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Chemistry

  1. द्रव्य उसकी प्रकृति
  2. जीवन का रासायनिक आधार
  3. परमाणु संरचना क्या है?
  4. रेडियोएक्टिविटी : अर्थ, खोज, प्रकार और उपयोग
  5. रासायनिक अभिक्रिया और समीकरण क्या है?
  6. ऑक्सीकरणअपचयन तथा विलेय, विलयन विलायक
  7. पर्यावरणीय रसायन विज्ञान क्या है?
  8. पेट्रोलियमकी निर्माण प्रक्रिया तेल शोधन
  9. जैवनाशक (Biocide) और कृन्तकनाशक (Rodenticides) का प्रयोग किसलिए किया जाता है?
  10. सेरेमिक : एक अकार्बनिक आधात्विक ठोस
  11. धातु निष्कर्षण, पेट्रोलियम, स्टील, जंग सीमेंट ग्लास की मूलभूत जानकारी
  12. अयस्क में पायी जाने वाली अशुद्धियों को कैसे अलग किया जाता है?
  13. मानव जीवन में रसायनशास्त्र का क्या महत्व है?
  14. साबुन और डिटर्जेंट: निर्माण रासायनिक संरचना
  1. द्रव्य उसकी प्रकृति

हर वह वस्तु जिसमें भार होता है और जगह घेरती है, उसे द्रव्य कहते हैं। किसी भी वस्तु में द्रव्य की मात्रा को द्रव्यमान (mass) कहते हैं।

 

वर्गीकरण
हम द्रव्य को शुद्ध पदार्थ तथा मिश्रण में वर्गीकृत कर सकते हैं। द्रव्य का वर्गीकरण तत्व, यौगिक और मिश्रण में भी किया जाता है।

  • तत्व (Element)– वह पदार्थ जो न तोड़ा जा सकता है और न ही दो या अधिक साधारण पदार्थों से भौतिक या रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा बनाया जा सकता है, तत्व कहलाता है। उदाहरण- ताँबा (Cu), चाँदी (Ag), हाइड्रोजन (H) आदि।

 

  • यौगिक (Compound)– दो या अधिक तत्वों का निश्चित अनुपात में संयोजन यौगिक कहलाता है। यह किसी विधि द्वारा दो या अधिक तत्वों में विभाजित किया जा सकता है। इन यौगिकों के गुणधर्म इनके घटक तत्वों से बिल्कुल ही भिन्न होते हैं। उदाहरण- जल, शर्करा, लवण, क्लोरोफॉर्म आदि।

 

  • मिश्रण (Mixture)– जब हम किसी भी दो या अधिक पदार्थ, तत्व या यौगिक को अनिश्चित अनुपात में मिलाते हैं तो प्राप्त होने वाले पदार्थ को मिश्रण कहा जाता है। मिश्रण में घटकों का गुण धर्म अपरिवर्तित रहता है। उदाहरण- पेट्रोल, वायु, औषधि इत्यादि। मिश्रण को समांगी (Homogeneous) व असमांगी (Heterogeneous)- दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है।

आवोग्रादो परिकल्पना मोल (द्वशद्यद्ग) की संकल्पना
इस परिकल्पना के अनुसार सभी गैसों के समान आयतन में समान ताप व दाब पर समान संख्या में कण पाए जाते हैं।  प्रयोगों में यह पाया गया है कि मानक ताप व दाब अर्थात 273ok के ताप और पारे के 76 सेमी. दाब पर सभी गैसों का  एक ग्राम आण्विक द्रव्यमान 22.4 ली. आयतन घेरता है। इस आयतन को मानक मोलर आयतन (Standard Molar Volume) कहते हैं।

आवोग्रादो परिकल्पना के अनुसार मानक ताप व दाब पर सभी गैसों के 22.4 ली. आयतन में अणुओं की संख्या स्थिर होती है। इस आयतन में 6.023 x 1023 अणु पाए जाते हैं। इस संख्या को आवोग्रादो संख्या कहते हैं।
द्रव्य का गतिज सिद्धान्त
अणुओं में गतिज ऊर्जा (Kinetic energy) होती है और द्रव व गैस के अणु संपूर्ण आयतन में मुक्त रूप से घूमते रहते हैं। गैस के अणु निरंतर यादृच्छिक (Random) गति में होते हैं और पात्र की दीवार पर दबाव डालते हैं। तापमान  की वृद्धि करने से गैसों के अणुओं की गतिज ऊर्जा में भी वृद्धि हो जाती है।
रासायनिक अभिक्रियाएँ तथा रासायनिक समीकरण
रासायनिक समीकरण को रासायनिक क्रिया या रासायनिक अभिक्रिया भी कहते हैं। वह प्रक्रम (Process) जिसमें दो या अधिक पदार्थों (तत्व तथा यौगिक) की पारस्परिक अभिक्रिया से जब कोई एक या अधिक नए पदार्थ बनते हैं, रासायनिक अभिक्रिया कहलाता है। रासायनिक अभिक्रियाएँ मुख्यत: चार प्रकार की होती हैं- संयोजन, अपघटन, विस्थापन तथा उभय अपघटन (double decomposition) ।
किसी भी रासायनिक अभिक्रिया को प्रदर्शित करने का सबसे सरल तरीका उसे रासायनिक समीकरणों में लिखना है।
परमाणु संरचना (Atomic Structure) 
सन् 1808 में ब्रिटेन के भौतिकशास्त्री जॉन डाल्टन ने बताया कि पदार्थ अत्यन्त छोटे-छोटे अविभाज्य कणों से मिलकर बना होता है, जिन्हें परमाणु कहते हैं। इसका स्वतंत्र अस्तित्व संभव है। बाद में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जे. जे. थॉमसन व रदरफोर्ड ने बताया कि परमाणु अविभाज्य नहीं है, बल्कि यह छोटे-छोटे आवेशित कणों से मिलकर बना होता है। आधुनिक अवधारणा के अनुसार परमाणु धनावेशित प्रोटानों, ऋणावेशित इलेक्ट्रॉनों व उदासीन न्यूट्रॉनों से मिलकर बना होता है। परमाणु के केंद्र में एक नाभिक होता है, जिसमें प्रोटॉन व न्यूट्रॉन उपस्थित रहते हैं। इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। परमाणु का समस्त द्रव्यमान इसके नाभिक में केंद्रित रहता है।
रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल

सन् 1911 में अंग्रेज भौतिकशास्त्री रदरफोर्ड ने धातु पन्नों पर ड्ड-कणों की बमबारी करके परमाणु संरचना के संदर्भ में महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्राप्त किए-

  • परमाणु का अधिकांश भाग खोखला है।

 

  • परमाणु के केंद्र में अति सूक्ष्म स्थान में एक धनावेशित भाग है।

 

  • धनावेश अत्यन्त सघन व दृढ़ भाग में संकेंद्रित है जिसे नाभिक कहते हैं। नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन विभिन्न कक्षाओं में चक्कर लगाते हैं।

 

परमाणु का बोह्र मॉडल

1913 में डेनिस भौतिकशास्त्री नील बोह्र ने रदरफोर्ड मॉडल में कमियों को दूर करने का प्रयास किया, जिनकी प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं-

  • इलेक्ट्रॉन केवल कुछ ऐसी सुनिश्चित कक्षाओं में घूमते हैं जिनमें उनकी ऊर्जा का उत्सर्जन नहीं होता। इन्हें स्थायी कक्षायें (Stable orbits) कहते हैं।

 

  • जब इलेक्ट्रॉन किसी उच्च ऊर्जा वाली कक्षा से निम्न ऊर्जा वाली कक्षा में लौटता है तो वैद्युत चुम्बकीय तरंगों के रूप में ऊर्जा का उत्सर्जन करता है।

 

परमाणु क्रमांक (Atomic Number)-

किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या को उस तत्व का परमाणु क्रमांक कहते हैं।
परमाणु क्रमांक = प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या
द्रव्यमान संख्या (Mass Number) –

किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों व न्यूट्रॉनों की संख्याओं का योग, द्रव्यमान संख्या कहलाता है।
द्रव्यमान संख्या = प्रोटॉनों की संख्या+न्यूट्रॉनों की संख्या
परमाणु भार (Atomic Weight) –

किसी तत्व का परमाणु भार वह संख्या है, जो प्रदर्शित करती है कि तत्व का एक परमाणु कार्बन परमाणु के 1/12 भाग से कितना गुना भारी है।
अणु (Molecules) –

पदार्थ अणुओं से मिलकर बने होते है और अणु परमाणुओं से। अणु किसी पदार्थ के वे सूक्ष्मतम कण होते हैं जो स्वतंत्र अवस्था में रह सकते हैं और उसमें पदार्थ के समस्त गुण उपस्थित रहते हैं।
अणुभार (Molecular Weight)

किसी पदार्थ का अणुभार वह संख्या है जो यह प्रदर्शित करता है कि उस पदार्थ का एक अणु कार्बन-12 समस्थानिक (isotope) के एक परमाणु के भार के 1/12 भाग से कितना गुना भारी है।
ग्राम अणु भार (Gram Molecular Weight)

जब किसी पदार्थ के अणुओं का भार ग्राम में प्रदर्शित किया जाता है तो उसे ग्राम अणु भार कहते हैं। प्रत्येक पदार्थ के 1 ग्राम अणु में उस पदार्थ के 6.023&1023 अणु होते हैं।
समास्थानिक (Isotopes) –

किसी तत्व के परमाणु जिनके परमाणु क्रमांक समान व परमाणु भार भिन्न-भिन्न होते हैं, समस्थानिक कहलाते हैं। हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक हैं जिन्हें 1h11h21h3 से प्रदर्शित करते हैं।
समभारिक (Isobars)

भिन्न-भिन्न तत्वों के परमाणु जिनके परमाणु क्रमांक भिन्न-भिन्न परंतु द्रव्यमान संख्या समान होते  हैं, समभारिक कहलाते हैं। कार्बन तथा नाइट्रोजन की द्रव्यमान संख्या 14 है, अत: ये समभारिक हैं।
समन्यूट्रॉनिक (Isotones) –

जिन परमाणुओं में न्यूट्रॉनों की संख्या समान होती है, समन्यूट्रॉनिक कहलाते हैं। उदाहरण  6c13 व7N14 समन्यूट्रॉनिक हैं।
समावयवता (Isomerism)

कुछ यौगिक ऐसे होते हैं जिनके अणु सूत्र तो समान होते हैं, परंतु संरचनात्मक सूत्रों में भिन्नता के कारण ऐसे यौगिकों के गुण भी भिन्न-भिन्न होते हैं। उदाहरण- एथिल अल्कोहल व डाइमेथिल ईथर एक दूसरे के समावयवी हैं।
अपररूपता (Allotropy)

जब एक ही तत्व भिन्न-भिन्न रूपों में पाया जाता है तो ये रूप उस तत्व के  अपररूप कहलाते हैं। हीरा व कार्बन के दो अपररूप हैं। अपररूपों के भौतिक व रासायनिक गुण एक दूसरे से भिन्न होते हैं।
हाइड्रोजनीकरण

यह हाइड्रोजन उपयोग करने की बहुत ही महत्वपूर्ण औद्योगिक विधि है। जब गर्म तत्व वनस्पति तेल में निकिल (उत्प्रेरक) की उपस्थिति में तीव्र हाइड्रोजन प्रवाहित किया जाता है तो वनस्पति तेल ठोस वसा में परिवर्तित हो जाता है जिसे वनस्पति घी कहा जाता है। इस प्रक्रिया को ही हाइड्रोजनीकरण कहते हैं।
उत्प्रेरक

1835 में बर्जीलियस ने देखा कि कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जो रासायनिक क्रियाओं के वेग को प्रभावित करते हैं। परंतु रासायनिक क्रिया के फलस्वरूप ऐसे पदार्र्थों की संरचना या गुणधर्म अप्रभावित रहते हैं। ऐसे पदार्र्थों को उत्प्रेरक कहते हैं और इस प्रक्रिया को उत्प्रेरण कहते हैं।
तत्वों की आवर्त तालिका (Periodic table of Elements) – 
1869 में रूस के वैज्ञानिक दमित्री इवान विच मैंडलीफ ने प्रतिपादित किया कि अगर तत्वों को उनके परमाणु भार के क्रम से लिखा जाए तो उनके गुणधर्मों में एक स्पष्टï आवर्तन नजर आता है। इस आवर्त तालिका में क्षैतिज तथा उध्र्वाधर स्तम्भ (columns) होते हैं। आवर्त सारिणी में कुल मिलाकर 7 आवर्त (क्षैतिज स्तम्भ) तथा 18 समूह (Groups, उध्र्वाधर स्तम्भ) हैं। किसी भी एक उपसमूह में सभी तत्वों की विशेषताएँ समान होती हैं।
रासायनिक बंध (Chemical Bonding)
विभिन्न तत्वों के परमाणु रासायनिक अभिक्रिया करके आपस में आबंध निर्माण करते हैं तो उस क्रिया को रासायनिक बंधन कहते हैं। इस प्रकार तत्वों के परमाणु रासायनिक बंधन द्वारा नए अणुओं का निर्माण करते हैं। यह बंधन परमाणु के बाह्यïतम कक्षा में स्थित इलेक्ट्रॉन से बनता है। रासायनिक बंधन निम्नलिखित हैं-

