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S. No TOPIC
1. क्वांटम कम्प्यूटर
2. सुपर कम्प्यूटर
3. नेटवर्किंग
4. प्रोग्रामिंग भाषाएं
5. कम्प्यूटरों का परिचय
6. इंटरनेट का क्रमिक विकास

                  

क्वांटम कम्प्यूटर
भविष्य के कम्प्यूटर
सन् 2030 अथवा उसके आसपास आपके डेस्क पर रखा हुआ कम्प्यूटर ट्रांजिस्टरों और चिपों के स्थान पर द्रव से भरा हो सकता है। यह क्वांटम कम्प्यूटर होगा। यह भौतिक नियमों के द्वारा संचालित नहीं होगा। आपका यह कम्प्यूटर अपने ऑपरेशंस के लिए क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) का प्रयोग करेगा। क्वांटम यांत्रिकी ही टेलीपोर्टेशन (किसी वस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान पर बिना स्थान परिवर्तन के पहुँचाना) और सामानांतर ब्रह्मड (Parallel universe) जैसी सैद्धांतिक संकल्पनाओं का आधार है।

आपका यह क्वांटम कम्प्यूटर एक डाटा रॉकेट होगा। यह शायद पेन्टियम III पर्सनल कम्प्यूटर से 1 अरब गुना ज्यादा तेजी से गणना करने में सक्षम होगा। यह सन् 2030 में पलक झपकते ही पूरे इंटरनेट को खँगाल सकने में सक्षम होगा और सबसे एडवांस सिक्योरिटी कोड को आसानी से तोड़ देगा। यह कोई साइंस फिक्शन नहीं है बल्कि आने वाले कुछ वर्षों में सच्चाई की दुनिया में संभव होने वाला है।
क्वांटम कम्प्यूटर, कम्प्यूटर चिपों के स्थान पर परमाणुओं का प्रयोग गणना के लिए करते हैं।प्रारंभिक क्वांटम कम्प्यूटर काफी पुरातन, खर्चीले और परीक्षण के स्तर पर ही हैं। किंतु उनके निर्माण ने सिद्ध कर दिया है कि आने वाला समय इन्हीं कम्प्यूटरों का है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी की प्रयोगशालाओं में क्वांटम कम्प्यूटर से सम्बंधित प्रोजेक्टों पर जोर-शोर से कार्य जारी है। अमेरिकी सरकार ने लॉस अलामॉस नेशनल प्रयोगशाला में क्वांटम कम्प्यूटिंग लैब की स्थापना की है।
मगर यहां पर एक समस्या है कि सैद्धांतिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से क्वांटम कम्प्यूटिंग काफी कठिन कार्य है। व्यावहारिक रूप से ऐसी परिस्थिति पैदा करना जहाँ परमाणु गणना कर सकें और उनसे परिणाम प्राप्त हो, यह वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती है। सिद्धांत के दृष्टिïकोण से क्वांटम यांत्रिकी उन क्षेत्रों में डुबकी लगाती है जो सोचने के दायरे से लगभग बाहर हैं। उदाहरण के लिए यह संभव है कि क्वांटम कम्प्यूटर के पास अनंत संख्याओं वाले समानांतर ब्रह्मडों के लिए अनंत संख्या के सही उत्तर हों। आप जिस ब्रह्मïांड में इस समय हैं  क्वांटम कम्प्यूटर उसके लिए सही उत्तर दे सकता है। दुनिया के सबसे विख्यात क्वांटम कम्प्यूटिंग वैज्ञानिक आई बी एम के चाल्र्स बेनेट का इस बारे में कहना है कि इन चीजों को स्वीकार करने के लिए काफी साहस की जरूरत है। यदि आप इन चीजों में विश्वास करते हैं तो आपको कई विचित्र चीजों पर विश्वास करना होगा।
इसका परिणाम है कि व्यावहारिक क्वांटम कम्प्यूटिंग अभी भी दशकों दूर है। वर्तमान में वैज्ञानिकों के क्वांटम कम्प्यूटिंग प्रयास उसी तरह के हैं जैसे विद्युत के सिद्धांतों के परीक्षण के लिए बेंजामिन फ्रैंकलीन ने कड़कती बिजली में पतंग उड़ाई थी। प्रयोगशालाओं में कार्यरत् वैज्ञानिकों के लिए अगला चरण इस अविश्वसनीय शक्ति को नियंत्रित और उपयोग करने का है।

 

