कन के पठार का विस्तार उत्तर में विंध्य पर्वत से लेकर प्रायद्वीप के दक्षिणी सिरे तक है| यह पश्चिम में ‘पश्चिमी घाट और पूर्व में ‘पूर्वी घाट से घिरा हुआ है| पूर्वी घाट की तुलना में पश्चिमी घाट अधिक सतत व ऊँचा है| पश्चिमी घाट में सहयाद्रि, नीलगिरी, अन्नामलाई व कार्डमम पहाड़ियाँ शामिल हैं| पश्चिमी घाट की ऊँचाई उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती जाती है| भारतीय प्रायद्वीप की सबसे ऊँची चोटी ‘अन्नामलाई है, जिसकी ऊँचाई 2695 मी. है|

दक्कन के पठार का उत्तर-पश्चिमी भाग लावा प्रवाह से बना हुआ है, जिसे ‘दक्कन ट्रेपकहते हैं| उत्तर की ओर प्रवाहित होने के दौरान प्रायद्वीपीय पठार पर दरारी ज्वालामुखी की क्रिया हुई और दक्कन ट्रेप का निर्माण हुआ| दक्कन ट्रेप लगभग सम्पूर्ण महाराष्ट्र तथा गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश के कुछ भागों में पाया जाता है|

प्रायद्वीपीय पठार की अधिकांध नदियां, जैसे-गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि पूर्व की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में जाकर गिरती हैं, लेकिन नर्मदा व तापी जैसी प्रायद्वीपीय नदियां पश्चिम की ओर बहती हुई अरब सागर में जाकर गिरती हैं|

तटीय मैदान

दक्कन का पठार दोनों ओर से तटीय मैदानों से घिरा हुआ है| पश्चिमी तटीय मैदान गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक व केरल राज्यों के सहारे विस्तृत है| पश्चिमी तटीय मैदान उत्तर में सर्वाधिक चौड़ा है और दक्षिण की ओर जाने पर यह संकरा होता जाता है| महाराष्ट्र के तटीय मैदान को ‘कोंकण तट कहा जाता है और केरल के तटीय मैदान को ‘मालाबार तट कहा जाता है| पश्चिमी तटीय मैदान में नर्मदा व तापी नदियों के ज्वारनदमुख, केरल की लैगून झीलें पायी जाती हैं|

पूर्वी तटीय मैदान पश्चिमी तट की तुलना में अधिक चौड़ा व समतल है, जो अनेक बड़ी-बड़ी प्रायद्वीपीय नदियों के डेल्टाओं के द्वारा विच्छेदित हो गया है| उत्तर में यह मैदान गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदान से जाकर मिल जाता है| पूर्वी तट के उत्तरी तटीय मैदान को ‘उत्तरी सरकार व दक्षिण में तमिलनाडु के सहारे विस्तृत तटीय मैदान को कोरोमंडल तट कहा जाता है|

 

द्वीप

केरल तट के पश्चिम में अनेक छोटे-छोटे द्वीप पाये जाते हैं, जिन्हें सम्मिलित रूप से ‘लक्षद्वीपकहा जाता है| इन द्वीपों की उत्पत्ति स्थानीय आधार पर हुई है और इनमें से अधिकांश प्रवाल द्वीप हैं| बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीपों को सम्मिलित रूप से ‘अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह कहा जाता है| ये द्वीप आकार में बड़े होने के साथ-साथ संख्या में भी अधिक हैं| इनमें से कुछ द्वीपों की उत्पत्ति ज्वालामुखी क्रिया से हुई है,जबकि अन्य द्वीपों का निर्माण पर्वतीय चोटियों के सागरीय जल में डूबने से हुआ है| भारत का सबसे दक्षिणी बिंदु, जिसेइन्दिरा प्वाइंट कहा जाता है और जो 2005 में आई सूनामी के कारण डूब गया था, ग्रेट निकोबार द्वीप में स्थित है|