  • वैद्युत संयोजकता (Electrovalency)– वैद्युत संयोजक तब बनता है जब एक परमाणु से इलेक्ट्रॉन पूर्णत: दूसरे तत्व के परमाणु में स्थानांतरित होते हैं। ऐसे बंध आयनिक बंध भी कहलाते हैं। उदाहरणार्थ, सोडियम क्लोराइड (हृड्डष्टद्य) का बनना।

 

  • सह संयोजकता (Co-valency)– दो परमाणुओं के संयुक्त होने का वह प्रक्रम जिसमें इलेक्ट्रॉनों की पारस्पारिक साझेदारी होती है, सह-संयोजकता कहलाती है। उदाहरण- क्लोरीन अणु का बनना।

 

  • उपसहसंयोजकता (Co-ordinate)– सह-संयोजकता में सह-भाजित इलेक्ट्रॉन युग्म की रचना के लिए प्रत्येक संयोजी परमाणु का एक-एक इलेक्ट्र्ॉन भाग लेता है। परंतु बहुत से ऐसे भी अणु हैं जिनमें सह-भाजित इलेक्ट्रॉन युग्म संयोजी परमाणुओं में से किसी एक ही परमाणु द्वारा दिये जाते हैं, परंतु इलेक्ट्रॉन का सह-भाजन दोनों परमाणुओं के बीच होता है। इस प्रकार के बंध को उपसह-संयोजक (Co-ordinate Bond) कहते हैं।

 

  • संयोजकता का सिद्धान्त (Theory of Valency)– तत्वों के परमाणुओं के परस्पर संयोजन करने की क्षमता को संयोजकता (Valency) कहते हैं। किसी तत्व की संयोजकता उसके परमाणु के बाहरी कक्षा में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करती है।

 

  1. जीवन का रासायनिक आधार

 

जीवन के सभी आधारभूत रसायन (प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, हार्मोन इत्यादि) कुछ गिने-चुने मूल तत्वों से बने होते हैं जैसे कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, सल्फर एवं फॉस्फोरस। इनमें सबसे प्रमुख कार्बन है। शरीर के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्बनिक यौगिक कार्बोहाइड्रेट, वसा एवं प्रोटीन हैं।

स्टार्च व शुगर में सभी प्रकार के कार्बोहाइड्रेट होते हैं जो सजीवों में ऊर्जा के प्राथमिक स्रोत हैं। प्रोटीन से संयोजी ऊतकों, मांसपेशियों और त्वचा का निर्माण होता है। रक्त में पाया जाने वाला ऑक्सीजन वाहक अणु हीमोग्लोबिन है जो एक प्रकार का प्रोटीन है। हीमोग्लोबिन में प्रतिपिंड होते हैं जो रोगों के प्रति रक्षा कवच का कार्य करते हैं। सभी प्रोटीनों में सबसे महत्वपूर्ण प्रोटीन एन्जाइम होता है। यह शरीर में होने वाले सभी रासायनिक परिवर्तनों का कारक एवं निर्देशक होता है। एन्जाइम से भोजन के पचने में मदद मिलती है।
सोडियम, पौटैशियम, मैग्नीशियम एवं कैल्शियम की जैववैज्ञानिक भूमिका
सोडियम, कैल्शियम, लोहा और फॉस्फोरस के अतिरिक्त लगभग 27 ऐसे तत्व हैं जो जैवरासायनिक अभिक्रिया में अतिआवश्यक हैं। पोटैशियम एक महत्वपूर्ण एन्जाइम सक्रियक है और तंत्रिका तथा ह्दय प्रकार्य में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। पोटैशियम कोशिकाओं में ग्लूकोज के उपापचय एवं प्रोटीन संश्लेषण में आवश्यक होता है। मैग्नीशियम सभी जीवों के लिए अत्आवश्यक होता है। यदि भोजन में फास्फोरस की मात्रा अधिक हो तो मैग्नीशियम, मैग्नीशियम फास्फेट बनकर अवक्षेपित हो जाता है। कैल्शियम भी सभी जीवों के लिए महत्वपूर्ण तत्व है। इससे मजबूत कंकाल तंत्र का निर्माण होता है। यह मांसपेशियों के संकुचन और हार्मोन स्रावित होने की क्रिया को पे्ररित करता है। शरीर में कैल्शियम की अधिक मात्रा होने से किडनी व गाल ब्लैडर में पथरी हो जाती है।
बायोटेक्नोलॉजी
बायोटेक्नोलॉजी का अर्थ है जीव विज्ञान के क्षेत्र में टेक्नोलॉजी का विस्तार। मुख्यत: यह जीवाणुओं, प्राणियों या पेड़-पौधों की कोशिकाओं या एन्जाइम के प्रयोग के द्वारा कुछ पदार्र्थों के संश्लेषण या भंजन या रूपांतरण से संबंधित है। यह एक अंत: विषयी विज्ञान है जिसमें विज्ञान की अनेक विधाएं जैसे जैव रसायन, सूक्ष्म जीवविज्ञान, रसायन अभियांत्रिकी आदि का समन्वय है।
बायोटेक्नोलॉजी के अनुप्रयोग
(1) इंसुलिन का उत्पादन यह एक प्रोटीन है जो अग्नाशय द्वारा स्रावित होती है तथा रक्त में शुगर की मात्रा को नियंत्रित करता है। आज बायोटेक्नोलॉजी की प्रगति से यह संभव है कि एक इंसुलिन उत्पादन के लिए उत्तरदायी संश्लेषित जीन को कृत्रिम रूप से बनाकर ई. कोलाई जीवाणु के प्लाजमिड से जोड़ दिया जाये। अब इंसुलिन मरीजों के लिए आसानी से कम कीमत में उपलब्ध होने लगा है।

 

(2) इंटेरफेरॉन का उत्पादन पॉलिपेप्टाइडो के उस समूह को इंटरफेरॉन कहते हैं जिनमें विषाणुओं के संदमन की क्षमता है। इंटरफेरॉन रक्त में विद्यमान घातक पारिसंचारी कोशिकाओं को क्रियाशील बनाते हैं जिससे वे विषाणुओं पर आक्रमण करके उन्हें नष्ट करना शुरू कर देते हैं। इनके पाश्र्व प्रभाव नहीं होते हैं और ये जुकाम, फ्लू, यकृतशोथ और हर्पीज के इलाज के लिए उपयुक्त हैं। 1980 में दो अमेरिकी वैज्ञानिकों- गिलबर्ट और वाइजमान ने बायोटेक्नोलॉजी से इंटरफेरान जीन को कोलॉन बैसिली नामक बैक्टीरिया में क्लोन किया।
(3) हार्मोन का उत्पादन हार्मोन वे यौगिक हैं जो अन्त:स्रावी ग्रन्थियों द्वारा स्रावित किए जाते हैं। इनका मुख्य कार्य लक्ष्य कोशिकाओं या अंगों के साथ पारस्परिक क्रियाओं द्वारा शरीर के महत्वपूर्ण प्रकार्र्यों को नियंत्रित करना है। कई बीमारियां जो इन हार्मोनों की कमी से होती हैं उनको ठीक करने के लिए हार्मोन को बाहर से दिए जाने की जरूरत होती है। बायोटेक्नोलॉजी की तकनीक, रिकॉम्बीनेंट डीएनए टेक्नोलॉजी व जीन क्लोनिंग से इनका उत्पादन संभव हो सका है। इस तकनीक से सोमाटोस्टेटिन हार्मोन और सोमेटोट्रॉपिन सफलतापूर्वक बनाए गए हैं।
एन्जाइम टेक्नोलॉजी एन्जाइम जीवित कोशिकाओं में पाए जाने वाले जैव अणु हैं। वे सभी जैव रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए उत्प्रेरक का काम करते हैं। इनके बिना जीवन का अस्तित्व संभव नहीं है।
एन्जाइम का उपयोग सदियों से कई औद्योगिक प्रक्रियाओं जैसे बेकिंग, निसवन, किण्वन, खाद्य परिरक्षण आदि में होता रहा है। आज एन्जाइम प्रौद्योगिकी कम खर्च में, अधिक दक्षता से और अधिक शुद्ध अवस्था में दवाओं और कृषि रसायनों का उत्पादन करने में सक्षम है। परंपरागत रूप से एन्जाइमों का पृथ्थकरण प्राणी और पौधों से किया जाता रहा है। लेकिन अब सूक्ष्मजीवों से पृथ्थकृत एन्जाइमों का उपयोग दिनों-दिन लोकप्रिय हो रहा है। सुअर के अग्नाशयी लाइपेज, घोड़े का यकृत ऐल्कोहल डिहाइड्रोजेनेज, काइमोट्रिप्सिन और ट्रिप्सिन व्यापारिक रूप से उपलब्ध एन्जाइमों के कुछ उदाहरण हैं।
किण्वन बायोटेक्नोलॉजी किण्वन टेक्नोलॉजी की एक ऐसी तकनीक है जिससे एन्जाइमों या पूर्ण जीवित कोशिकाओं द्वारा कम उपयोगी कार्बनिक पदार्र्थों से अधिक उपयोगी कार्बनिक पदार्थ बनाए जाते हैं। सभी कोशिकाओं में ग्लूकोज को पाइरुवेट में परिवर्तित करने की क्षमता होती है जिससे वायुवीय परिस्थितियों में प्रति ग्लूकोज अणु दो एटीपी अणु बनते हैं। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में पाइरुविक एसिड से लेक्टिक एसिड या एथिल अल्कोहल बनता है। सूक्ष्मजीवों की इसी क्षमता का उपयोग किण्वन क्रिया में किया जाता है।
किण्वन उद्योग में कई तरह के जीवों का उपयोग किया जाता है। इनमें खमीर, बैक्टीरिया और फफूंदी मुख्य हैं। ये तेजी से बढऩे में और एक ही प्रकार की एन्जाइम बनाने में बिल्कुल समान हैं। किण्वन बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में शराब, बियर, पनीर, सिरका आदि की सबसे ज्यादा मांग है।

 

  1. परमाणु संरचना क्या है?

परमाणु, तत्व का वह सबसे छोटा कण है, जो किसी रासायनिक क्रिया में भाग ले सकता है लेकिन स्वतंत्र रूप से नहीं रह सकता है | द्रव, ठोस व गैस सभी पदार्थों का निर्माण परमाणुओं (Atoms) से ही होता है | परमाणु आपस में मिलकर अणुओं (Molecules) का निर्माण करते हैं | तत्व या यौगिक का वह सबसे छोटा कण है, जो स्वतंत्र अवस्था में रह सकता है अणु कहलाता है |

परमाणविक तत्व

परमाणु का निर्माण परमाणविक तत्वों से मिलकर होता है जिनके नाम हैं – प्रोटान, न्यूट्रान तथा इलेक्ट्रान | प्रोटान व न्यूट्रान परमाणु के नाभिक में पाए जाते हैं और इलेक्ट्रान इस नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाता है | इलेक्ट्रान परमाणु के नाभिक के चारों ओर बहुत तेज गति से चक्कर लगता है | विभिन्न तत्वों को उनमें पाई जाने वाली प्रोटान  व इलेक्ट्रान की संख्या के आधार पर अलग किया जाता है, जैसे-सोने (Gold) के परमाणु नाभिक में प्रोटानों की संख्या 79 होती है और कार्बन के परमाणु नाभिक में केवल 6 प्रोटान होते हैं |

परमाणविक तत्वों में आवेश (Charge) पाया जाता है,जैसे – प्रोटान  धनात्मक आवेशित (Positively Charged) होते हैं और इलेक्ट्रान नकारात्मक आवेशित (Negatively Charged) होते हैं जबकि न्यूट्रान उदासीन (Neutral) होते हैं|  लेकिन फिर भी अणु उदासीन होते हैं क्योंकि उसमें प्रोटानों व इलेक्ट्रानों की संख्या समान होती है |