क्वांटम कम्प्यूटर के मूलभूत सिद्धांत
किसी गैर वैज्ञानिक व्यक्ति के लिए क्वांटम कम्प्यूटिंग की कार्य-प्रणाली को समझना काफी कठिन कार्य है। क्वांटम कम्प्यूटिंग का ख्याल वैज्ञानिकों के दिमाग में उस वक्त आया जब उन्होंने समझा कि परमाणु प्राकृतिक रूप से सूक्ष्म कैल्कुलेटर हैं। इस बारे में एमआईटी के नील गेर्शेनफेल्ड का कहना है कि ”प्रकृति को गणना करना मालूम है। गेर्शेनफेल्ड ने आई बी एम के आइज़क चुआँग के साथ मिलकर अभी तक के सबसे सफल क्वांटम कम्प्यूटर का निर्माण किया है।
परमाणुओं का एक प्राकृतिक चक्रण (Spin) अथवा ओरिएन्टेशन (orientation) होता है, जिस तरह से किसी दिक् सूचक (compass) में सुई का एक ओरिएन्टेशन होता है। यह चक्रण अप (ऊपर) या डाउन (नीचे) हो सकता है। यह डिजीटल तकनीक के साथ खूब मेल खाता है, जो प्रत्येक चीज को 1 या 0 की श्रेणी में निरूपित करती है। किसी परमाणु में ऊपर की ओर निर्देशित करने वाला चक्रण 1 हो सकता है; नीचे की ओर निर्देशित करने वाला चक्रण 0 हो सकता है। चक्रण को ऊपर या नीचे करना किसी सूक्ष्म ट्रांजिस्टर पर स्विच को ऑन या ऑफ करने के समान है (अथवा 1 और 0 के बीच)। एक परमाणु जो नँगी आँखों से दिखाई नहीं देता है, जब तक आप उसका मापन करें एक ही समय में ऊपर या नीचे दोनों जगह हो सकता है। यह अत्यन्त ही विस्मयकारी है। यह क्वांटम यांत्रिकी का हिस्सा है जो आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत की तरह नियमों का समुच्चय है- जिससे ब्रह्मïांड की कार्य प्रणाली समझी जा सकती है। क्वांटम यांत्रिकी के द्वारा सूक्ष्म अर्थात् अणु, परमाणु, क्वार्क इत्यादि के संसार को समझा जा सकता है। इसके नियम इतने विचित्र हैं कि उनको समझना आसान नहीं है। लेकिन उन्हें बार-बार सिद्ध किया जा चुका है। क्योंकि किसी परमाणु का चक्रण एक ही समय में ऊपर या नीचे दोनों हो सकता है, इसलिए ये पारम्परिक कम्प्यूटर के एक बिट के बराबर नहीं होता है। यह कुछ अलग है। वैज्ञानिक इसे क्यूबिट (Qubit) कहते हैं। यदि आप क्यूबिट्स के एक समूह को एक साथ रखें तो वे वर्तमान कम्प्यूटरों की तरह एकरेखीय (linear) गणनाएं नहीं करते हैं। वे एक ही समय में सभी संभावित गणनाएँ करते हैं। एक तरह से वे सभी संभावित उत्तरों की छानबीन करते हैं। क्यूबिट्स के मापन का कार्य गणना प्रक्रिया को रोक देता है और उन्हें एक विशेष उत्तर को चुनने पर मजबूर करता है।
चालीस क्यूबिट्स वाले क्वांटम कम्प्यूटर की गणना शक्ति वर्तमान के सुपर कम्प्यूटरों के बराबर होगी। वर्तमान का कोई भी सुपर कम्प्यूटर विश्व की सभी फोन बुकों के डाटाबेस से एक नम्बर ढूंढने में एक माह का वक्त लेगा, जबकि भविष्य के क्वांटम कम्प्यूटर इस कार्य को मात्र 27 मिनट में सम्पन्न कर देंगे।
विभिन्न प्रकार के चक्रण
क्वांटम यांत्रिकी का एक अन्य पहलू कम्प्यूटिंग के लिए काफी महत्वपूर्ण है। इसे इंटेंगलमेंट (Entanglement) कहते हैं। दो परमाणुओं पर लगने वाला बाह्यबल उन दोनों को एक दूसरे में फंसा अथवा उलझा सकता है। इसे ही इंटेंगलमेंट कहते हैं। वे दो परमाणु ब्रह्मïांड में चाहे कई प्रकाशवर्ष दूर ही क्यों न स्थित हों, आपस में उलझे ही रहेंगे। उनके चक्रण एक ही समय में सभी स्थितियों में होंगे। लेकिन जिस क्षण उलझे हुए कण का अवलोकन किया जाता है, उसका चक्रण एक तरफ दिखाई देता है। उसी क्षण दूसरे कण का चक्रण विपरीत दिशा में होता है।
एक तरह से यह सँचार (communication) है। यदि आप किसी उलझे हुए कण के चक्रण को एक तरफ ऊपर की स्थिति में देखें, तो आप अपने आप जान जाएंगे कि दूसरी ओर इसका चक्रण नीचे की ओर है। यह घटना तत्कालिक रूप से घटती है इसलिए यह प्रकाश की गति  के नियमों का उल्लंघन करती हुआ दिखाई देती है। इंटेंगलमेंट के सिद्धांतों से वैज्ञानिकों को विश्वास हो गया है कि इससे गणना की गति को बढ़ाया जा सकता है। वर्तमान के कम्प्यूटरों के साथ यह समस्या है कि उनकी गति प्रकाश की गति से निर्धारित होती है। चाहे वह क्वांटम या पारम्परिक कम्प्यूटर हों, इंटेंगलमेंट इस गति सीमा को पार कर सकता है।
क्वांटम कम्प्यूटर के लिए सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग की संकल्पना भी काफी अजूबी है। क्वांटम कम्प्यूटर के लिए प्रोग्रामिंग करने के लिए वर्तमान कम्प्यूटरों के कदम-दर-कदम तर्क का प्रयोग नहीं किया जा सकता है। इसके लिए क्यूबिट्स के विशिष्टï गुणों का प्रयोग करने वाले तर्क की जरूरत है। इसी कार्य को एटीएंड टी बेल लैब्ज़ के लव ग्रोवर ने किया जब उन्होंने एक विधि-विशेष (algorithm) अथवा गणितीय प्रोग्राम का आविष्कार किया जो डाटाबेस को सर्च करने के लिए क्वांटम कम्प्यूटिंग का प्रयोग करता है। वे इस तथ्य की तालाब में कई कंकड़ एक साथ गिराने से तुलना करते हैं जिससे तरंगें एक विशेष तरीके से एक-दूसरे को काटती हैं व असर डालती हैं। ग्रोवर की विधि-विशेष से गणना के बहुमार्गों की स्थापना होती है, जिससे सभी एक दूसरे के लिए व्यतिकारी (interferring) हो जाते हैं। ग्रोवर का कहना है, ”सही उत्तर रचनात्मक रूप से व्यक्तिकरण (interferrence) करते हैं और जुड़ जाते हैं।” यह एक प्रकार की पश्च गणन (backward computing) है। इसमें आप मान लेते हैं कि कम्प्यूटर सभी संभावित उत्तरों को जानता है और इसे उचित उत्तर ढूंढना है।
1990 के दशक के दौरान ग्रोवर, बेनेट और गेर्शेनफेल्ड मात्र सिद्धांत के स्तर पर ही हाथ-पैर मारते रहे। लेकिन अहम प्रश्न है कि कैसे कार्यशील क्वांटम कम्प्यूटर का निर्माण किया जाए? हाल के वर्षों में इसके कुछ उत्तर मिले हैं। गेर्शेनफेल्ड-चुआँग द्वारा निर्मित क्वांटम कम्प्यूटर पारम्परिक कम्प्यूटरों की भांति बिल्कुल नहीं लगता है। यह एक न्यूक्लियर टोस्टर (Nuclear toaster) ज्यादा लगता है। क्वांटम कम्प्यूटिंग की सबसे बड़ी समस्या है कि गणना करने वाले परमाणुओं को उनके चारों ओर के वातावरण से पूर्णतया पृथक करना होता है। किसी अन्य परमाणु अथवा प्रकाश के कण के साथ किसी भी प्रकार का संबंध उपकरण के परमाणु के चक्रण की दिशा पर प्रभाव डालता है, जिससे गणना पर प्रभाव पड़ता है। फिर भी यदि क्वांटम कम्प्यूटर की प्रोग्रामिंग करना है तो ऐसा होना असंभव है।
क्लोरोफॉर्म के परमाणु