19. उत्तर भारत के मैदान का संरचनात्मक विभाजन

उत्तर भारत का मैदान हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत के मध्य स्थित एक लगभग समतल व उपजाऊ मैदान है|हिमालय से आने वाली नदियों (जैसे-गंगा,यमुना,कोसी,ब्रह्मपुत्र आदि) व प्रायद्वीप से आने वाली नदियों (जैसे-चंबल,सोन आदि) ने अपने साथ लाये गए जलोढ़ के निक्षेपण द्वारा इस मैदान को भारत का सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्र बना दिया है| संरचना और ढाल के आधार पर उत्तर भारत के मैदान को निम्नलिखित चार भागों में बाँटा जाता है:

  1. भाबर
  2. तराई
  3. खादर
  4. बांगर

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भाबर

यह शिवालिक के पर्वतपाद पर सिंधु से लेकर तीस्ता तक एक पट्टी के रूप में विस्तृत है| यह कंकरीला और पारगम्य मैदानी भाग है, जिसका निर्माण नदियों द्वारा लाये गए कंकड़ व अन्य पथरीले अवसादों के हिमालय से उतरते समय निक्षेपण से होता है, जिन्हें ‘जलोढ़ पंख’ या ‘जलोढ़ शंकु’ कहा जाता है| पहाड़ों से उतरती हुई नदियां इस क्षेत्र में आकर विलुप्त हो जाती हैं|

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तराई

यह भाबर के दक्षिण में स्थित एक पट्टी है, जिसका निर्माण महीन बालू और कीचड़ से होता है| भाबर क्षेत्र में विलुप्त हुई नदियां यहाँ पुनः धरातल पर बहने लगती हैं|पूर्व में यह क्षेत्र घने वनों से ढका हुआ था लेकिन वर्तमान में उनका निर्वनीकरण हो गया है और यह क्षेत्र कृषि भूमि में बदल गया है|यह एक दलदली क्षेत्र होता है|

बांगर

यह पुरानी जलोढ़ मृदा से निर्मित मैदान है, जिसका विस्तार दो नदियों के बीच स्थित दोआब क्षेत्र में पाया जाता है| इसकी ऊँचाई  खादर की तुलना में अधिक होती है| ये बाढ़ के मैदानों से ऊपर स्थित होते हैं और खादर मैदान की तुलना में कम उपजाऊ होते हैं|

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खादर

यह नवीन जलोढ़ मृदा से निर्मित मैदान है, जिसकी ऊँचाई बांगर से कम होती है| प्रत्येक वर्ष आने वाली बाढ़ के द्वारा लाये जलोढ़ अवसादों के निक्षेपण के कारण इसका नवीनीकरण होता रहता है| इसीलिए यह सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्र होता है| बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल खादर क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं|

20. भारत के द्वीप समूह: अंडमान और निकोबार व लक्षद्वीप

भारत के द्वीप समूह को दो भागों में बांटा जाता है: अरब सागर में स्थित ‘अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा बंगाल की खाड़ी में स्थित ‘लक्षद्वीप समूह|

अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह

बंगाल की खाड़ी या अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में लगभग 572 द्वीप स्थित हैं, जिनमें से अधिकांश 6°उ.-14°उ. अक्षांश और 92°पू.-94°पू. देशांतर के मध्य स्थित हैं| इन द्वीपों को दो भागों में बाँटा जाता है:

  1. उत्तर मेंअंडमान द्वीपसमूह
  2. दक्षिण मेंनिकोबार द्वीपसमूह

ये दोनों द्वीपसमूह 10चैनल द्वारा एक-दूसरे से अलग होते हैं|

अंडमान द्वीपसमूह में स्थित प्रमुख द्वीपों का उत्तर से दक्षिण क्रम इस प्रकार है:

  • उत्तरी अंडमान
  • मिडिल/मध्य अंडमान
  • दक्षिणी अंडमान
  • लिटिल अंडमान

निकोबार द्वीपसमूह में स्थित प्रमुख द्वीपों का उत्तर से दक्षिण क्रम इस प्रकार है:

  • कार निकोबार
  • लिटिल निकोबार
  • ग्रेट निकोबार

ऐसा माना जाता है कि इन द्वीपसमूहों का निर्माण सागर के जल में डूबी पर्वतीय चोटियों के जल के ऊपर आने से हुआ है| इनमें से कुछ छोटे द्वीपों की उत्पत्ति ज्वालामुखी क्रिया से हुई है| भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी ‘बैरन द्वीप निकोबार द्वीप समूह में ही स्थित है|

अंडमान और निकोबार भारत का एक संघशासित/केंद्रशासित प्रदेश है, जिसकी राजधानी साउथ अंडमान में स्थित ‘पोर्ट ब्लेयर है, जोकि भारत के प्रमुख पत्तनों में से एक हैं|इस द्वीपसमूह में भूमध्यरेखीय या विषुवतीय प्रकार की जलवायु व वनस्पति पायी जाती है और संवहनीय वर्षा होती है| सघन सदाबहार वन, प्रकृतिक सुंदरता और जनजातीय जनसंख्या व संस्कृति यहाँ की पहचान है| वर्तमान में यह भारत के एक प्रमुख पर्यटन केंन्द्र के रूप में विकसित हो चुका है| अंडमान और निकोबार ‘कोको चैनल के माध्यम से म्यांमार से औरग्रेट चैनल के माध्यम से इंडोनेशिया से अलग होता है|

लक्षद्वीप समूह

अरब सागर में स्थित द्वीपसमूहों अर्थात लक्षद्वीप का निर्माण प्रवाल संरचना से हुआ है, जोकि 8°उ.-12°उ. अक्षांश और 71°पू.-74°पू. देशांतर के मधी विस्तृत हैं| इन द्वीपों की संख्या 36 है, जिनमें से केवल 11 द्वीपों पर मानवीय अधिवास पाया जाता है| ये द्वीप केरल के तट से 280-480 किमी. पूर्व में स्थित हैं| लक्षद्वीप समूह को दो भागों में बाँटा जाता है:

  1. उत्तर मेंअमीनीदीवी कन्नानोर द्वीप समूह
  2. दक्षिण मेंमिनीकॉय द्वीप

Image Courtesy: upload.wikimedia.org

ये दोनों द्वीपसमूह 9चैनल द्वारा एक-दूसरे से अलग होते हैं और 8चैनल लक्षद्वीप को मालदीव से अलग करता है| मिनीकॉय लक्षद्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप है| लक्षद्वीप भारत का एक संघशासित/केंद्रशासित प्रदेश है, जिसकी राजधानी ‘कावारात्ती है| सुंदर पुलिनों (Beaches) और प्राकृतिक सुंदरता के कारण यह भारत के एक प्रमुख पर्यटन केंन्द्र के रूप में विकसित हो चुका है|

21. भारत का पूर्वी तटीय मैदान

भारत के पूर्वी तटीय मैदान का विस्तार पूर्वी घाट और पूर्वी तट के मध्य सुवर्णरेखा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक है| पूर्वी तटीय मैदान का विस्तार पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु राज्यों में है| इस मैदान में निक्षेपों की अधिकता है, क्योंकि गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी जैसी बंगाल की खाड़ी की ओर प्रवाहित होने वाली बड़ी-बड़ी नदियां सागर में मिलने से पूर्व यहाँ अवसादों का निक्षेपण करती हैं और डेल्टा का निर्माण करती हैं| अवसादों के निक्षेपण के कारण ही यह मैदान पश्चिमी तटीय मैदान की तुलना में अधिक चौड़ा है|