तत्वों की रासायनिक प्रकृति उनके परमाणुओं की संरचना, अर्थात् नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रानों की व्यवस्था, पर निर्भर करती है | इलेक्ट्रान विभिन्न कक्षाओं (Shells) में व्यवस्थित रहते हैं लेकिन सबसे बाहरी कक्षा सबसे महत्वपूर्ण होती है | स्थायी परमाणु की बाहरी कक्षा पूर्ण होती है | नोबेल गैस के नाम से पहचाने जाने वाले तत्वों ,जैसे-हीलियम आदि, की बाहरी कक्षा पूर्ण होती है | अन्य तत्वों की बाहरी कक्षा अपूर्ण होती है, इसीलिए वे  अन्य परमाणुओं के साथ बंध (Bond) बनाकर स्थायी अणु का निर्माण करते हैं |

परमाणु क्रमांक द्रव्यमान संख्या

किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटानों की संख्या को परमाणु क्रमांक कहते हैं | किसी परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटानों और न्यूट्रानों की कुल संख्या को द्रव्यमान संख्या कहते हैं |
समस्थानिक

समान परमाणु क्रमांक परन्तु भिन्न परमाणु द्रव्यमानों के परमाणुओं को समस्थानिक (Isotopes) कहते हैं | समस्थानिकों में   प्रोटानों की संख्या समान होती है लेकिन न्यूट्रानों की संख्या भिन्न होती है |
समभारिक

समान  परमाणु द्रव्यमान परन्तु भिन्न परमाणु क्रमांकके परमाणुओं को समभारिक (Isobars) कहते हैं |

 

4. रेडियोएक्टिविटी : अर्थ, खोज, प्रकार और उपयोग

प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले पदार्थों, तत्वों और उनके घटकों का कुछ निश्चित अदृश्य किरणों के द्वारा स्वयं विघटित होने की घटना को ‘रेडियोएक्टिविटी’ कहा जाता है | रेडियोएक्टिव पदार्थ से निकलने वाली अदृश्य किरणों को ‘रेडियोएक्टिव किरणें’ कहा जाता है | ये किरणें परमाणु के अस्थिर होने के कारण उत्पन्न होती हैं | रेडियोएक्टिविटी की घटना की सर्वप्रथम खोज ए. एच. बैकुरल ने 1886 ई. में की थी | उन्होने पाया कि फोटोग्राफिक प्लेट के प्रकाशरोधी पैकेज में होने बावजूद यूरेनियम लवण उसे प्रभावित कर रहा है| उन्होनेन यूरेनियम कि इस विशेषता को ‘रेडियोएक्टिविटी’ नाम दिया | बाद में पियरे क्यूरी और मैडम क्यूरी ने  प्लूटोनियम, फ्रांसियम और रेडियम में भी रेडियोएक्टिविटी के गून का पता लगाया |

रेडियोएक्टिव विकिरण  

(a) अल्फा कण  

  • ये धनात्मक आवेश युक्त हीलियन आयन हैं
  • भेदन क्षमता (penetrating power) बेहद कम होती है
  • कागज की एक परत द्वारा अवशोषित किए जा सकते हैं या एल्युमीनियम की चादर द्वारा रोका जा सकता है

(b) बीटा कण

  • ये ऋणात्मक आवेश युक्त प्रकाश कण हैं
  • भेदन क्षमता अल्फा कानों से अधिक होती है

(c) गामा किरणें

  • ये निम्न तरंगदैर्ध्य (Wavelength), उच्च आवृत्ति (Frequency) और उच्च ऊर्जा युक्त विद्युतचुम्बकीय (Electromagnetic) विकिरण है
  • इनकी भेदन क्षमता बहुत अधिक होती है और ये सीसे (lead) की कई सेमी. मोटी परत को भी पार कर सकती हैं

रेडियोएक्टिव समस्थानिक  

वे समस्थानिक जो अपने नाभिक में अतिरिक्त न्यूट्रानों की उपस्थिति के कारण अस्थायी होते हैं और विभिन्न प्रकार के विकिरण को उत्सर्जित करते हैं, रेडियोएक्टिव समस्थानिक कहलाते हैं, जैसे- कार्बन-14, सोडियम-74,आयोडीन-131,कोबाल्ट-60 और यूरेनियम-235 |

एक्स किरणें

  • एक्स किरणें प्रकाश के समान भेदन क्षमता युक्त विद्युतचुम्बकीय विकिरण का एक रूप हैं
  • इनकी तरंगदैर्ध्य निम्न होती है
  • ठोस पदार्थों को भी भेदने में सक्षम हैं
  • जब एंटी-कैथोड (उच्च परमाणु भार वाली धातु जैसे- टंगस्टन) पर कैथोड किरणें गिरती है तब एक्स किरणों की उत्पत्ति होती है

एक्स किरणों का उपयोग

धातु व हड्डी जैसे सघन पदार्थ लकड़ी या माँस जैसे पदार्थों की तुलना में अधिक तीव्रता से एक्स किरणों का अवशोषण करते हैं | इसीलिए चिकित्सा के क्षेत्र में रोग की पहचान हेतु एक्स-रे तस्वीर तैयार करना संभव है |

नाभिकीय अभिक्रिया

नाभिकीय अभिक्रिया वह क्रिया है जिसमें बहुत ही थोड़े समय में किसी अन्य उत्पाद को प्राप्त करने के लिए नाभिक पर न्यूट्रानों व प्रोटानों आदि मूल कणों की बौछार की जाती है या फिर उसकी किसी और नाभिक से अभिक्रिया कराई जाती है | प्रथम बार नाभिकीय अभिक्रिया की खोज रदरफोर्ड ने 1919 में की थी | उन्होने नाइट्रोजन पर अल्फा कणों की बौछार के दौरान इसकी खोज की थी |

नाभिकीय विखंडन

नाभिकीय विखंडन (Nuclear fission) एक बड़े नाभिक को दो छोटे नाभिकों में तोड़ने की क्रिया है, जिसके दौरान अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है | 1939 ई. में जर्मन वैज्ञानिक ओटो हान (Otto Hahan) और एफ. स्टीर्समन (F. Steersman) ने पाया कि जब वे यूरेनियम के नाभिक पर मंद न्यूट्रानों की बौछार करते हैं तो वह दो छोटे नाभिकों में टूट जाता है और बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा का उत्पादन होता है | यूरेनियम के नाभिक का टूटना ‘नाभिकीय विखंडन’ कहलाता है |

नाभिकीय विखंडन के प्रकार

  • नियंत्रित नाभिकीय विखंडन– इस तरह का विखंडन नाभिकीय रिएक्टरों में होता है, जहाँ विखंडन की क्रिया को मंद कर दिया जाता है और उत्पादित ऊर्जा का प्रयोग शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाता है |
  • अनियंत्रित नाभिकीय विखंडन– इस तरह का विखंडन परमाणु बमों में होता है, जहाँ अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा का उत्पादन होता है और विखंडन की क्रिया तब तक जारी रहती है जब तक सम्पूर्ण विखंडनीय पदार्थ (Fissionable Material) समाप्त न हो जाए |

प्रथम परमाणु बम

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा 6 अगस्त,1945 को जापान के हिरोशिमा शहर पर पहला परमाणु बम गिराया गया और उसके तीन दिन बाद ही 9 अगस्त, 1945 को जापान के ही नागासाकी शहर पर दूसरा परमाणु बम गिराया गया | इस बम में प्लूटोनियम-239 का प्रयोग किया गया था |

नाभिकीय संलयन

यह एक ऐसी नाभिकीय अभिक्रिया है जिसमें हल्के It is a nuclear reaction in which lighter nuclei fuse to form a nucleus of greater mass. नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया में अत्यधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है | अतः नियंत्रित परिस्थितियों में नाभिकीय संलयन की क्रिया द्वारा मानवीय उपयोग हेतु बड़ी मात्र में ऊर्जा को पैदा किया जा सकता है |

परमाणु / नाभिकीय ऊर्जा

परमाणु विखंडन या परमाणु संलयन द्वारा उत्पन्न ऊर्जा नाभिकीय या परमाणु ऊर्जा कहलाती है जिसका प्रयोग विभिन्न शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है |

समस्थानिक

समान परमाणु द्रव्यमान परंतु भिन्न परमाणु क्रमांक वाले परमाणुओं को समस्थानिक (Isotopes )

कहते हैं, जैसे- (i) 8016, 80178018  (ii) 1H11H21H3

समभारिक

समान परमाणु क्रमांक परंतु भिन्न परमाणु द्रव्यमानों वाले परमाणुओं को समभारिक (Isobars) कहते हैं, जैसे- (i) 18Ar4019K4020Ca40, (ii) 6C147N14

समन्यूट्रानिक

जिन परमाणुओं में न्यूट्रॉनों की संख्या समान होती हैं उन्हें समन्यूट्रानिक (Isotone) कहते हैं, जैसे-(i) lH3, 2He4, (ii) 4Si32

समइलेक्ट्रानिक

जिन आयनों और परमाणुओं के इलेक्ट्रानिक विन्यास समान होते हैं, उन्हें समइलेक्ट्रानिक (Isoelectronic) कहा जाता है | समइलेक्ट्रानिक परमाणुओं और आयनों में इलेक्ट्रानों की संख्या समान होती है, जैसे- Ne, Na+, Mg++ आदि|

श्रंखला अभिक्रिया  

श्रंखला अभिक्रिया एक परिघटना है जिसमें नाभिकीय विखंडन की क्रिया के दौरान मुक्त हुए न्यूट्रान पुनः परमाणुओं को विखंडित करते रहते हैं और बड़ी मात्रा में ऊर्जा को पैदा करते हैं | अर्द्ध-आयु वह समय है जिसमें रेडियोएक्टिव पदार्थ की मात्रा प्रारम्भ की तुलना में आधी रह जाती है |

 

5. रासायनिक अभिक्रिया और समीकरण क्या है?

क्रिस्टलीकरण(crystallisation), क्वथनांक(boiling), वाष्पीकरण(vaporisation), द्रवणांक(melting point), आदि प्रक्रियाओं को भौतिक परिवर्तन कहा जाता है | ये अपनी प्रकृति में परिवर्तनीय (Reversible) होते हैं | प्रकाश संश्लेषण, पाचन, फलों का पकना, कागज का जलना आदि कुछ ऐसी प्रक्रियाएं हैं जो पदार्थ के संघटन के साथ-साथ उसकी रासायनिक प्रकृति में भी बदलाव कर देती हैं और एक नए पदार्थ का निर्माण करती हैं, अतः ऐसी प्रक्रियाओं को रासायनिक अभिक्रिया कहा जाता है | अतः रासायनिक अभिक्रिया एक ऐसा प्रक्रम है जिसमें विभिन्न परमाणुओं का समूह मिलकर एक नया पदार्थ निर्मित करता है | रासायनिक अभिक्रिया में पदार्थ में निम्नलिखित बदलाव आ सकते हैं-

  • पदार्थ के रंग में परिवर्तन होना
  • पदार्थ की अवस्था में परिवर्तन होना
  • ताप ऊर्जा में परिवर्तन – ऊर्जा का अवशोषण या मुक्त होना
  • गैस का मुक्त होना
  • ध्वनि व प्रकाश की उत्पत्ति

रासायनिक समीकरण

अभिकारकों और उत्पादों को उनके रासायनिक फॉर्मूले के साथ सांकेतिक रूप से प्रदर्शित करना रासायनिक समीकरण कहलाता है| रासायनिक समीकरण में निम्नलिखित तत्व शामिल होते हैं –

  • अभिकारक (Reactants)
  • उत्पाद
  • एक तीर (Arrow) जो अभिकारक और उत्पाद को अलग करता है

अभिकारक ऐसे पदार्थ हैं जो रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेते हैं और उत्पाद ऐसे पदार्थ हैं जो जिनकी उत्पत्ति रासायनिक अभिक्रिया के परिणामस्वरूप होती है |

C + O2                →              CO2

अभिकारक                               उत्पाद

अभिकारक और उत्पादों की भौतिक अवस्था को निम्न रूप में दर्शाते हैं:

  • ठोस के लिए “(s)”
  • द्रव के लिए “(l)”
  • गैस के लिए “(g)”
  • जलीय विलयन के लिए“(aq)”
  • अभिक्रिया में उत्पन्न गैस के लिए “(↑)”.
  • अभिक्रिया की दिशा को दर्शाने के लिए “(→)”.