कुछ समय पूर्व गेर्शेनफेल्ड और चुआँग ने ब्रेन स्कैन के लिए प्रयोग किए जाने वाली न्यूक्लियर मेग्नेटिक रेज़ोनेंस मशीन (NMR) का प्रयोग क्वांटम कम्प्यूटर के निर्माण के लिए किया। उन्होंने एक टेस्ट ट्यूब को क्लोरोफॉर्म द्रव से भरा। क्लोरोफॉर्म का निर्माण कार्बन और हाईड्रोजन परमाणुओं से होता है। फिर उन्होंने इस टेस्ट ट्यूब को नियंत्रित चुम्बकीय स्पंदन उत्सर्जित करने वाले मेग्नेटिक क्वायल के पास रखा। क्लोरोफॉर्म परमाणुओं की विशेषता होती है कि वे अपने चक्रण के साथ नाचते हैं। ऐसा प्राकृतिक है। न्यूक्लियर मेग्नेटिक रेज़ोनेंस द्वारा उत्सर्जित स्पंदन क्लोरोफार्म परमाणुओं के नृत्य के दौरान कुछ परमाणुओं को धक्का देते हैं, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से अन्य परमाणुओं के चक्रण प्रभावित होते हैं। इस तरह से बिना किसी संपर्क के कार्बन परमाणु के चक्रणों को प्रोग्राम किया जा सकता है, जिससे वे क्वांटम कम्प्यूटरों की तरह कार्य करते हैं। नर्तन से चुम्बकीय क्षेत्र में हल्का कूजन (slight warbling) उत्पन्न होती है। इस कूजन के मापन से वैज्ञानिक क्वांटम गणनाओं के परिणाम को पढ़ सकते हैं। एनएमआर चक्रणों को निश्चित अंतराल में धक्का लगाता है। चुआँग के अनुसार ”उछालों (flips) के अनुक्रम (sequence) ही प्रोग्राम हैं।”
प्रोग्राम में ग्रोवर की विधि विशेष समाहित है। उन्होंने साधारण सर्च किया, उन्होंने एक चरण में चार में से एक आइटम ढूंढा (एक पारम्परिक कम्प्यूटर तीन या चार कोशिशें करेगा)। इस तरह से गेर्शेनफेल्ड और चुआँग ने प्रथम 2-क्यूबिट क्वांटम कम्प्यूटर का निर्माण करने में सफलता प्राप्त की। इस पर लगभग 10 लाख अमेरिकी डॉलर खर्च आया। तब से उन्होंने एक 3-क्यूबिट क्वांटम कम्प्यूटर के निर्माण में भी सफलता प्राप्त की है।
क्वांटम कम्प्यूटर बनाने के और भी कई तरीके हैं। ऑस्ट्रेलिया में एक वैज्ञानिक ग्रुप ऐसा क्वांटम कम्प्यूटर बनाने की कोशिश कर रहा है जिसमें द्रव का प्रयोग नहीं किया जाएगा। एक अन्य वैज्ञानिक ग्रुप ने ‘आयन ट्रैप्स’ (ion traps) का प्रयोग किया है, जो एक समय में एक क्वांटम कम्प्यूटिंग कण का निर्माण करता है।
कम्प्यूटर कंपनियाँ भी क्वांटम कम्प्यूटर के निर्माण में काफी दिलचस्पी दिखाती हैं। इस बारे में गेर्शेनफेल्ड का कहना है कि यदि ट्रांजिस्टर पर लगे कम्प्यूटर चिप इसी तरह छोटे होते गए तो लगभग 2020 के आसपास कम्प्यूटर चिप पर लगे तार की मोटाई परमाणु की मोटाई के बराबर हो जाएगी। ऐसे में वर्तमान चिप डिजाइन प्रयोग करने वाले कम्प्यूटर और अधिक तेज रफ्तार के नहीं किए जा सकेंगे। इसके लिए कोई विकल्प आवश्यक है। ऐसे में क्वांटम कम्प्यूटर ही एकमात्र आकर्षक विकल्प दिखाई देता है। क्वांटम कम्प्यूटर के लिए सिलिकॉन की अपेक्षा सप्लाई मैटीरियल की मात्रा भी अक्षय है।
क्वांटम कम्प्यूटरों के लिए प्रोग्रामिंग लैंग्वेज का विकास
क्वांटम कम्प्यूटर जो समान्तर में बहुत सी गणना करने के लिए क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) के रहस्य पर आधारित हैं, का अभी व्यावहारिक पक्ष उभरकर सामने आना बाकी है। इन कम्प्यूटरों का सैद्धान्तिक पक्ष ही उजागर हुआ है। लेकिन भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए इन लगभग अस्तित्वहीन मशीनों के लिए शोधकर्ताओं ने प्रोग्रामों को लिखने की कोशिश आरंभ कर दी है। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि क्वांटम कम्प्यूटरों के लिए प्रोग्राम लिख जाने से ऐसा कम्प्यूटर तैयार करने में आसानी होगी जो काफी उपयोगी हो। इस विषय में फ्रांस की सबाटियर यूनीवर्सिटी के स्टेफनो बेट्टेली के एक शोधपत्र को यूरोपियन फिजिक्स जर्नल द्वारा स्वीकार कर लिया गया है।
वर्तमान कम्प्यूटरों की गणना का आधार द्विआधारी अंक (binary digit) अथवा ‘बिट’ है, जिसका 0 अथवा 1 मूल्य हो सकता है। क्वांटम कम्प्यूटर में बिट्स का स्थान ‘क्यूबिट्स’ ले लेती हैं, जो अध्यारोपण (superimposition) की अवस्थाओं में होती हैं- आंशिक 0 और आंशिक 1। इसी अध्यारोपण की वजह से गणना का समान्तर में होना संभव होता है। एक क्यूबिट के मूल्य का मापन करने से अंतोगत्वा इसे दो द्विआधारी अंकों 0 अथवा 1 में ही परिवर्तित करना होगा। किसी भी सुसंगठित क्वांटम गणना में ऐसा होना आवश्यक नहीं होना चाहिए।
कम से कम यही सिद्धान्त है। लेकिन इसे व्यावहारिक रूप देना काफी कठिन है। डा. बेट्टïेल्ली और उनके सहयोगियों ने फिर भी इसे व्यावहारिक बनाने का प्रयास किया है। उनकी लैंग्वेज के मुख्य तत्व ‘क्वांटम रजिस्टर्स’ (Quantum Registers) और ‘क्वांटम ऑपरेटर्स’ (Quantum operators) हैं। क्वांटम रजिस्टर्स प्रोग्राम के लिए वह मार्ग हैं जिनसे वे किसी क्यूबिट विशेष से परस्पर क्रिया करते हैं। वह मशीन के अंदर क्यूबिट्स के स्थान के लिए ‘प्वाइंटर्स’ (Pointers) का कार्य करते हैं। इस तरह से उन क्यूबिट्स में प्रोग्राम के द्वारा फेरबदल किया जा सकता है।
यह फेरबदल ‘क्वांटम ऑपरेटर्स’ के द्वारा किया जाता है। ये लॉजिकल ऑपरेटर्स (Logical Operators) के समतुल्य होते हैं, जैसे कि ”एंड”,”नॉट” और ”अथवा”, जो कि परंपरागत् प्रोग्रामिंग का आधार हैं (जिसमें एक निर्देश कह सकता है कि ”जब A अथवा B और C सत्य नहीं हैं “D” करें) । क्वांटम ऑपरेटर्स यूनीटरी ट्राँसफॉर्मेशन” (unitary  transformation) पर निर्भर करते हैं। (नाम की उत्पत्ति बीजगणित के व्यूहों में दबा रहता है)। यहाँ पर यह आवश्यक है कि युक्तिपूर्ण तरीके से प्रोग्राम को रेखांकित करने वाले यूनीटरी ट्रांसफॉर्मेशंस की व्याख्या इस तरह की जाए कि वह कम्प्यूटर वैज्ञानिकों के लिए उपयोगी हो। डा. बेट्टïेल्ली ने ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग का प्रयोग करते हुए इस कार्य में सफलता प्राप्त की है।
ऑब्जेक्ट ओरिएण्टेड प्रोग्रामिंग कमांड और डाटा दोनों को, इंडिविजुअल बंडल्स जिन्हें ऑब्जेक्ट कहते हैं, को संयुक्त करके कार्य करती है। ये ऑब्जेक्ट पारम्परिक और क्वांटम कम्प्यूटरों के बीच की दूरी को मिटाने में प्रयोग किए जा सकते हैं। ऐसी संभावना है कि कार्यशील क्वांटम कम्प्यूटर बड़े परम्परागत कम्प्यूटर का एक विशेष हिस्सा होगा, इसलिए किसी भी सफल लैंग्वेज़ को रजिस्टर्स और ऑपरेटर्स को इस तरह से संभालना होगा कि वे परम्परागत् संगणना के साथ एकीकृत की जा सके।