पूर्वी तटीय मैदान को दक्षिण-पश्चिम मानसून और उत्तर-पूर्वी मानसून दोनों मानसूनों से वर्षा प्राप्त होती है| चिकनी मिट्टी की प्रधानता के कारण इस मैदान में चावल की खेती अधिक की जाती है| पूर्वी तटीय मैदान में गोदावरी व कृष्णा नदियों के डेल्टा में कोल्लेरु झील स्थित है| चिल्का और पुलिकट झीलें, जोकि लैगून का उदाहरण हैं, भी पूर्वी तटीय मैदान पर स्थित हैं| ओडिशा का तटीय मैदान उत्कल मैदान कहलाता है|

पूर्वी तटीय मैदान को निम्न भागों में बांटा जाता है:

  • उत्तरी सरकार:गोदावरी व महानदी डेल्टा के बीच का मैदान
  • आंध्र मैदान:आंध्र प्रदेश का तटीय मैदान
  • कोरोमंडल:तमिलनाडु का तटीय मैदान

पूर्वी तटीय मैदान पर उत्तर से दक्षिण स्थित प्रमुख डेल्टा निम्नलिखित हैं:

  • महानदी डेल्टा:ओडिशा
  • गोदावरी डेल्टा: आंध्र प्रदेश
  • कृष्णा डेल्टा: आंध्र प्रदेश
  • कावेरी डेल्टा:तमिलनाडु

पूर्वी तटीय मैदान अत्यधिक अवसाद के निक्षेपण के कारण प्राकृतिक बन्दरगाहों/पत्तनों के विकास के अधिक अनुकूल नहीं है, इसीलिए इस तट पर प्रायः कृत्रिम पत्तन ही पाये जाते हैं| पूर्वी तटीय मैदान का जनसंख्या घनत्व पश्चिमी तटीय मैदान की तुलना में अधिक है| इस मैदान का ढाल अत्यधिक कम है,इसलिए नदियों का प्रवाह धीमा रहता है|

22. भारत का पश्चिमी तटीय मैदान

भारत के पश्चिमी तटीय मैदान का विस्तार गुजरात तट से लेकर केरल के तट तक है| इस मैदान को चार भागों में विभाजित किया जाता है-

  • गुजरात का तटीय मैदान– गुजरात का तटीय मैदान (इसे कच्छ और काठियावाड़/सौराष्ट्र का तटीय मैदान में बांटा जाता है|)
  • कोंकण का तटीय मैदान– महाराष्ट्र व गोवा का तटीय मैदान
  • कन्नड़ का तटीय मैदान– कर्नाटक का तटीय मैदान (इसे कनारा तटीय मैदान भी कहा जाता है|)
  • मालाबार का तटीय मैदान– केरल का तटीय मैदान

Image Courtesy: im.hunt.in

गुजरात का तटीय मैदान का कच्छ का मैदान शुष्क एवं अर्द्धशुष्क रेतीला मैदान है, लेकिन काठियाबाड़ तटीय मैदान (जिसे सौराष्ट्र का तटीय मैदान भी कहा जाता है) से होकर माही, साबरमती, नर्मदा तथा ताप्ती नदियाँ अरब सागर में गिरती हैं। कोंकण के तटीय मैदान पर साल, सागौन आदि के वनों की अधिकता है। कन्नड़ के तटीय मैदान का निर्माण प्राचीन रूपांतरित चट्टानों से हुआ है, जिस पर गरम मसालों, सुपारी, केला, आम, नारियल, आदि की कृषि की जाती है। मालाबार के तटीय मैदान में कयाल (लैगून) पाये जाते हैं, जिनका प्रयोग मछ्ली पकड़ने, अंतर्देशीय जल परिवहन के साथ-साथ पर्यटन स्थलों के रूप में किया जाता है| केरल की पुन्नामदा कयाल में प्रतिवर्ष नेहरू ट्रॉफी नौकायन दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है|