उदाहरण: Zn (s) + dil.H2SO4 (aq) → ZnSO4 (aq) + H2 (g) (↑)

(अभिकारक)                            (उत्पाद)

रासायनिक समीकरण रासायनिक अभिक्रिया को सरल रूप में समझने में सहायता करते हैं | रासायनिक समीकरण में अभिकारक और उत्पाद का द्रव्यमान समान भी हो सकता है और नहीं भी हो सकता है परंतु द्रव्यमान संरक्षण नियम के अनुसार ” अभिकारक और उत्पाद का कुल द्रव्यमान समान होना चाहिए” | अतः इस नियम के पालन के लिए रासायनिक समीकरण का संतुलित होना जरूरी है |

 

6. ऑक्सीकरणअपचयन तथा विलेय, विलयन विलायक

ऑक्सीकरण (Oxidation)

यह एक ऐसा प्रक्रम है जिसमें पदार्थ ऑक्सीजन से मिल जाता है अथवा उसकी हाइड्रोजन निकल जाती है। दूसरे शब्दों में ऑक्सीकरण वह प्रक्रम है जिसमें पदार्थ के इलेक्ट्रॉन कम हो जाते हैं। ऑक्सीकारक पदार्थ वे पदार्थ हैं जो दूसरे पदार्थों को ऑक्सीकृत कर देते हैं, जैसे पोटैशियम परमैंगनेट (्यरूठ्ठह्र४), नाइट्रिक अम्ल (॥हृह्र३) आदि।
अपचयन (Reduction)

अपचयन एक ऐसा प्रक्रम है जिसमें ऑक्सीजन निकलती है और हाइड्रोजन का संयोग होता है। आधुनिक परिभाषा के अनुसार अपचयन वह प्रक्रम है जिसमें पदार्थ के इलेक्ट्रॉन अधिक हो जाते हैं। अपचायक वे पदार्थ हैं जो दूसरे पदार्थों का अपचयन करते हैं तथा वे स्वयं ऑक्सीकृत हो जाते हैं, जैसे हाइड्रोजन सल्फाइड (॥२स्), हाइड्रोजन (॥२), कार्बन (ष्ट) आदि।
विलेय, विलयन विलायक

दो या दो से अधिक अणुओं, परमाणुओं अथवा आयनों या पदार्थों का समांगी मिश्रण (homogeneous Mixture) विलयन (Solution) कहलाता है।  जो पदार्थ घुलता है, उसे विलेय (solute) तथा जिस माध्यम में उसे घोला जाता है, वह विलायक (solvent) कहलाता है। यदि विलेय का अनुपात कम हो तो विलयन तनु (dilute) कहलाता है, तथा यदि विलेय का अनुपात अधिक हो तो विलयन सांद्रित (concetrated) कहलाता है।
किसी विलायक द्वारा विलेय पदार्थ को घोलने की क्षमता ही उसकी विलेयता (solubility) कहलाती है।
परासरण (Osmosis)

परासरण (osmosis) विलयन से सम्बद्ध एक असाधारण परिघटना है। यह विलायक अणुओं का अद्र्धपारगम्य (semipermeable) झिल्ली द्वारा कम सांद्रता वाले विलयन से अधिक सांद्रता वाले विलयन की ओर विसरण है।
मोलर नॉर्मल विलयन– एक लीटर विलायक में एक मोल विलेय का विलयन मोलर (1mव) विलयन कहलाता है। एक लीटर जल में 40 ग्राम NaOH से एक मोलर NaOH विलयन बनता है।
मोललता (Molality) – प्रति 1000 ग्राम विलायक में विलेय के मोलों की संख्या को मोललता कहते हैं।
हाइड्रोकार्बन
हाइड्रोजन व कार्बन से बने यौगिक हाइड्रोकार्बन कहलाते हैं। कार्बन परमाणुओं में स्वयं से बंधन करने का विलक्षण गुण पाया जाता है, जिसे शृँखलन (catenation) कहते हैं। इस गुण के कारण यह असंख्य हाइड्रोकॉर्बन के निर्माण में सक्षम हैं। हाइड्रोकार्बन का मुख्य स्रोत जीवधारी व पेट्रोलियम हैं। उदाहरण-
 CH3-CH2-CH2-CH3

     (normal beutane)

हाइड्रोकार्बन प्रत्यक्ष रूप से कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल इत्यादि के रूप में जीवन के आधार हैं। अधिकतर औषधियाँ, कृषि रसायन, ईंधन तथा प्लास्टिक भी हाइड्रोजन व कार्बन से बने यौगिक हैं।
हाइड्रोकार्बन दो भागों में विभाजित किए जा सकते हैं-

  • संतृप्त हाइड्रोकार्बन– ऐसे हाइड्रोकार्बन जिनके परमाणु परस्पर केवल एक आबंध (Single Bond) द्वारा जुड़े हों। उदाहरण – ब्यूटेन ( CH3-CH2-CH2-CH3)
  • असंतृप्त हाइड्रोकार्बन– ऐसे हाइड्रोकार्बन बहु-आबंध (Multiple Bond) से जुड़े हों। उदाहरण- बेंजीन (C6H6) ।

प्रकृति में कार्बन चक्र प्रकाश संश्लेषण

वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगभग निश्चित (0.04 प्रतिशत) रहती है। सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पौधे वायुमंडल से CO2 ग्रहण करके तथा क्लोरोफिल की सहायता से इसको ग्लूकोज, स्टार्च तथा सेलुलोज में बदल देते हैं। इस क्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं, इसे निम्न रूप से प्रदर्शित किया जाता है-
6CO2+6H2O → C6H12O6 + 6O2           (ग्लूकोज)
nCO2 + nH2O → [C(H2O)]n +nO2
इस अभिक्रिया में बनने वाली ऑक्सीजन वायुमंडल में मिल जाती है। रात्रिकाल में पौधे वायुमंडल से O2 लेते हैं व CO2 छोड़ते हैं। रात्रि के समय छोड़ी जाने वाली CO2 दिन में ग्रहण की गई CO2 की तुलना में बहुत कम होती है। अत: जो CO2 श्वसन व दहन में उत्पन्न होती है, वह पौधों द्वारा ही उपयोग में ली जाती है। अर्थात् वायुमण्डल में CO2 की मात्रा में कोई CO2 परिवर्तन नहीं होता है।
जीवों द्वारा निकाली गई CO2 व पौधों द्वारा ली जाने वाली CO2 के बीच एक चक्र चलता है। इस प्रक्रिया को कार्बन चक्र कहते हैं।
नाइट्रोजन चक्र

नाइट्रोजन प्राणियों व वनस्पतियों के लिए एक आवश्यक संघटक है और वृद्धि के लिए अपरिहार्य है। नाइट्रोजन का मुख्य स्रोत वायुमण्डलीय नाइट्रोजन है, परंतु प्राणियों और पादपों (Plants) में इस नाइट्रोजन को ग्रहण करने की क्षमता नहीं है। प्राणियों को नाइट्रोजन की आपूर्ति पादपों से होती है और पादपों को मृदा से मिलती है। प्रकृति में नाइट्रोजन का एक चक्र निरंतर चलता रहता है जो वायुमंडल में इसकी मात्रा को एक समान बनाए रखता है। मुक्त वायुमंडलीय नाइट्रोजन का नाइट्रोजनयुक्त यौगिकों में परिवर्तन नाइट्रोजन का यौगिकीकरण (Nitogen Flixation) कहलाता है।

अम्ल, क्षारक लवण (Acid, Base & Salt) 
अम्ल (Acid)– अम्ल हाइड्रोजनयुक्त पदार्थ होते हैं। जलीय विलयन में वे हाइड्रोजन आयन (H+) बनाते है। उदाहरण -सल्फ्यूरिक अम्ल, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल आदि।
क्षारक (BAse)- क्षारक ऐसे पदार्थ हैं जिनमें हाइड्रॉक्सिल समूह होते हैं और जो विलयन में हाइड्रॉक्सिल आयन (OH) बनाते हैं। सोडियम हाइड्रॉक्साइड, पौटेशियम हाइड्रॉक्साइड, सोडियम कार्बोनेट आदि महत्वपूर्ण क्षारक हैं। ऐसे क्षारक जो जल में घुलनशील होते हैं उन्हें क्षार (alkalies) कहा जाता है।
लवण (Salt)- लवण आयनिक यौगिक होते हैं। अम्ल और क्षार के बीच परस्पर अभिक्रिया होने से लवण एवं जल बनते हैं। इस अभिक्रिया को उदासीनीकरण (neutralisation) कहते हैं। सोडियम क्लोराइड, सोडियम सल्फेट इसके उदाहरण हैं।
PH_  विलयन के ग्राम आयन प्रति लीटर में हाइड्रोजन आयन का ऋणात्मक लघुगणक (Logarithm) PH कहलाता है।
PH  =-log[H+]

यह ० से 14 तक बिना किसी मापक इकाई के एक संख्या मात्र होती है। यदि क्क॥ का मान 0 से 6.9 के बीच है तो विलयन अम्लीय होता है, जबकि यही मान यदि 7.1 से 14 के बीच हो तो विलयन क्षारीय होता है। ऐसा विलयन जिसका PH 7 है, वह उदासीन होता है।
कोलाइड्स और कोलाइडल अवस्था

स्टार्च, गोंद, सरेस आदि पदार्थ जो अक्रिस्टलीय हैं और घुलनशील अवस्था में विसरित नहीं होते हैं या जिनमें जन्तु या पादप झिल्ली को पार करने की प्रकृति कम होती है, उन्हें कोलॉइड कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-

  • द्रवस्नेही कोलॉइड (Lyophilic colloids)– वे पदार्थ जैसे गोंद, जिलेटिन, स्टार्च, रबड़ आदि जो उपयुक्त द्रव, परिक्षेपण माध्यम में सीधे मिश्रित होकर कोलाइडल सॉल बनाते हैं, द्रवस्नेही ही कहलाते हैं।
  • द्रव विरोधी कोलॉइड (Lyophobic colloids) –धातुएँ और उनके सल्फाइड आदि सामान्य रूप से परिक्षेपण माध्यम से मिश्रित होकर कोलॉइडल सॉल का निर्माण नहीं करते हैं, बल्कि उनके कोलॉइडल सॉल का निर्माण केवल विशेष विधियों से होता है।

 

मिसेल्ससहयोजित कोलाइड
वे पदार्थ जिन्हें जब कम सांद्रण पर एक माध्यम में मिश्रित किया जाता है तो वह सामान्य रूप से व्यवहार करते हैं, लेकिन अधिक सांद्रण पर संगठित कणों के निर्माण की वजह से कोलाइडी अवस्था के गुण रखते हैं तो उन्हें ‘सहयोगी कोलाइड’ अथवा मिसेल्स कहते हैं। साबुन और कृत्रिम डिटर्जेन्ट इस वर्ग में आते हैं।
पायस (Emulsion) 
पायस एक ऐसा कोलाइडल प्रसाव है जिसमें ‘प्ररिक्षिप्त प्रावस्था’ और ‘परिक्षेपण माध्यम’ दोनों ही द्रव हैं। पायस का निर्माण दो द्रवों के मिश्रण को तेजी से हिलाकर या मिश्रण को कोलाइडल ‘मिल’ से प्रवाहित करके किया जाता है, जिसे समाँग कारक कहते हैं।
कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates) 
कार्बोहाइड्रेट्स ऐसे पदार्थ हैं जिनका सामान्य सूत्र Cx (H2O)y है। इनमें हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन के परमाणुओं का अनुपात उतना ही होता है जितना की जल में। इसलिए इन्हें कार्बोहाइड्रेट्स कहते हैं। कार्बोहाइड्रेट्स को सामान्यत: शर्करा भी कहते हैं। इन्हें दो भाग में विभाजित किया जाता है-

  • शर्करा– इसे भी दो भागों में विभाजित किया जाता है।
  • मोनोसैक्राइड्स- इसका जलीय विघटन नहीं किया जा सकता है। इसका सामान्य सूत्र CnH2nOnहै।
  • ऑलीगोसैक्राइड्स- इनके जलीय विघटन से 2-10 मोनोसैक्राइड अणु प्राप्त होते हैं। डाईसैक्राइड्स के उदाहरण सुक्रोज (C12H22O11), माल्टोज (C12H22O11), सेलोबायोज व लैक्टोज (C12H22O11) हैं।
  • पॉलीसैक्राइड्स– पॉलीसैक्राइड एकक शर्करा के बड़े बहुलक हैं जिनका अणुभार कई हजार से कई लाख होता है। इनके उदाहरण- स्टार्च (C6H10O5)n, ग्लाइकोजेन, पेक्टीन्स सेलुलोज इत्यादि हैं।

 

7. पर्यावरणीय रसायन विज्ञान क्या है?