क्वांटम कम्प्यूटर

की ओर एक कदम अमेरिकी वैज्ञानिकों ने क्वांटम कम्प्यूटर को बनाने की दिशा में एक कदम बढ़ाया है। अभी तक वैज्ञानिकों ने अपना ध्यान उन मूलभूत तत्वों के विकास पर लगाया है जो क्वांटम बिट्स अथवा क्यूबिट्स कहलाने वाली सूचनाओं को स्टोर करने में सक्षम हों। विज्ञान पत्रिका ‘नेचरÓ में प्रकाशित लेखों के अनुसार शोधकर्ताओं ने ऐसा तरीका ढूंढ लिया है जिससे यह क्यूबिट्स आपस में सम्प्रेषण (Communicate) कर सकें। उदाहरण के लिए एक कम्प्यूटर चिप के आरपार। अभी तक क्यूबिट्स केवल अपनी पड़ोसी क्यूबिट्स से ही संप्रेषण करने में सक्षम थे। लेकिन अब येल यूनीवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने ऐसी तकनीक का विकास कर लिया है जिससे एक ही चिप में एक स्टेशनरी क्वांटम बिट से सूचना दूसरी स्टेशनरी क्वांटम बिट तक सम्प्रेषित की जा सकती है। इसके लिए माइक्रोवेब फोटॉन को माध्यम बनाया जाता है। यह तकनीक क्वांटम कम्प्यूटर बनाने की दिशा में प्रारम्भिक, किंतु एक महत्वपूर्ण कदम है। इसी तरह के प्रयास दुनिया के कई हिस्सों में किए जा रहे हैं।

 

सुपर कम्प्यूटर

आधुनिक परिभाषा के अनुसार वे कम्प्यूटर जिनकी मेमोरी स्टोरेज (स्मृति भंडार) 52 मेगाबाइट से अधिक हो एवं जिनके कार्य करने की क्षमता 500 मेगा फ्लॉफ्स (Floating Point operations per second – Flops) हो, उन्हें सुपर कम्प्यूटर कहा जाता है। सुपर कम्प्यूटर में सामान्यतया समांतर प्रोसेसिंग (Parallel Processing) तकनीक का प्रयोग किया जाता है।

सुपर कम्प्यूटिंग शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1920 में न्यूयॉर्क वल्र्ड न्यूज़पेपर ने आई बी एम द्वारा निर्मित टेबुलेटर्स के लिए किया था। 1960 के दशक में प्रारंभिक सुपरकम्प्यूटरों को कंट्रोल डेटा कॉर्पोरेशन, सं. रा. अमेरिका के सेमूर क्रे ने डिजाइन किया था।
सुपरकम्प्यूटर की परिभाषा काफी अस्पष्टï है। वर्तमान के सुपर कम्प्यूटर आने वाले समय के साधारण कम्प्यूटर करार दिए जा सकते हैं। 1970 के दशक के दौरान अधिकाँश सुपर कम्प्यूटर वेक्टर प्रोसेसिंग पर आधारित थे। 1980 और 1990 के दशक से वेक्टर प्रोसेङ्क्षसग का स्थान समांतर प्रोसेसिंग तकनीक ने ले लिया। समांतर प्रोसेसिंग तकनीक में बहुत सारे माइक्रोप्रोसेसरों का प्रयोग एक-दूसरे से जोड़कर किया जाता है। ये माइक्रोप्रोसेसर किसी समस्या को उनकी माँगों (demands) में विभाजित करके उन माँगों पर एक साथ कार्य करते हैं। सुपर कम्प्यूटर में 32 या 64 समानांतर परिपथों में कार्य कर रहे माइक्रोप्रोसेसरों के  सहयोग से विभिन्न सूचनाओं पर एक साथ कार्य किया जाता है, जिससे सुपर कम्प्यूटर में 5 अरब गणनाओं की प्रति सेकेण्ड क्षमता सुनिश्चित हो जाती है। इस प्रकार बहुत सारी गणनाओं की आवश्यकताओं वाली जटिल समस्याओं के समाधान हेतु सुपर कम्प्यूटर का उपयोग किया जाता है।
प्रारंभिक सुपर कम्प्यूटर की गति मेगा फ्लॉफ्स (106 फ्लॉफ्स) में पाई जाती थी, परंतु अब यह गति साधारण सुपर कम्प्यूटर की गति बनकर रह गई है। वर्तमान में सुपर कम्प्यूटरों में गीगा फ्लॉफ्स (109 फ्लाफ्स) की गति पाई जाती है।
प्रयोग
सुपर कम्प्यूटरों का प्रयोग उच्च-गणना आधारित कार्यों में किया जाता है। उदाहरण- मौसम की भविष्यवाणी, जलवायु शोध (वैश्विक ऊष्णता से सम्बंधित शोध भी इसमें शामिल है), अणु मॉडलिंग (रासायनिक यौगिकों, जैविक वृहद् अणुओं, पॉलीमरों और क्रिस्टलों के गुणों और संरचनाओं की कम्प्यूटिंग) इत्यादि। सैन्य और वैज्ञानिक एजेंसियां इसका काफी उपयोग करती हैं।
 