भारत का पश्चिमी तटीय मैदान गुजरात में सबसे चौड़ा है और दक्षिण की ओर जाने पर इसकी चौड़ाई कम होती जाती है, लेकिन केरल में यह फिर चौड़ा हो जाता है| अतः मध्य भाग में ये सबसे कम चौड़ा है| इस मैदान की औसत चौड़ाई 64 किमी. है। इस मैदान का  ढाल पश्चिम की ओर है, जिस पर छोटी-छोटी लेकिन तीव्रगामी नदियाँ प्रवाहित होती है। इस मैदान से होकर बहने वाली नदियाँ डेल्टा नहीं बनाती हैं|

ये मैदान वास्तव में पश्चिमी घाट के पश्चिम में उसके समानान्तर संकरी पट्टी के रूप में विस्तृत निमज्जित तटीय मैदान (Submerged Coastal Plain) हैं|निमज्जन के कारण यह मैदान भारत के समुद्री पत्तनों के निर्माण के लिए आदर्श प्राकृतिक परिस्थितियाँ उपलब्ध कराता है| कांडला, मुंबई, न्हावा-शेवा, मोर्मुगोआ, मंगलुरु, कोच्चि आदि पश्चिमी तटीय मैदान पर स्थित प्रमुख बंदरगाह/समुद्री पत्तन हैं|

 

23. भारत का पश्चिमी तटीय मैदान

भारत के पश्चिमी तटीय मैदान का विस्तार गुजरात तट से लेकर केरल के तट तक है| इस मैदान को चार भागों में विभाजित किया जाता है-

  • गुजरात का तटीय मैदान– गुजरात का तटीय मैदान (इसे कच्छ और काठियावाड़/सौराष्ट्र का तटीय मैदान में बांटा जाता है|)
  • कोंकण का तटीय मैदान– महाराष्ट्र व गोवा का तटीय मैदान
  • कन्नड़ का तटीय मैदान– कर्नाटक का तटीय मैदान (इसे कनारा तटीय मैदान भी कहा जाता है|)
  • मालाबार का तटीय मैदान– केरल का तटीय मैदान

गुजरात का तटीय मैदान का कच्छ का मैदान शुष्क एवं अर्द्धशुष्क रेतीला मैदान है, लेकिन काठियाबाड़ तटीय मैदान (जिसे सौराष्ट्र का तटीय मैदान भी कहा जाता है) से होकर माही, साबरमती, नर्मदा तथा ताप्ती नदियाँ अरब सागर में गिरती हैं। कोंकण के तटीय मैदान पर साल, सागौन आदि के वनों की अधिकता है। कन्नड़ के तटीय मैदान का निर्माण प्राचीन रूपांतरित चट्टानों से हुआ है, जिस पर गरम मसालों, सुपारी, केला, आम, नारियल, आदि की कृषि की जाती है। मालाबार के तटीय मैदान में कयाल (लैगून) पाये जाते हैं, जिनका प्रयोग मछ्ली पकड़ने, अंतर्देशीय जल परिवहन के साथ-साथ पर्यटन स्थलों के रूप में किया जाता है| केरल की पुन्नामदा कयाल में प्रतिवर्ष नेहरू ट्रॉफी नौकायन दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है|

भारत का पश्चिमी तटीय मैदान गुजरात में सबसे चौड़ा है और दक्षिण की ओर जाने पर इसकी चौड़ाई कम होती जाती है, लेकिन केरल में यह फिर चौड़ा हो जाता है| अतः मध्य भाग में ये सबसे कम चौड़ा है| इस मैदान की औसत चौड़ाई 64 किमी. है। इस मैदान का  ढाल पश्चिम की ओर है, जिस पर छोटी-छोटी लेकिन तीव्रगामी नदियाँ प्रवाहित होती है। इस मैदान से होकर बहने वाली नदियाँ डेल्टा नहीं बनाती हैं|