पर्यावरणीय रसायन विज्ञान के अंतर्गत पर्यावरण में पाये जाने वाले रसायनों के स्रोत क्षेत्र, स्थानांतरण व प्रभाव के साथ-साथ पर्यावरणीय रसायनों पर मानवीय व अन्य जैविक क्रियाओं के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है| पर्यावरणीय रसायन विज्ञान की वर्तमान में पर्यावरणीय असंतुलन व प्रदूषण के अध्ययन व उनके निवारण के उपायों को खोजने में महत्वपूर्ण भूमिका है|

पर्यावरणीय प्रदूषण से तात्पर्य पर्यावरण में अवांछित व हानिकारक तत्वों के प्रवेश से है,जोकि जीवित जीवों के साथ-साथ सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं| पर्यावरणीय घटकों के आधार पर पर्यावरणीय प्रदूषण भी कई तरह का होता है,जैसे-वायु या वायुमंडलीय प्रदूषण, जल प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण,भूमि प्रदूषण आदि| लेकिन वायु या वायुमंडलीय प्रदूषण इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है|

वायु या वायुमंडलीय प्रदूषण

वायु या वायुमंडल विभिन्न गैसों व तत्वों का मिश्रण है और ये गैसें व तत्व वायु में एक निश्चित मात्रा व अनुपात में पाये जाते हैं | लेकिन जब बाहरी तत्व के वायु में मिलने या किसी गैस के वायुमंडलीय अनुपात में वृद्धि होने से वायु की गुणवत्ता मे हृास हो जाता है और वह जीव-जंतुओ और पादपों के लिए हानिकारक हो जाती है, तो उसे ‘वायु प्रदूषण’ कहते हैं और जिन कारकों से वायु प्रदूषित होती है उन्हें ‘वायु प्रदूषक’ कहते है।

वायु प्रदूषकों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जाता है:

  1. प्राथमिक वायु प्रदूषक
  2. द्वितीयक वायु प्रदूषक

प्राथमिक वायु प्रदूषक

‘प्राथमिक प्रदूषक’ सीधे एक प्रक्रिया से उत्सर्जित होते हैं,जैसे ज्वालामुखी क्रिया से निकली राख, वाहनों से निकली कार्बन मोनो ऑक्साइड गैस, उद्योगों से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड गैस आदि।

‘द्वितीयक प्रदूषक’ सीधे उत्सर्जित नहीं होते हैं, बल्कि प्राथमिक प्रदूषकों की आपसी क्रिया से वायु में बनते हैं, जैसे-प्रकाश-रासायनिक धूम्र कोहरा व पेरोक्सीएसिटाइल नाइट्रेट|

कुछ वायु प्रदूषक प्राथमिक और द्वितीयक दोनों तरह के हो सकते हैं, यानि वे सीधे भी उत्सर्जित हो सकते हैं और अन्य प्राथमिक प्रदूषकों से भी बन सकते हैं।

प्रमुख प्राथमिक वायु प्रदूषक

  • सल्फर डाइ ऑक्साइड(SO2): इसका उत्पादन ज्वालामुखी क्रिया व अनेक औद्योगिक प्रक्रमों द्वारा होता है| कोयले व पेट्रोलियम के दहन से भी सल्फर डाइ ऑक्साइड उत्पादित होती है| नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड की उपस्थिति में सल्फर डाइ ऑक्साइड सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) का निर्माण करती है,जो अम्ल वर्षा का प्रमुख कारण है|
  • नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड(NO2): इसका उत्पादन उच्च तापीय दहन और झंझावातों के दौरान आसमान में बिजली के चमकने से होता है| इसे शहरों के ऊपर भूरी धुंध के रूप में देखा जा सकता है|
  • कार्बन मोनो ऑक्साइड(CO):इसका उत्पादन कोयले, प्राकृतिक गैस व लकड़ी जैसे ईंधनों के अपूर्ण दहन से होता है| वाहनों से निकलने वाले धुएँ से भी इसका उत्पादन होता है| यह एक रंगहीन , गंधहीन व जहरीली गैस है|
  • मीथेन(CH4): इस गैस का उत्पादन धान के खेतों, पशुओं की चराई आदि से होता है और यह गैस वायुमंडलीय तापन हेतु जिम्मेदार ग्रीनहाउस गैस है|
  • पर्टिकुलेट मैटर(PM):यह अत्यंत छोटे आकार के ठोस धूल कण हैं, जो वायु में निलंबित (Suspended) अवस्था में पाये जाते हैं| ठोस कणों व गैस का मिश्रित रूप ‘ऐरोसोल’ (Aerosol) कहलाता है| कुछ पार्टिकुलेट की उत्पत्ति ज्वालामुखी क्रिया, धूल भरी आँधी, जंगल की आग आदि से होती है| ऐरोसोल की उत्पत्ति वाहनों, ऊर्जा संयंत्रों व उद्योगों में जीवाश्म ईंधनों के दहन से होती है|
  • क्लोरोफ़्लोरोकार्बन(CFCs): इसकी उत्पत्ति एयर कंडीशनर, रेफ्रीजरेटर व ऐरोसोल स्प्रे से होती है| यह गैस समतापमंडल में पहुँचकर अन्य गैसों के साथ क्रिया करओज़ोन परत को नष्ट कर देती है,जिसके कारण पराबैंगनी किरणें सीधे पृथ्वी के धरातल पर आकर त्वचा क़ैसर जैसे रोगों का कारण बनतीं हैं|
  • अमोनिया(NH3):यह कृषि क्रियाओं से उत्पादित होती है| वायुमंडल में अमोनिया सल्फर व नाइट्रोजन के ऑक्साइडों के साथ क्रिया कर द्वितीयक तत्वों का निर्माण करती है|

प्रमुख द्वितीयक वायु प्रदूषक

  • प्रकाशरासायनिक धूम्र कोहराप्राथमिक गैसीय प्रदूषकों से प्रकाश-रासायनिक धूम्र कोहरे/स्मोग (Smog) का निर्माण होता है,जोकि वायु प्रदूषण का एक प्रकार है| ‘पुरातन/क्लासिक स्मोग’ का निर्माण वहाँ होता है,जहाँ बड़ी मात्रा में कोयले का खनन होता है|ऐसे क्षेत्रों में सल्फर डाइ ऑक्साइड और धुएँ के मिश्रण से इसका निर्माण होता है| ‘आधुनिक/मॉडर्न स्मोग’ का निर्माण वाहनों व उद्योगों से निकलने वाले धुएँ से होता है| यह धुआँ सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों के साथ मिलकर द्वितीयक प्रदूषकों का निर्माण करता है,जोकि प्राथमिक उत्सर्जन के साथ मिलकर प्रकाश-रासायनिक धूम्र कोहरे का निर्माण करते हैं|
  • पेरोक्सीएसिटाइल नाइट्रेट (Peroxyacetyl nitrate-PAN): यह प्रकाश-रासायनिक धूम्र कोहरे में पाया जाता है| यह तापीय दृष्टि से अस्थिर है और पेरोक्सीएथिनाइल (Peroxyethanoyl) कणों व नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड गैस में विघटित हो जाती है| जब एथेनॉल का उपयोग वाहनों में ईंधन के रूप में किया जाता है,तो इसका निर्माण हानिकारक हो जाता है और इसके कारण एसिटएल्डेहाइड (Acetaldehyde) का उत्सर्जन बढ़ जाता है, जोकि वातावरण में धूम्र कोहरे का निर्माण करता है|

अम्ल वर्षा: अम्ल वर्षा (Acid Rain) वायु प्रदूषण का परिणाम है| वाहनों व अन्य स्रोतों से निकलने वाली सल्फर डाइ ऑक्साइड व नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड गैस बादलों में निहित छोटे-छोटे जल कणों के साथ क्रिया कर सल्फ्यूरिक व नाइट्रिक अम्ल का निर्माण करती है|जब इन बादलों से वर्षा होती है, तो उसके अत्यधिक अम्लीय होने के कारण अम्ल वर्षा कहा जाता है| अम्ल वर्षा हिम, जल या कुहासा या शुष्क धूल किसी भी रूप में हो सकती है|अम्ल वर्षा का मृदा, पेड़-पौधों, इमारतों व जल स्रोतों आदि पर गंभीर प्रभाव पड़ता है|

 

8. ‘पेट्रोलियमकी निर्माण प्रक्रिया तेल शोधन

पेट्रोलियम धरातल के नीचे स्थित अवसादी परतों के बीच पाया जाने वाला संतृप्त हाइड्रोकार्बनों का काले भूरे रंग का तैलीय द्रव हैजिसका प्रयोग वर्तमान में ईंधन के रूप में किया जाता है| पेट्रोलियम को जीवाश्म ईंधन भी कहते हैं, क्योंकि इनका निर्माण धरातल के नीचे उच्च ताप व दाब की परिस्थितियों में मृत जीव-जंतुओं व वनस्पतियों के जीवाश्मों के रासायनिक रूपान्तरण से होती है|

पेट्रोलियम शब्द का निर्माण पेट्रो अर्थात चट्टान और ओलियम अर्थात तेल से मिलकर हुआ हैइसीलिए इसे चट्टानी तेल’ या रॉक ऑयल भी कहा जाता है| वर्तमान विश्व में इसे,इसके ऊर्जा के स्रोत के रूप में महत्व के कारण, काला सोना भी कहा जाता है|

पेट्रोलियम का निष्कर्षण शोधन

पेट्रोलियम की प्राप्ति धरातल के नीचे स्थित अवसादी चट्टानों के ऊपर कुएं खोदकर की जाती है,जिसे ड्रिलिंग भी कहते है| विश्व में सबसे पहले पेट्रोलियम कुएं की खुदाई संयुक्त राज्य अमेरिका के पेंसिवेनिया राज्य में स्थित टाइटसविले स्थान पर की गयी थी| ड्रिलिंगसे प्राप्त होने वाले पेट्रोलियम के रूप को कच्चा तेल (Crude Oil) कहा जाता है| कच्चे तेल को रिफायनरियों में प्रसंस्कृत किया जाता है|  पेट्रोलियम से ही पेट्रोल,मिट्टी के तेल,विभिन्न हाइड्रोकार्बनोंईंथरप्रकृतिक गैस आदि को प्राप्त किया जाता है| पेट्रोलियम से इसके अवयवों के अलग करने की विधि प्रभावी आसवन विधि (FractionalDistillation Method) कहा जाता है| इसे पेट्रोलियम/तेल का शोधन (Petroleum Refining) कहा जाता है|

डीजल: यह एक तरह का तैलीय द्रव हाइड्रोकार्बन है, जो पेट्रोलियम के प्रभाजी आसवन से प्राप्त होता है और इसका प्रयोग वाहनों,उद्योगों,रेलवे, आदि में ऊर्जा के स्रोत के रूप में किया जाता है| यह पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक है, क्योंकि इसके जलने से अनेक ऐसी गैसें निकलती हैं जोकि विषैली होती हैं,जैसे-सल्फर डाई ऑक्साइड|यह पेट्रोल की तुलना में सस्ता होता है|

सिटी डीजल’ डीजल का एक ऐसा रूप है,जिसके जलने से हानिकारक गैसों का कम उत्पादन होता है|इसमें सल्फर की मात्रा कम होती है,इसीलिए इसे अल्ट्रा लो सल्फर डीजल भी कहते हैं| यूरोप के अधिकांश शहरों में इसके प्रयोग होने के कारण इसे सिटी डीजल कहते हैं|

द्रवित पेट्रोलियम गैस (एल.पी.जी.):यह प्रोपेन,ब्यूटेन और आइसो ब्यूटेन जैसे हाइड्रोकार्बनों का द्रवित मिश्रण है,जिसका प्रयोग रसोई गैस के रूप में किया जाता है| इसे भी पेट्रोलियम के

प्रभाजी आसवन से प्राप्त किया जाता है| इस गैस के रिसाव की पहचान के लिए इसमें दुर्गंधयुक्त मरकेप्टन नाम की गैस मिलाई जाती है|

गैसोहोल: यह पेट्रोल व एल्कोहल का मिश्रण है,और गन्ने के रस से मिलने वाले एल्कोहल को पेट्रोल में मिलाकर प्राप्त किया जाता है| इसकी खोज ब्राज़ील में की गयी थी|

पेट्रोलियम के उपयोग

पेट्रोलियम का उपयोग निम्न रूपों में किया जाता है:

  • परिवहन में
  • औद्योगिक ऊर्जा के रूप में
  • प्रकाश व ऊष्मा जनन हेतु
  • स्नेहक (Lubricants) के रूप में
  • पेट्रोकेमिकल उद्योगों में
  • पेट्रोलियम के उप-उत्पादों (By- Products) का विविध रूप में उपयोग

पेट्रोलियम ऊर्जा का प्रमुख स्रोत और उद्योगों में व्यापक रूप से प्रयोग किया जाने वाला रासायनिक उत्पाद है| लेकिन वर्तमान में इसकी बढ़ती मांग की आपूर्ति प्राकृतिक स्रोतों से पूरी नहीं हो पा रही है,अतः अब आवश्यकता है कि इसके विकल्पों की तलाश की जाए| संयुक्त राज्य अमेरिका,चीन,भारत आदि पेट्रोलियम के सबसे बड़े उपभोक्ता है,जिसकी आपूर्ति सऊदी अरब,इराक, ईरान जैसे तेल सम्पन्न देशों द्वारा की जाती है| अतः वर्तमान में किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर पेट्रोलियम के उपभोग और उत्पादन का व्यापक प्रभाव पड़ता है| भारत में पेट्रोलियम की माँग और घरेलू उत्पादन के बीच बहुत बड़ा अंतर है,इसी कारण से भारत के आयात उत्पादों में पेट्रोलियम का स्थान सबसे ऊपर रहता है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव यहाँ की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं|

9. जैवनाशक (Biocide) और कृन्तकनाशक (Rodenticides) का प्रयोग किसलिए किया जाता है?