सुपर कम्प्यूटर चुनौतियाँ और तकनीक

  • सुपर कम्प्यूटर भारी मात्रा में ऊष्मा पैदा करते हैं और उनका शीतलन आवश्यक है। अधिकाँश सुपर कम्प्यूटरों को ठंडा करना एक टेढ़ी खीर है।
  • किसी सुपर कम्प्यूटर के दो भागों के मध्य सूचना प्रकाश की गति से अधिक तेजी से नहीं पहुँच सकती है। इसकी वजह से सेमूर क्रे द्वारा निर्मित सुपर कम्प्यूटर में केबल को छोटे से छोटा रखने की कोशिश की गई, तभी उनके क्रे रेंज के सुपर कम्प्यूटरों का आकार बेलनाकार रखा गया।
  • सुपर कम्प्यूटर अत्यन्त अल्प काल के दौरान डाटा की विशाल मात्रा का उत्पादन व खपत कर सकते हैं। अभी ‘एक्स्टर्नल स्टोरेज बैंडविड्थ’ (external storage bandwidth) पर काफी कार्य किया जाना बाकी है। जिससे यह सूचना तीव्र गति से हस्तांतरित और स्टोर की/पाई जा सके।

सुपर कम्प्यूटरों के लिए जो तकनीक विकसित की गई हैं वे निम्न हैं-

  • वेक्टर प्रोसेसिंग
  • लिक्विड कूलिंग
  • नॉन यूनीफॅार्म मेमोरी एक्सेस (NUMA)
  • स्ट्राइप्ट डिस्क
  • पैरेलल फाइल सिस्टम्स

सामान्य प्रयोजन वाले सुपर कम्प्यूटरों के प्रयोग 
इनके तीन प्रकार होते हैं-

  • वेक्टर प्रोसेसिंग सुपर कम्प्यूटरों में एक साथ काफी विशाल मात्रा के डाटा पर कार्य किया जा सकता है।
  • काफी कसकर जुड़े हुए क्लस्टर सुपर कम्प्यूटर कई प्रोसेसरों के लिए विशेष रूप से विकसित इंटरकनेक्ट्स का उपयोग करते हैं और उनकी मेमोरी एक-दूसरे को सूचना देती है। सामान्य प्रयोग वाले तेज गति के सुपर कम्प्यूटर आज इस तकनीक का उपयोग करते हैं।
  • कॉमोडिटी क्लस्टर्स सुपर कम्प्यूटर काफी संख्या में कॉमोडिटी पर्सनल कम्प्यूटरों का प्रयोग करते हैं, जो उच्च बैंडविड्थ के लोकल एरिया नेटवर्कों से जुड़े रहते हैं।

 

विशेष प्रयोजन वाले सुपर कम्प्यूटर 
विशेष प्रयोजन वाले सुपर कम्प्यूटर उच्च-कार्य क्षमता वाली कम्प्यूटिंग मशीनें होती हंै जिनका हार्डवेयर आर्किटेक्चर एक समस्या विशेष के लिए होता है। इनका प्रयोग खगोल-भौतिकी, गणनाओं और कोड ब्रेकिंग अनुप्रयोगों में किया जाता है।
 

भारत में सुपर कम्प्यूटर 
भारत में प्रथम सुपर कम्प्यूटर क्रे-एक्स MP/16 1987 में अमेरिका से आयात किया गया था। इसे नई दिल्ली के मौसम केंद्र में स्थापित किया गया था। भारत में सुपर कम्प्यूटर का युग 1980 के दशक में उस समय शुरू हुआ जब सं. रा. अमेरिका ने भारत को दूसरा सुपर कम्प्यूटर क्रे-एक्स रूक्क देने से इंकार कर दिया। भारत में पूणे में 1988 में सी-डैक (C-DAC) की स्थापना की गई जो कि भारत में सुपर कम्प्यूटर की तकनीक के प्रतिरक्षा अनुसंधान तथा विकास के लिए कार्य करता है। नेशनल एयरोनॉटिक्स लि. (NAL) बंगलौर में भारत का प्रथम सुपर कम्प्यूटर ‘फ्लोसॉल्वरÓ विकसित किया गया था। भारत का प्रथम स्वदेशी बहुउद्देश्यीय सुपर कम्प्यूटर ‘परमÓ सी-डैक पूणे में 1990 में विकसित किया गया। भारत का अत्याधुनिक कम्प्यूटर ‘परम 10000Ó है, जिसे सी-डैक ने विकसित किया है। इसकी गति 100 गीगा फ्लॉफ्स है। अर्थात् यह एक सेकेण्ड में 1 खरब गणनाएँ कर सकता है। इस सुपर कम्प्यूटर में ओपेन फ्रेम (Open frame) डिजाइन का तरीका अपनाया गया है। परम सुपर कम्प्यूटर का भारत में व्यापक उपयोग होता है और इसका निर्यात भी किया जाता है। सी-डैक में ही टेराफ्लॉफ्स क्षमता वाले सुपर कम्प्यूटर का विकास कार्य चल रहा है। यह परम-10000 से 10 गुना ज्यादा तेज होगा।
सी-डैक ने ही सुपर कम्प्यूटिंग को शिक्षा, अनुसंधान और व्यापार के  क्षेत्र में जनसुलभ बनाने के उद्देश्य से पर्सनल कम्प्यूटर पर आधारित भारत का पहला कम कीमत का सुपर कम्प्यूटर ‘परम अनंतÓ का निर्माण किया है। परम अनंत में एक भारतीय भाषा का सर्च इंजन ‘तलाशÓ, इंटरनेट पर एक मल्टीमीडिया पोर्टल और देवनागरी लिपि में एक सॉफ्टवेयर लगाया गया है। यह आसानी से अपग्रेड हो सकता है, जिससे इसकी तकनीक कभी पुरानी नहीं पड़ती है।
अप्रैल 2003 में भारत विश्व के उन पाँच देशों में शामिल हो गया जिनके पास एक टेरॉफ्लॉफ गणना की क्षमता वाले सुपरकम्प्यूटर हैं। परम पद्म नाम का यह कम्प्यूटर देश का सबसे शक्तिशाली कम्प्यूटर है।