ये मैदान वास्तव में पश्चिमी घाट के पश्चिम में उसके समानान्तर संकरी पट्टी के रूप में विस्तृत निमज्जित तटीय मैदान (Submerged Coastal Plain) हैं|निमज्जन के कारण यह मैदान भारत के समुद्री पत्तनों के निर्माण के लिए आदर्श प्राकृतिक परिस्थितियाँ उपलब्ध कराता है| कांडला, मुंबई, न्हावा-शेवा, मोर्मुगोआ, मंगलुरु, कोच्चि आदि पश्चिमी तटीय मैदान पर स्थित प्रमुख बंदरगाह/समुद्री पत्तन हैं|

24. भारत का पश्चिमी घाट पर्वतीय क्षेत्र

पश्चिमी घाट पर्वतीय क्षेत्र भारत के पश्चिमी तट के सहारे लगभग 1600 किमी. की लंबाई में महाराष्ट्र व गुजरात की सीमा से लेकर कुमारी अंतरीप तक विस्तृत है| यह दो भागों में बांटी जाती है-उत्तरी सहयाद्रि व दक्षिणी सहयाद्रि| इसे महाराष्ट्र व कर्नाटक में ‘सहयाद्रि’’ औरकेरल में ‘सहय पर्वतम कहा जाता है|

           पश्चिमी घाट

पश्चिमी घाट पर्वत श्रेणी को यूनेस्को ने अपनी विश्व विरासत स्थल सूची में शामिल किया है और यह विश्व के ‘जैवविविधता हॉटस्पॉट्स में से एक है| पश्चिमी घाट में उभयचरों, पक्षियों, स्‍तनपायियों व फूलों की अनेक  प्रजातियाँ पाई जाती हैं| यहाँ की जैवविविधता के संरक्षण के लिए ‘पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ समूह’ गठित किया था| यह पर्वत श्रंखला हिमालय पर्वत से भी प्राचीन है और भारत में मानसून की वर्षा को प्रभावित करती है| इसकी सबसे ऊंची चोटी अनाइमुडी है और पश्चिमी घाट की औसत ऊंचाई लगभग 900 मी. है| पश्चिमी घाट महाराष्ट्र व गुजरात की सीमा से लेकर गोवाकर्नाटक और केरल व तमिलनाडु की सीमा तक लगभग 16000 वर्ग किमी. में फैला हुआ है|

पश्चिमी घाट में स्थित पर्यटन केंद्र

महाबलेश्वर, पंचगनी, माथेरान,अंबेली घाट, कुद्रेमुख, कोडागु और लोनावाला-खंडाला जैसे पर्वतीय पर्यटन केंद्र इसी श्रेणी में स्थित हैं| शरावती नदी पर स्थित गरसोप्पा या जोग प्रपातभी पश्चिमी घाट में स्थित है, जोकि भारत के सर्वाधिक ऊँचे जलप्रपातों में से एक है|

                                           जोग जलप्रपात

प्रसिद्ध पर्वतीय पर्यटन केंद्र कोडाइकनाल (तमिलनाडु) पालनी पहाड़ियों पर स्थित है औरऊटी या उडगमंडलम/उतकमुंड (तमिलनाडु) नीलगिरी की पहाड़ियों पर स्थित है| केरल का साइलेंट वैली राष्ट्रीय पार्क पश्चिमी घाट का ही हिस्‍सा है।

पश्चिमी घाट के महत्वपूर्ण दर्रे

  • थालघाट:यह नासिक व मुंबई को जोड़ता है|
  • भोरघाट:यह पुणे व मुंबई को जोड़ता है|
  • पालघाट:यह केरल व तमिलनाडू को जोड़ता है (कोच्चि को चेन्नई से जोड़ता है)|
  • सेनकोट्टा:यह नागरकोइल और कार्डमम पहाड़ियों के मध्य स्थित है और तिरुवनन्तपुरम को मदुरै से जोड़ता है|