 

जैवनाशक (Biocide) जीवों के लिए एक जहरीला पदार्थ है, जिसका प्रयोग जैवनाशी उत्पाद (Biocidal Product) में जीवाणु (Bacteria) की वृद्धि को नियंत्रित करने या उन्हें मारने के लिए किया जाता है, जबकि कृन्तकनाशी (Rodenticidesवैसे रसायन होते हैं जिनका प्रयोग फसलों में कृन्तकों (Rodents)  को मारने के लिए किया जाता है।

जैवनाशक

जैवनाशक एक सक्रिए रासायनिक अणु है, जिसका प्रयोग जैवनाशी उत्पाद में जीवाणु (Bacteria) की वृद्धि को नियंत्रित करने या उन्हें मारने के लिए किया जाता है|

जैवनाशक के कार्य

  • जैवनाशक वैसे रसायनिक कारक (Agents) होते हैं, जिनका प्रयोग स्वास्थ्य एवं मृदा की रक्षा हेतु सूक्ष्मजीवों (Microorganisms) को मारने के लिए किया जाता है। ब्लीच, एथिल एल्कोहॉल, नमक, आयोडीन, पेरॉक्साइड आदि कुछ ऐसे उत्पाद हैं, जिनमें जैवनाशक पाये जाते हैं।
  • जीवाणु को मारने के लिए रोगाणुरोधी/सूक्ष्मजीवीरोधी (Antimicrobial) का प्रयोग किया जाता है, लेकिन कई बार उनके गुणक स्वभाव (Multiplying Nature) के कारण वे उन्हें मारने में असमर्थ रहते हैं। ऐसे में जैवनाशकों का प्रयोग किया जाता है।
  • कई कार्य करने वाले जीवाणु को मारने के लिए, अलग–अलग रूपों में मिलाए गए जैवनाशकों का प्रयोग प्रभावकारिता को कम करने में किया जाता है। जैवनाशी उत्पादों में कई अणु होते हैं, जो जीवाणु के कार्यप्रणाली को नियंत्रित कर सकते हैं। मिलाए जाने कुछ उत्पाद, जैसे-आर्द्रक (Surfactants) और झिल्ली पारगम्यक (Membrane Permeabilisers), जीवाणु की प्रभावकारिता को कम कर देते हैं।

जैवनाशकों के उपयोग

  • जैवनाशकों का प्रयोग कीटाणुनाशक (Disinfectants) या रोगाणु-रोधक (Antiseptics) के तौर पर किया जा सकता है। इसका मानव शरीर पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता।
  • खाद्य उत्पादों में इन्हें संरक्षक (Preservatives )या सूक्ष्मजीवीरोधी (Antimicrobials) के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • जीवाणु या कवक को मारने के गुण के कारण जैवनाशक सौंदर्य उत्पादों को बनाने में उपयोगी हो सकते हैं।
  • कपड़ों को जीवाणु के संक्रमण से बचाने के लिए भी जीवनाशकों का प्रयोग किया जाता है। सिंथेटिक कपड़ों में ट्रोकोल्सन (Trocolson) मुख्य घटक है।
  • जैवनाशकों का प्रयोग पशु चारा रक्षक (Animal Feed Preservatives) के रूप में किया जाता है क्योंकि यह चारे को सूक्ष्मजीवों के कारण से खराब होने से बचाता है।
  • जैवनाशकों का प्रयोग मछली पालन और पशु खाद्य मूल (Animal Food Origin)  के तौर पर किया जाता है।
  • पानी के उपचार के लिए भी अब जैवनाशकों को पसंद किया जाता है, क्योंकि पूर्व में इस्तेमाल किए जाने वाले क्लोरीन के दुष्प्रभाव (Side Effects) भी होते हैं।

कृन्तकनाशी

ये वैसे रसायन होते हैं, जिनका प्रयोग फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कृन्तकों, जैसे-चूहों, को मारने के लिए किया जाता है। कृन्तक खाद्य उत्पादों, भवनों और फसलों को नुकसान पहुँचा सकते हैं। कृन्तकनाशियों को आम तौर पर इस तरह बनाया जाता है कि वे कृन्तकों को अपनी ओर आकर्षित कर सकें।

कृन्तकनाशी के प्रकार

  • स्कंदकरोधी(Anti Coagulant): ये ऐसे कृन्तकनाशी हैं, जो रक्त के थक्के को बनने से रोकते हैं। ब्रोमाडीयोलोन, क्लोरोफासीनोन, डिफेथिएलोन, ब्रोडिफाकम सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ स्कंदरोधी कृन्तकनाशी हैं।
  • गैर– स्कंदरोधी(Non Anti-Coagulant): कुछ स्कंदरोधी कृन्तकनाशी अलग तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं। उनमें से कुछ हैं: जिंक, फॉस्फाइड, ब्रोमेथालिन (bromethalin), कॉलेकैल्सिफेरॉल (cholecalciferol)और स्ट्रीक्नीन (strychnine)।

ज्यादातर कृन्तकनाशी जहरीले होते हैं, लेकिन उनमें से कुछ का स्वास्थ्य या त्वचा पर बुरा प्रभाव पड़ता है। फंसाने (trapping ) जैसी पद्धतियों के प्रयोग द्वारा कृन्तकनाशी का प्रयोग प्रतिबंधित है। ग्लू बोर्ड ट्रैप (Glue board trap) फंसाने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले गैरविषाक्त तरीकों में से एक है।

कृन्तकनाशी कृन्तकों को मारता है। ये कृन्तक फसलों को प्रभावित कर सकते हैं, क्योंकि अगर उन्हें नहीं हटाया गया तो ये सड़ जाएंगे और मिट्टी में मिल कर प्रतिकूल प्रभाव पैदा कर सकते हैं। हालांकि, कृन्तकनाशी तैयार करने में सावधानियाँ बरती जाती हैं।

कम विषाक्त कृन्तकनाशी

कम विषाक्त कृन्तकनाशी में 500 से 5000 किग्रा. शरीर के भार के बीच LD50 होता है और इसमें रेड स्क्विल (Red Squill), नॉर्म बाइड्स (Norm Bides) और वारफारिन (Warfarin) प्रकार के कृन्तकनाशी होते हैं।

  • रेड स्क्विलः इसमें कई प्रकार के यौगिक होते हैं, जिनके गुण डिजिटालिस ग्लाइकोसाइड्स (Digitalis Glycosides) के जैसे ही होते हैं। वमन गुणों (Emetic Properties) के कारण उनमें अवशोषण और मारने की क्षमता कम होती है। रेड स्क्विल मानव विषाक्तता से जुड़ा हुआ नहीं है।
  • नॉर्म बाइडः इसका प्रयोग सिर्फ चूहों पर किया जाता है। इसमें इस्कीमिक नेक्रोसिस (Ischaemic Necrosis) होता है, जो सिर्फ चूहों में पाया जाता है। इसकी थोड़ी सी खुराक ही बिना किसी प्रतिकूल प्रभाव के चूहों को मार सकती है।
  • हेमरिज (Haemorrhage):यह स्कंदकरोधी कृन्तकनाशी का प्रकार है, जो कृन्तकों के रक्तस्राव (Bleeding) का कारण नहीं बनता है। कम विषाक्तता के कारण इनका प्रयोग बार– बार किया जा सकता है।

कृन्तकनाशी कीटनाशक (Pesticides) होते हैं और इनका इस्तेमाल कीटनियंत्रक (Pest Controller) के रूप में होता है और इसका अनुमोदन चिकित्सा वैज्ञानिकों द्वारा किया जाता है। हालांकि, विषाक्तता महत्वपूर्ण कारक है, जिसे प्रयोग से पहले मापा जाना चाहिए। जिन कृन्तकनाशकों के इस्तेमाल की सलाह नहीं दी जाती, उनकी खुराक फसलों के लिए खतरनाक साबित होती है। इसके बाद फसलों से कृन्तकों को हटाने के लिए फंसाने वाली पद्धति (Trapping methods) बहुत अच्छी होनी चाहिए। कृन्तकों का रक्तस्राव मिट्टी के साथ मिश्रित नहीं चाहिए और इससे बचने के लिए उचित उपाय करने चाहिए।

10. सेरेमिक : एक अकार्बनिक आधात्विक ठोस

सेरेमिक एक अकार्बनिक व अधात्विक ठोस है, जिसका निर्माण धात्विक व अधात्विक पदार्थों से होता है | इसकी सतह को उच्च तापमान पर गर्म करके कठोर, उच्च प्रतिरोधकता युक्त व भंगुर (Brittle) बनाया जाता है |

सेरेमिक के प्रकार

सेरेमिक के निम्नलिखित दो प्रकार होते हैं :

  1. परंपरागत सेरेमिक:परंपरागत सेरेमिक पदार्थों का निर्माण चीका/क्ले पदार्थ या क्वार्ट्ज़ रेत से होता है | बॉल क्ले (Ball clay), चाइना क्ले (China clay), फेल्डस्पार, सिलिका, डोलोमाइट, कैल्साइट व टैल्क सामान्य पदार्थ हैं, जिनका प्रयोग सेरेमिक के निर्माण में होता है | सेरेमिक निर्माण प्रक्रिया में पाउडर का निर्माण सबसे महत्वपूर्ण चरण है | सेरेमिक निर्माण के समय क्षेत्रफल (Surface Area), कणों के आकार व वितरण, कणों के आकार, कणों के घनत्व आदि सामान्य कारकों को ध्यान में रखा जाता है | परंपरागत सेरेमिक उत्पादों में सेरेमिक बर्तन, सेनेटरी वेयर, टाइल्स, संरचनात्मक चीका उत्पाद व अग्नि-रोधक पदार्थ आदि शामिल हैं |
  2. उन्नत सेरेमिक :इलेक्ट्रोनिक, इलेक्ट्रिकल और ऑप्टिकल उद्योगों में सेरेमिक के बढ़ते प्रयोग और चुम्बकीय अनुप्रयोगों (Applications) ने इसे पाउडर के रूप से विभिन्न घनत्व वाली एक ठोस व सघन सामग्री (Thick Material) में बदल दिया है | इसके निर्माण में अत्यधिक उन्नत (Advanced) उत्पादन तकनीकों का प्रयोग किया जाता है, ताकि प्राप्त सेरेमिक पाउडर पर्याप्त शुद्ध हो और उसे इच्छानुसार आकार में बदला जा सके | इनमें से कई विधियाँ काफी महँगी भी हैं| अतः उन्नत सेरेमिक उद्योग में पाउडर का निर्माण एक मुख्य लागत कारक (Cost Factor) है|

सेरेमिक निर्माण की नवीन विधियाँ

सेरेमिक बनाने की परंपरागत अग्नि विधि के अतिरिक्त वर्तमान में सेरेमिक बनाने के लिए कई अन्य विधियाँ भी प्रयोग में लायी जाती हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है-

  • बहिर्वेधन (Extrusion): इस विधि में साँचों की सहायता से सेरेमिक पाउडर को पेस्ट जैसे पदार्थ में बदलकर इच्छानुसार आकार में ढाला जा सकता है |
  • जिगरिंग (Jiggering): इस विधि के द्वारा सेरेमिक पाउडर को घुमावदार आकार में बदल दिया जाता है ताकि उसका प्रयोग इलेक्ट्रोनिक व इलेक्ट्रिकल उपयोगों में किया जा सके |
  • हॉट प्रेसिंग (Hot pressing): इस विधि में सेरेमिक पाउडर को उच्च ताप पर गर्म करने के बाद शीट आकार में ढाल दिया जाता है, जिसका प्रयोग विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है |
  • प्रतिक्रिया बंधन (Reaction Bonding): यह सेरेमिक निर्माण की एक नयी तकनीक है, जिसमें सिलिकन पाउडर को इच्छानुसार रूप में ढालकर नाइट्रोजन गैस की सहायता से गर्म किया जाता है | इस विधि से उच्च घनत्व वाले लचीले रूप को प्राप्त किया जाता है, जिसका उपयोग उद्योगों में किया जाता है |