 

नेटवर्किंग

 

 

नेटवर्किंग एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें कम्प्यूटर सूचनाओं और उससे स्रोतों का आदान-प्रदान करते हैं। नेटवर्किंग के लाभ निम्रलिखित हैं-
1. डाटा की शेयरिंग
2. बिना सी डी के फाइलों का ट्रांसफर संभव
3. मेडीसिन, इंजीनियरिंग इत्यादि में विशेष लाभ
4. डाटा की सुरक्षा
5. कम मेमोरी का प्रयोग
6. उभयनिष्टï हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर संसाधन, उदाहरण, प्रिंटर, मेमोरी
7.किफायती
नेटवर्क तीन प्रकार के होते हैं-
LAN- लोकल एरिया नेटवर्क
MAN- मेट्रोपोलिटन एरिया नेटवर्क
WAN- वाइड एरिया नेटवर्क
लैन (LAN)
लैन में आसपास के कम्प्यूटर केबलिंग व्यवस्था से आपस में जुड़े रहते हैं। इससे सूचनाओं का आदान-प्रदान तथा कम्प्यूटर स्रोतों का आदान-प्रदान काफी आसान हो गया है। इसके तीन अवयव होते हैं-
(1) मीडियम
मीडियम उसे कहते हैं जिस पर डाटा ट्रांसफर होता है। यह एक टेलीफोन लाइन, एक कोएक्सियल केबिल अथवा फाइबर ऑप्टिकल केबिल हो सकता है।
(2) नेटवर्क इंटरफेस यूनिट (NIO)
यह लैन मीडियम और कम्प्यूटर हार्डवेयर के मध्य इंटरफेस प्रदान करता है। सामान्यता एक नेटवर्क इंटरफेस यूनिट मुख्य सिस्टम के साथ इंटरफेस करती है।
(3) नेटवर्क सॉफ्टवेयर
लैन से जुड़े हुए प्रत्येक कम्प्यूटर सिस्टमों में कार्य करता है और यूज़र सॉफ्टवेयर को नेटवर्क वाइड कम्युनिकेशन कैपीबिल्टीज़ प्रदान करता है। इस सॉफ्टवेयर का एक भाग नेटवर्क इंटरफेस यूनिट में रहता है।
वान (WAN) 
एक दूसरे से जुड़े जब एक ही शहर में कई जगहों या फिर कई शहरों तक एक दूसरे से जुड़े हुए कम्प्यूटर स्थित हों तो यह वाइड एरिया नेटवर्क (WAN) कहलाता है।

 

प्रोग्रामिंग भाषाएं

 
कम्प्यूटर के दो भाग होते हैं- हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर। इलेक्ट्रॉनिक सर्किटों और इलेक्ट्रोमैकेनिकल साधनों से बनी पाँच कार्य यूनिटें कम्प्यूटर हार्डवेयर बनाती हैं। जबकि हार्डवेयर पर इस्तेमाल होने वाले प्रोग्राम या रूटीन, जिनसे विभिन्न कार्य किए जाते हों, सॉफ्टवेयर कहलाती हैं। प्रोग्राम लिखने की कला प्रोग्रामिंग कहलाती है। प्रत्येक कम्प्यूटर में अपने हार्डवेयर के अनुसार एक अद्वितीय निम्नस्तरीय भाषा या मशीन लैंग्वेज होती है।
मशीन लैंग्वेज
यह भाषा शून्य और एक अथवा बाइनरी कोड के रूप में होती है। मशीन लैंग्वेज की खास बात होती है कि निर्देश उस भाषा में कोडेड होते हैं जिसे मशीन समझने में समर्थ होती है।
असेम्बली लैंग्वेज
असेम्बली भाषा मशीन भाषा में एयनोमिक्स का प्रयोग करती है जैसे कि ADD,SUB,MPY, DIV, इत्यादि। इसमें प्रोग्रामर को कठिन निम्नस्तरीय मशीन भाषा लिखने से बचाने के लिए सैकड़ों उच्चस्तरीय प्रोग्रामिंग भाषाएँ विकसित हो गई हैं।
हाई लेवल लैंग्वेज
ये भाषाएँ अभीष्टï अनुप्रयोग क्षेत्र (उदाहरण, व्यापार या गणितीय) की सामान्य भाषाओं से मिलती-जुलती होती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि समस्या प्रधान अथवा कार्यप्रणाली से सम्बंधित भाषाओं को कम्प्यूटर सीधे नहीं समझ सकता है। ऐसे में कम्पाइलर नामक विशेष कम्प्यूटर प्रोग्राम की आवश्यकता पड़ती है जिससे कम्प्यूटर स्वयँ समस्याप्रद अथवा कार्यप्रणाली से सम्बंधित भाषा प्रोग्राम को मशीन लैंग्वेज प्रोग्राम में अनुवादित कर देता है जिसे कम्प्यूटर पर चलाया जा सकता है। इन भाषाओं का महत्व मुख्य रूप से बिजीनेस एकाउंटिंग और साइंस इंजीनियरिंग की दुनिया में है, क्योंकि इनके द्वारा गैर-प्रशिक्षित प्रोग्रामर भी कम्प्यूटर का प्रयोग कर सकता है। इनके उदाहरण हैं- COBOL , FORTRON , C , C++ , ALGOL , LISP इत्यादि।
चतुर्थ पीढ़ी की भाषाएँ
चतुर्थ पीढ़ी की भाषाओं का विकास काफी तेजी से हो रहा है। कुछ भाषाएँ जैसे कि जावा, रेमीज़-2, फोकस, नोमाड एवँ ओरेकल आजकल काफी प्रसिद्ध हंै। इन भाषाओं में प्रोग्रामर को इस बात की सुविधा रहती है कि वे बिना प्रोग्रामिंग सीखे सीधे ही असेम्बर को लगाकर प्रोग्रामिंग कर सकते हैं। इसीलिए इन्हें स्वप्रोग्राम भाषाएँ भी कहा जाता है। इनका असेम्बर प्रोग्रामर को स्क्रीन की सहायता से यह बतलाता है कि आगे क्या करना है।
आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस भाषाएँ
कम्प्यूटर की पंचम पीढ़ी के विकास के साथ ही कुछ इस प्रकार की भाषाओं का विकास कार्य आरंभ हो गया था, जिन्हें कृत्रिम बुद्धि (Artificial Intelligence) भाषाएँ कहा जाता है। इस प्रकार की भाषाओं के प्रोग्राम की सहायता से स्वचालित विधि से रिपोर्ट एवँ निर्देश बनाए जा सकते हैं और स्वचालित यंत्रों को उसकी प्रक्रिया को संचालन के अपने-अपने निर्देश मिलते हैं।