सेरेमिक की उपयोगिता

  • इलेक्ट्रोनिक व इलेक्ट्रिकल उद्योगों में बेरियम टिटेनेट (Barium Titanate-BaTiO3), पीजोइलेक्ट्रिक पदार्थों व सेमीकंडक्टर पदार्थों जैसे उन्नत सेरेमिक पदार्थों का सेरेमिक कैपेसिटर्स (Ceramic Capacitors),वाइव्रेटरों (Vibratos), तापमान सेंसरों, ओसिलेटर्स (Oscillators) आदि के उत्पादन में बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाता है |
  • चुम्बकीय सेरेमिक , जोकि उन्नत सेरेमिक का एक प्रकार है ,का प्रयोग एंटेना (Antennas) और इंडक्टरों (Inductors) के निर्माण में किया जाता है |
  • बायो सेरेमिक, जैसे- उच्च घनत्व व शुद्धता वाली एल्युमिना, का प्रयोग दाँतों के प्रत्यारोपण (Implants) में किया जाता है |
  • बायो सेरेमिक का प्रयोग आँख के चश्मे, रासायनिक बर्तन, और कूल्हों व घुटनों आदि के प्रतिस्थापन (Replacement) जैसी चिकित्सा गतिविधियों में भी किया जाता है |
  • परंपरागत सेरेमिक का प्रयोग प्राचीन सभ्यताओं में भी किया गया था, जबकि उन्नत सेरेमिक का विकास हाल ही में हुआ है |
  • सेरेमिक का प्रयोग वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने वाले उत्प्रेरक परिवर्तक (catalytic convertor) के रूप में भी किया जाता है |
  • सेरेमिक की पहचान एक हल्के पदार्थ की है, इसीलिए कई औद्योगिक उपकरणों में धातु की जगह इसके प्रयोग को वरीयता दी जाती है |
  • पीजोइलेक्ट्रिक सेरेमिक पदार्थों तनाव व दबावयुक्त परिस्थितियों में निम्न मात्रा में विद्युत धारा उत्पादित कर सकते हैं, जिसका प्रयोग धात्विक विफलताओं (Metal Failures) व भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं का पता लगाने में किया जा सकता है |
  • इसका प्रयोग प्रतिदीप्ति या फ़्लोरोसेंट बल्बों व ट्यूबलाइटों पर परत चढ़ाने के लिए किया जा सकता है |

 

11. धातु निष्कर्षण, पेट्रोलियम, स्टील, जंग सीमेंट ग्लास की मूलभूत जानकारी

प्राकृतिक और अशुद्ध रूप में पाये जाने वाले खनिजों से धातुओं को शुद्ध रूप में प्राप्त करना ‘धातु निष्कर्षण कहलाता है | पृथ्वी की ऊपरी परत अर्थात क्रस्ट धात्विक खनिजों का प्रमुख स्रोत है, लेकिन कुछ धात्विक खनिज सागरीय जल में भी मिलते हैं|

धातुएँ प्रायः मिश्रित रूप में पायी जाती हैं, लेकिन कभी-कभी ये मुक्त अवस्था में भी मिलती हैं| प्रकृति में धातुओं के पाये जाने की अवस्था धातु की प्रकृति पर निर्भर करती है | ऐसी धातुएँ जो कम क्रियाशील हैं और ऑक्सीज़न, नमी या अन्य रासायनिक अभिकर्मकों (Reagents) के प्रति कोई बंधुता नहीं दर्शाती हैं, प्रकृति में प्रायः मुक्त या अमिश्रित अवस्था में पायी जाती हैं | लेकिन अधिकतर धातुएँ क्रियाशील होती हैं, इसीलिए मिश्रित अवस्था (जैसे-यौगिक रूप) में पायी जाती हैं |

पृथ्वी पर पाये जाने वाले जिन प्राकृतिक पदार्थों से इन धातुओं की प्राप्ति होती है, उन्हें ‘खनिज कहा जाता है | खनिजों का एक निश्चित संघटन होता है, ये एकल यौगिक या जटिल यौगिक के रूप में मिल सकते हैं | ऐसे खनिज जिनसे धातुओं को सुविधाजनक और आर्थिक दृष्टि से लाभदायक तरीके से प्राप्त किया जा सकता है, उन्हें ‘अयस्क (Ore) कहते हैं |  सभी अयस्क खनिज होते हैं लेकिन सभी खनिज अयस्क नहीं होते हैं | उदाहरण के लिए बॉक्साइट (Al2O3. 2H2O)  और क्ले/चीका ((Al2O3.2SiO2.2H2O) दोनों ही एल्युमीनियम के खनिज है, लेकिन एल्युमीनियम का निष्कर्षण बॉक्साइट से किया जाता है न कि चीका से | इसलिए एल्युमीनियम का अयस्क बॉक्साइट है |

पेट्रोलियम

‘पेट्रोलियम’ धरातल के नीचे प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला ज्वलनशील पदार्थ या विभिन्न आण्विक भार वाले हाइड्रोकार्बन का जटिल मिश्रण है | इसे ‘जीवाश्म ईंधन भी कहा जाता है क्योंकि इसका निर्माण पृथ्वी के नीचे दबे हुये मृत जैविक पदार्थों पर अत्यधिक ताप व दाब के कारण हुई भूगार्भिक क्रिया से होता है | पेट्रोलियम शब्द में प्राकृतिक रूप से से पाया जाने वाला अप्रसंस्कृत कच्चा तेल व प्रसंस्कृत कच्चे तेल से प्राप्त पेट्रोलियम पदार्थ दोनों ही शामिल हैं |

पेट्रोलियम अनेक हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण है, जिनमें एल्केन (रेखीय या शाखित), साइक्लोएल्केन्स, एरोमैटिक हाईड्रोकार्बन या फिर एस्फ़ाल्टेंस जैसे कुछ अधिक जटिल रसायनों के अणु सर्वाधिक पाये जाते हैं | पेट्रोलियम के प्रत्येक प्रकार में अणुओं का एक विशिष्ट मिश्रण पाया जाता है, जोकि उस पेट्रोलियम के रंग और गाढ़ेपन जैसी भौतिक व रासायनिक विशेषताओं को निर्धारित करता है | अधिकतर पेट्रोलियम की प्राप्ति तेल वेधन (Oil Drilling) द्वारा होती है |

स्टील

‘स्टील’ एक मिश्रित धातु है जिसका निर्माण लौह व कुछ अन्य तत्वों, मुख्यतः कार्बन, को मिलाकर किया जाता है | कुछ तत्व, जैसे-कार्बन, मैंगनीज,फॉस्फोरस, सल्फर, सिलिकन और ऑक्सीज़न,नाइट्रोजन व एल्युमीनियम की अल्प मात्रा स्टील में हमेशा पायी जाती है | इसके अलावा कुछ तत्वों, जैसे-निकिल, क्रोमियम, मोलिब्डेनम, बोरॉन, टिटैनियम,वैनेडियम, निओबियम आदि को स्टील के गुणों में बदलाव लाने के लिए इसमें मिलाया जाता है |

Source: livemint.com

जंग लगना

लोहे से बनी किसी वस्तु को जब किसी नमी वाले स्थान में कुछ दिन रख दिया जाता है तो इन वस्तु पर कत्थई (Brown) रंग की एक परत सी जम जाती है, जिसे ‘जंग लगना’ कहते हैं। जंग वास्तव में लोहे का ऑक्साइड है, क्योंकि जब लोहे के परमाणु ऑक्सीजन से संयोग (Combine) करते हैं तो लोहे का ऑक्साइड बनता है। लोहे के परमाणुओं का ऑक्सीजन से मिलना ‘ऑक्सीकरण (Oxidation) कहलाता है। लोहे पर जंग लगने के लिए ऑक्सीजन और नमी का उपस्थित होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि शुष्क स्थान पर लोहा ऑक्सीजन से संयोग नहीं कर पाता है। जब लोहे की किसी वस्तु पर जंग लगनी शुरू हो जाती है तो धीरे-धीरे वह उस वस्तु की सारी सतह पर फैल जाती है। जंग पानी को सोखता है और यह पानी उस वस्तु के दूसरे हिस्सों के परमाणुओं को ऑक्साइड बनने में मदद करता है।

Source: telegraph.co.uk

सीमेंट ग्लास

यह एक बंधनकारी मिश्रण है, जिसका प्रयोग काँच/ग्लास के साथ काँच/ग्लास को या अन्य तत्वों(जैसे धातु) को जोड़ने के लिए लिए किया जाता है |

 

12. अयस्क में पायी जाने वाली अशुद्धियों को कैसे अलग किया जाता है?

किसी शुद्ध धातु को उसके अयस्क से प्राप्त करने की सम्पूर्ण विधि धातुकर्म (Metallurgy) कहलाती है | अयस्क को तोड़ना व पीसना, अयस्कों का सान्द्रण, धातु का निष्कर्षण और धातु का शोधन धातुकर्म के चार चरण होते हैं | अयस्क (Ore) में से अशुद्धियों को बाहर निकालने की प्रक्रिया को सान्द्रण कहा जाता है | अशुद्धि को दूर करने की विधि का चयन अयस्क की प्रकृति के आधार पर किया जाता है | चार तरह की विधियों के द्वारा अयस्क में से अशुद्धियों को अलग किया जाता है ,जिनके नाम हैं- जलीय शोधन, चुम्बकीय पृथक्करण, झाग प्लवन और लीचिंग |

अयस्क के सान्द्रण की विधि

अयस्क में  समान्यतः मृदा, बालू व अन्य अनुपयोगी सिलिकेट भी पाये जाते हैं | अयस्क में निहित इन अशुद्धियों को गैंग (Gangue) कहा जाता है | अयस्कों में से गैंग को अलग करना अयस्कों का सान्द्रण या प्रसाधन कहलाता है | अयस्कों के सान्द्रण की विधियाँ निम्नलिखित हैं-

  • जलीय शोधन(Hydraulic Washing): इस विधि में अयस्कों के चूर्ण को बहती हुई जलधारा में धोते हैं, जिससे भारी अयस्क कण नीचे बैठ जाते हैं और बालू, मिट्टी आदि अशुद्धियाँ या तो जल में घुल जाती हैं या फिर बहकर निकल जाती हैं | इस तरह गैंग (Gangue) या सभी तरह के हल्के पदार्थ, भारी धात्विक अयस्क  से अलग हो जाते हैं | इसे गुरुत्वीय पृथक्करण भी कहा जाता है |
  • चुम्बकीय पृथक्करण(Magnetic Separation): इस विधि से फ़ेरोचुंबकीय अयस्क अलग किए जाते हैं | इसमें अयस्कों के चूर्ण को चुम्बकीय पट्टे पर डाला जाता है, जिससे चुम्बकीय कण पट्टे से चिपक जाते हैं और अचुंबकीय कण पट्टे से दूर गिर जाते हैं  बाद में  अलग हुये चुम्बकीय अयस्क को एकत्र कर लिया जाता है |
  • झाग प्लवन विधि(Froth Flotation): इस विधि का प्रयोग सल्फाइड अयस्क से गैंग (अशुद्ध पदार्थ ) को अलग करने के लिए किया जाता है | जब सल्फाइड अयस्क को तेल व गैस के मिश्रण में डालते हैं तो सल्फाइड अयस्क तेल द्वारा जल्द भीगता है और आँय अशुद्धियाँ जल द्वारा जल्द भीगती हैं | तेल व जल में बने हुए सल्फाइड अयस्क के निलंबन में जब वायु प्रवाहित करते हैं तो सल्फाइड अयस्क के कण झाग बनकर ऊपर आ जाते हैं और अशुद्धियाँ नीचे बैठ जाती हैं |
  • लीचिंग: इस विधि में सूक्ष्म विभाजित अयस्क को किसी ऐसे विलायक में घुलाते हैं जिसमें अयस्क तो घुल जाता है लेकिन अशुद्धियाँ नहीं घुलती हैं | सिल्वर, गोल्ड, एल्युमीनियम के अयस्क इस विधि द्वारा अलग किए जाते हैं |

 

13. मानव जीवन में रसायनशास्त्र का क्या महत्व है?

रसायनशास्त्र विज्ञान की वह शाखा है जिसमें पदार्थों के संघटनसंरचनागुणों और रासायनिक प्रतिक्रिया के दौरान इनमें हुए परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता हैमानव जीवन को रसायनशास्त्र से अलग करके नहीं देखा जा सकता है क्योंकि जीवित-अजीवित, गैस, द्रव, ठोस पदार्थों से लेकर पाउडर जैसे पृथ्वी का सबसे कोमल खनिज व हीरे जैसे सबसे कठोर खनिज तक रासायनिक तत्वों से ही मिलकर बने हैं |

स्वयं मानव शरीर भी रासायनिक संयोजन से बना है और मानव जीवन के लिए आवश्यक पर्यावरण भी रासायनिक तत्वों का ही मिश्रण है | दिन-प्रतिदिन के जीवन में रसायनशास्त्र के उपयोग निम्नलिखित हैं :

स्वास्थय

डिटोल व फिनायल आदि जिनका प्रयोग घरों में शरीर के घावों की सफाई औरक कीटाणुनाशक के रूप में किया जाता है वास्तव में रासायनिक पदार्थ ही हैं |डिटोल को क्लोरोजाइलीनॉल कहा जाता है | डॉक्टर भी मरहम पट्टी करने से पहले घाव को हाइड्रोजन परॉक्साइड से साफ़ करता है जीवनुनाशक गुण के कारण आयोडीन के टिंक्चर का प्रयोग अस्पतालों में ड्रेसिंग के लिया किया जाता है | ब्लीचिंग पाउडर/ कैल्सियम हाइपोक्लोराइट का प्रयोग जल स्रोतों की सफाई व नालियों को साफ़ करने में किया जाता है |माउथवाश बनाने और दंतशल्यक्रिया में फीनोल का प्रयोग किया जाता है |

सौंदर्य प्रसाधन

वर्त्तमान में अधिकतर सौंदर्य प्रसाधनों का निर्माण रासायनिक पदार्थों के द्वारा ही होता है जैसे –नेलपॉलिश में टिटेनियम ऑक्साइड का प्रयोग किया जाता है, कोल्ड क्रीम खनिज तेल मोम,पानी और बोरेक्स के मिश्रण में इत्र को मिलाकर तैयार की जाती है ,पाउडर के निर्माण में खड़िया, टेलकम, जिंक ऑक्साइड, चिकनी मिट्टी का चुर्ण और स्टार्च आदि को इतर के साथ मिलाया जाता है और लिपस्टिक का निर्माण मोम, तारकोल और तेल के द्वारा होता है|

स्टेशनरी वस्तुएं

कागज का निर्माण लकड़ी से लुगदी निकलकर किया जाता है फिर उसमें कई तरह के रासयन डाले जाते हैं जिनके प्रयोग से उसमें से अवांछनीय पदार्थ बहार निकल जाते हैं और शुद्ध सेलुलोज बच जाता है |फिर इसे ब्लीचिंग पाउडर से विरंजित कर इसमें खड़िया मिट्टी या स्टार्च को मिलाया जाता है | पेन्सिल में उपस्थित ग्रेफाइट भी कार्बन का अपरूप है और ये मुलायम व विद्युत् सुचालक होता है |

फोटोग्राफी

जब किसी वस्तु की फोटो खिंची जाती है तो वस्तु से प्रकाश कैमरे के लेंस होता हुआ फिल्म पर पड़ता है और फिल्म पर लगे सिल्वर यौगिक के रसायनिक परिवर्तन से वास्तु का निगेटिव तैयार हो जाता है | बाद में निगेटिव से पोजिटिव चित्र सोडियम थायोसल्फेट से लेपित कागज पर उतार लिया जाता है और डवलप कर लिया जाता है |

साबुन डिटर्जेंट

साबुन व डिटर्जेंट रासायनिक यौगिक या यौगिकों का मिश्रण हैं जिनका प्रयोग शोधन/धुलाई के लिए किया जाता है | साबुन सोडियम या पौटेशियम लवण तथा वसीय अम्लों का मिश्रण होता है जो पानी में शोधन क्रिया (Cleansing Action) करता है  जबकि डिटर्जेंट भी यही काम करता है लेकिन धुलाई /शोधन के लिए वह साबुन की तुलना में  बेहतर होता है क्योंकि पानी की कठोरता का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है |

कृषि कार्य

वर्तमान में कृषि कार्य में रसायनों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है | उर्वरक व कीटनाशक रासायनिक मिश्रण ही हैं जो फसल की उत्पादकता बढ़ाने के साथ साथ उन्हें नष्ट होने से भी बचाते है | उच्च उपज वाले बीजों का निर्माण भी रासायनिक क्रिया द्वारा होता है | उर्वरकों, कीटनाशकों तथा उच्च उपज वाले बीजों का भारत में हरित क्रांति लाने में महत्वपूर्ण योगदान था जिससे न केवल देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हुआ बल्कि खाद्य सुरक्षा की स्थिति भी बेहतर हुई है |

उद्योग परिवहन   

वस्त्र उद्योग, धातु उद्योग, चमड़ा उद्योग, पेट्रोरसायन उद्योग आदि में रसायनों का किसी भी न किसी रूप में प्रयोग किया जाता है | कच्चे तेल से पेट्रोल, डीजल, केरोसिन आदि को रासायनिक क्रिया द्वारा ही अलग किया जाता है | परिवहन में प्रयोग होने वाली सीएनजी गैस भी रासायनिक मिश्रण है | चमड़ा बनाने की क्रिया, जिसे टैनिंग कहते हैं, रासायनिक प्रक्रिया ही है |

इन क्षेत्रों के अलावा भी हथियारों के निर्माण, बर्तनों के निर्माण आदि में रसायनशास्त्र की महत्वपूर्ण भूमिका है और मानव जीवन में इसकी भूमिका लगातार बढ़ती ही जा रही है |

 

14. साबुन और डिटर्जेंट: निर्माण रासायनिक संरचना

साबुन व डिटर्जेंट रासायनिक यौगिक या यौगिकों का मिश्रण हैं जिनका प्रयोग वस्तुओं की शोधन/धुलाई के लिए किया जाता है | इनका विस्तार से विवरण नीचे दिया गया है :

साबुन

साबुन सोडियम या पौटेशियम लवण तथा वसीय अम्लों का मिश्रण होता है जो पानी में शोधन क्रिया (Cleansing Action) करता है| सोडियम स्टेराइट(Sodium stearate),सोडियम ओलिएट (sodium oliate) और सोडियम पल्मिटेट (sodium palmitate)  साबुन के ही कुछ उदाहरण हैं जिनका निर्माण क्रमशः स्टियरिक अम्ल (stearic acid), ओलिक अम्ल (oleic acid) व पामिटिक अम्ल (palmitic acid) से होता है | साबुन में वसा (Fat) और तेल (Oils) पाए जाते हैं |

सोडियम साबुन कठोर होता है इसलिए इसका प्रयोग कपड़े  धोने के लिए किया जाता  है एवं पोटैशियम साबुन मुलायम होता है इसलिए इसका उपयोग नहाने एवं दाढ़ी बनाने में होता है। इनके अलावा कार्बोलिक साबुन का उपयोग त्वचा से सम्बंधित रोगों  के इलाज व कीटाणुनाशक के रूप में किया जाता है।

साबुन मैल को कैसे साफ़ करता है ?

अधिकांश मैल तेल किस्म का होता है इसीलिए जब मैले वस्त्र को साबुन के पानी में डाला जाता है तो तेल और पानी के बीच का पृष्ठ तनाव बहुत कम हो जाता है और वस्त्र से अलग होकर मैल छोटी- छोटी गोलियों के रूप में तैरने लगता है| ऐसा यांत्रिक विधि से हो सकता है अथवा साबुन के विलयन में उपस्थित वायु के छोटे-छोटे बुलबुलों के कारण हो सकता है। साबुन का इमल्शन (Imulsion) अलग हुए मैल को वापस कपड़े पर जमने से रोकता है |

भारत में साबुन निर्माण का इतिहास

भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान इंग्लैंड के लीवर ब्रदर्स ने पहली बार आयात कर आधुनिक तरीके के साबुन भारत में पेश किये । लेकिन ‘नॉर्थ वेस्ट सोप कंपनी’ पहली ऐसी कंपनी थी जिसने 1847 ई. में भारत में साबुन बनाने का कारखाना स्थापित किया | साबुन की कामयाबी की एक अहम कड़ी में बाद में 1918 ई. में जमशेदजी टाटा ने केरल के कोच्चि में ‘ओके कोकोनट ऑयल मिल्स’ खरीदकर भारत के साबुन बनाने के पहले स्वदेशी कारखाने की स्थापना की |

साबुन की निर्माण प्रक्रिया / साबुनीकरण 

साबुन के निर्माण के लिए आवश्यक वसा (Fat) और तेल (Oils) को पौधों व जन्तुओं से प्राप्त किया जाता है| साबुन निर्माण की प्रक्रिया को ‘साबुनीकरण (Saponification)’ कहते हैं | साबुन बनाने के लिए तेल या वसा को कास्टिक सोडा के विलयन के साथ मिलाकर बड़े-बड़े बर्तनों में लगभग 8 घंटे तक उबाला जाता है। अधिकांश तेल साबुन बन जाता है और ग्लिसरीन उन्मुक्त (Release) होता है। अब बर्तन में लवण डालकर साबुन का लवणन (salting) कर निथरने को छोड़ दिया जाता है | साबुन ऊपरी तल पर और जलीय द्रव निचले तल पर अलग-अलग हो जाता है। निचले तल के द्रव में से ग्लिसरीन को निकाल लेते हैं। साबुन में क्षार (Base) का सांद्र विलयन डालकर तीन घंटे तक फिर गरम करते हैं। इससे साबुनीकरण की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। साबुन को फिर पानी से धोकर 2 से 3 घंटे उबालकर थिराने के लिए छोड़ देते हैं। 36 से 72 घंटे के बाद ऊपर के स्वच्छ चिकने साबुन को निकाल लिया जाता है। यदि साबुन का रंग कुछ हल्का करना हो, तो थोड़ा सोडियम हाइड्रोसल्फाइट डाल देते हैं।

साबुन निर्माण की प्रक्रिया

कपड़े धोने वाले साबुन में 30% पानी रहता है जबकि नहाने के साबुन में पानी की मात्रा 10% के लगभग होती है |यदि नहाने का साबुन बनाना है, तो सूखे साबुन को काटकर आवश्यक रंग और सुगंधित द्रव्य मिलाकर पीसते हैं, फिर उसे प्रेस में दबाकर छड़ (बार) बनाते और छोटा-छोटा काटकर उसको मुद्रांकित करते हैं। पारदर्शक साबुन बनाने में साबुन को ऐल्कोहॉल में घुलाकर तब टिकिया बनाते हैं। कसाबुन के निर्माण में प्रयोग होने वाले तेल के रंग पर ही साबुन का रंग निर्भर करता है। सफेद रंग के साबुन के लिए तेल और रंग की सफाई आवश्यक है। तेल की सफाई तेल में थोड़ा सोडियम हाइड्रॉक्साइट का विलयन (Solution) मिलाकर गरम करने से होती है। साबुन को मुलायम अथवा जल्द घुलने वाला और चिपकने वाला बनाने के लिए उसमें थोड़ा अमोनिया या ट्राइ-इथेनोलैमिन मिला देते हैं।

डिटर्जेंट

डिटर्जेंट धुलाई /शोधन के लिए वह साबुन की तुलना में  बेहतर होता है क्योंकि पानी की कठोरता का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है | डिटर्जेंट में पेट्रोकेमिकल विलयनों (Solutions) का प्रयोग होता है | पेट्रोकेमिकल और ओलियो केमिकल्स ,सल्फरट्राईऑक्साइड ,सल्फ्यूरिक अम्ल, एथिलीन ऑक्साइड आदि ऐसे ही कुछ पदार्थ है | क्षार (Alkali) के रूप में पौटेशियम और सोडियम का प्रयोग किया जाता है |

साबुन डिटर्जेंट निर्माण हेतु सावधानियाँ

  1. साबुन का हाथों या कपड़ों पर कोई विषैला या खतरनाक प्रभाव न पड़े|
  2. चूँकि साबुन में पानी व रसायन शामिल होता है अतः यह जाँच की जानी चाहिए कि खुले पर्यावरण में या सूर्य के प्रकाश में आने पर इनमें पर्यावरण के प्रति कोई हानिकारक क्रिया न हो |
  3. यह जाँच भी की जानी चाहिए कि निर्माण के बाद कितने समय के अन्दर इनका उपयोग किया जाना उचित होगा |