ऑपरेटिंग सिस्टम

यह कम्प्यूटर को संचालित करने के लिए रूटीनों और कार्यप्रणालियों का एक संगठित संग्रह होता है। यह कम्प्यूटर और कम्प्यूटर हार्डवेयर के बीच मध्यस्थ का कार्य करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम का मूल उद्देश्य ऐसा वातावरण प्रदान करना होता है जिसमें प्रयोगकर्ता प्रोग्राम पर कार्य कर सके। इससे कम्प्यूटर को संचालित करने में सुविधा होती है। इसका एक अन्य लक्ष्य कम्प्यूटर हार्डवेयर का दक्षतापूर्वक तरीके से प्रयोग होता है, उदाहरण, DOS, UNIX, Lenix इत्यादि। ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रयोग हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और डाटा कम्प्यूटर के अवयव हैं। ऑपरेटिंग सिस्टम कम्प्यूटर सिस्टम के परिचालन में इन संसाधनों के सही प्रयोग के लिए साधन प्रदान करता है। ऑपरेटिंग सिस्टम अपने-आप में कोई उपयोगी कार्य नहीं करता है। यह मात्र एक वातावरण प्रदान करता है जिसके अंतर्गत अन्य प्रोग्राम उपयोगी कार्य कर सकते हैं।

 

कम्प्यूटरों का परिचय

 

 

 

  • कम्प्यूटर एक डाटा प्रोसेसिंग उपकरण होता है जो पढ़ व लिख सकता है, गणना और तुलना कर सकता है, डाटा की भारी मात्रा को उच्च गति, सटीकता और विश्वसनीयता के साथ स्टोर व प्रोसेस कर सकता है।
  • यह दिए हुए निर्देशों पर कार्य करता है।
  • एक बार डाटा और निर्देशों का समुच्चय (स्द्गह्ल) इसकी मेमोरी में फीड कर दिया जाता है तो यह निर्देशों का अनुपालन करता है, डाटा पर निर्देशानुसार कार्य करता है और परिणाम देता है।
  • इसकी कार्यप्रणाली स्वचालित होती है।
  • यह इलेक्ट्रॉनिक अवयवों का प्रयोग करता है; ट्रांजिस्टर, रेजिस्टर, डायोड और सर्किट।

इनपुट (Input)
डाटा को इकठ्ठा करके कम्प्यूटर में डाला जाता है। इसे इनपुट प्रोसेस कहते हैं।

भंडारण (Storage) 
जो भी डाटा कम्प्यूटर के अंदर पहुँचता है वह उसकी मेमोरी में स्टोर हो जाता है जिसे कम्प्यूटर की फिजि़कल मेमोरी (Physical Memory) कहते हैं। फिजि़कल मेमोरी की एक सहायक मेमोरी ऑक्ज़ीलरी मेमोरी (auxilary memory) भी होती है।
प्रोसेसिंग (Processing)
कम्प्यूटर की फिजि़कल मेमोरी में स्टोर डाटा पर इच्छित परिणाम पाने के लिए कार्य किया जाता है, जिसे प्रोसेसिंग कहते हैं। परिणाम फिर से फिजि़कल मेमोरी में स्टोर हो जाते हैं।
आउटपुट (output)
फिजि़कल मेमोरी से स्टोर डाटा को निकालने की प्रक्रिया को आउटपुट कहते हैं।
कम्प्यूटर का आर्किटेक्चर (Architecture Of Computer)
किसी भी पारम्परिक कम्प्यूटर के निम्नलिखित अवयव होते हैं-

इनपुट उपकरण (Input device) 
इस उपकरण का उपयोग मनुष्य से मशीन के बीच सँचार के लिए किया जाता है। जिस डाटा की कम्प्यूटर में प्रोसेसिंग की जानी है उसे इसी उपकरण के द्वारा डाला जाता है, उदाहरणस्वरूप की-बोर्ड, ऑप्टिकल कैरेक्टर रीडर, मार्क रीडर, मैग्नेटिक इंक कैरेक्टर रीडर।
आउटपुट उपकरण (Output Device)
इस उपकरण का प्रयोग मशीन से मनुष्य के बीच संचार के लिए किया जाता है। प्रोसेस्ड परिणामों को इन उपकरणों के द्वारा कम्प्यूटर प्रणाली से निकाला जाता है, उदाहरणस्वरूप, वीडियो डिस्प्ले यूनिट, प्रिंटर्स, प्लॉटर्स इत्यादि।
सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (Central Processing Unit)
सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट कम्प्यूटर के सभी ऑपरेशनों का समन्वय एवँ संगठन करके सम्पूर्ण प्रणाली को नियंत्रित करती है। यह की-बोर्ड जैसे विभिन्न इनपुट उपकरणों द्वारा दिए गए निर्देशों का अनुपालन करती है और प्रिंटर जैसे विभिन्न पैरीफेरल उपकरणों के लिए आउटपुट का इंतजाम करती है। यह प्राइमरी स्टोरेज में स्टोर निर्देशों को लाने के लिए जिम्मेदार होती है, उनकी व्याख्या करती है और उन सभी हार्डवेयर यूनिटों को निर्देश जारी करती है जो उन निर्देशों पर कार्य करने के लिए उत्तरदायी होते हैं।
एल यू (ALU)
यह उपकरण कम्प्यूटर की सभी गणितीय और तार्किक ऑपरेशनों को करने के लिए जिम्मेवार होता है। गणितीय ऑपरेशनों का प्रयोग सँख्याओं की तुलना और ‘लेस दैन’ ( Less Than), ‘इक्वल टू’ (Equal to) और ‘ग्रेटर देन’ (Greater than) इत्यादि निरूपित करने में किया जाता है। ए एल यू टेक्स्ट व सँख्याओं दोनों को ही सँभाल सकता है। कभी-कभी कम्प्यूटर में गणितीय को- प्रोसेसर लगा होता है जो कि दूसरा माइक्रोप्रोसेसर होता है जो गणितीय कार्य के लिए ही    होता है। को-प्रोसेसर का मुख्य लाभ गणना की बढ़ी हुई गति होती है।
मेमोरी यूनिट (Memory unit)
इसका प्रयोग डाटा और प्रोग्राम को स्टोर करने के लिए किया जाता है। सम्पूर्ण मेमोरी को दो भागों में बाँटा जाता है। एक भाग में भारी सँख्या में लेबल्ड बॉक्स होते हैं- इसका अर्थ है एक बॉक्स प्रति डाटा आइटम। दूसरा भाग विधि-विशेष (Algorithm) को स्टोर करता है। मेमोरी के बॉक्स में स्थित डेटम (Datum) को बॉक्स के नाम अथवा लेबल से निर्दिष्टï करने पर प्राप्त किया जा सकता है। जब किसी डेटम का प्रयोग बॉक्स से किया जाता है तो ऐसे में डेटम की एक कॉपी का ही प्रयोग किया जाता है, वास्तविक डेटम नष्टï नहीं होता है। जब किसी डेटम को मेमोरी में लिखते हैं तो यह एक विशेष बॉक्स में स्टोर हो जाता है और बॉक्स की पुरानी विषयवस्तु नष्टï हो जाती है।

 

इंटरनेट का क्रमिक विकास

  • 1969 .:अमेरिकी रक्षा विभाग के एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी (APRA) ने सं.रा.अमेरिका के चार विश्वविद्यालयों के कम्प्यूटरों की नेटवर्किंग करके इंटरनेट ‘अप्रानेट’ (APRANET) की शुरुआत की। इसका विकास, शोध, शिक्षा और सरकारी संस्थाओं के लिए किया गया था। इसका एक अन्य उद्देश्य था आपात स्थिति में जबकि संपर्क के सभी साधन निष्क्रिय हो चुके हों, आपस में सम्पर्क स्थापित किया जा सके। 1971 तक एपीआरए नेट लगभग 2 दर्जन कम्प्यूटरों को जोड़ चुका था।

 

  • 1972 .: इलेक्ट्रॉनिक मेल अथवा ई-मेल की शुरुआत।

 

  • 1973 .:ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकॉल/ इंटरनेट प्रोटोकॉल (टीसीपी/आईपी) को डिजाइन किया गया। 1983 तक आते-आते यह इंटरनेट पर दो कम्प्यूटरों के बीच संचार का माध्यम बन गया। इसमें से एक प्रोटोकॉल, एफ टी पी (फाइल ट्रांसफर प्रोटोकॉल) की सहायता से इंटरनेट प्रयोगकर्ता किसी भी कम्प्यूटर से जुड़कर फाइलें डाउनलोड कर सकता है।

 

  • 1983 .:अप्रानेट के मिलेट्री हिस्से को मिलनेट (MILNET) में डाल दिया गया।

 

  • 1986 .:यू. एस. नेशनल साइंस फाउंडेशन (NSF) ने एनएसएफनेट (NSFNET) लाँच किया। यह पहला बड़े पैमाने का नेटवर्क था, जिसमें इंटरनेट तकनीक का प्रयोग किया गया था।

 

  • 1988 .:फिनलैंड के जाक्र्को ओकेरीनेने ने इंटरनेट चैटिंग का विकास किया।

 

  • 1989 .:मैकगिल यूनीवर्सिटी, माँट्रियाल के पीटर ड्यूश ने प्रथम बार इंटरनेट का इंडेक्स (अनुक्रमणिका) बनाने का प्रयास किया। थिंकिंग मशीन कार्पोरेशन के ब्रिऊस्टर कहले ने एक अन्य इंडेक्सिंग सिक्सड, डब्ल्यू ए आई एस (वाइड एरिया इंफॉर्मेशन सर्वर) का विकास किया। सीईआरएन (यूरोपियन लेबोरेटरी फॉर पाटकल फिजिक्स) के बर्नर्स-ली ने इंटरनेट पर सूचना के वितरण की एक नई तकनीक का विकास किया, जिसे अंतत: वल्र्ड वाइड वेब कहा गया। यह वेब हाइपरटेक्स्ट पर आधारित है, जो कि किसी इंटरनेट प्रयोगकर्ता को इंटरनेट की विभिन्न साइट्स पर एक डाक्यूमेंट को दूसरे से जोड़ता है। यह कार्य हाइपरलिंक (विशेष रूप से प्रोग्राम किए गए शब्दों, बटन अथवा ग्राफिक्स) के माध्यम से होता है।

 

  • 1991 .:प्रथम यूज़र फ्रेंडली इंटरफेस, गोफर का मिन्नेसोटा यूनिवर्सिटी (सं.रा. अमेरिका) में विकास। तब से गोफर सर्वाधिक विख्यात इंटरफेस बना हुआ है; एनएसएफनेट को कॉमॢशयल ट्रैफिक के लिए खोला गया।

 

  • 1993 .:‘नेशनल सेंटर ऑफ सुपरकम्प्यूटिंग एप्लीकेशंसÓ के मार्क एंड्रीसन ने मोजेइक नामक नेवीगेटिंग सिस्टम का विकास किया। इस सॉफ्टवेयर के द्वारा इंटरनेट को मैगज़ीन फॉर्मेट में पेश किया जाने लगा। इस सॉफ्टवेयर से टेक्स्ट और ग्राफिक्स इंटरनेट पर उपलब्ध हो गए। आज भी यह वल्र्ड वाइड वेब के लिए मुख्य नेवीगेटिंग सिस्टम है।

 

  • 1994 .:नेटस्केप कम्युनिकेशन और 1995 में माइक्रोसॉफ्ट ने अपने-अपने ब्राउज़र बाजार में उतारे। इन ब्राउज़रों से प्रयोगकर्ताओं के लिए इंटरनेट का प्रयोग अत्यन्त आसान हो गया।

 

  • 1995 .:प्रारंभिक व्यावसायिक साइट्स को इंटरनेट पर लाँच किया गया। ई-मेल के द्वारा मास मार्केटिंग कैम्पेन चलाए जाने लगे।

 

  • 1996 .:1996 तक आते आते दुनिया भर में इंटरनेट को काफी लोकप्रियता हासिल हो गई। इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की संख्या5 करोड़ पहुँची।

 

  • 1999 .:ई-कॉमर्स की अवधारणा अत्यन्त तेजी से फैली, जिससे इंटरनेट के द्वारा खरीद-फरोख्त लोकप्रिय हो गई।

 

  • 2003 .:न्यूजीलैण्ड में ‘नियूइ’ (NIUE) ने इंटरनेट में देशव्यापी ‘वायरलेस एक्सेस’ प्रणाली का प्रयोग आरंभ किया (इसमें ङ्खद्ब-स्नद्ब तकनीक का प्रयोग किया जाता है)।