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सम्मान का मजाक Editorial page 14th May 2018

By: D.K Chaudhary

 65वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह को लेकर हुआ विवाद कला की दृष्टि से बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इसने सरकार के रवैये पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस बार समारोह में विभिन्न श्रेणियों में कुल 131 विजेताओं को सम्मानित किया जाना था। लेकिन समारोह से एक दिन पहले विजेताओं को सूचित किया गया कि सिर्फ 11 को छोड़कर बाकी लोगों को यह पुरस्कार सूचना प्रसारण मंत्री के हाथों दिया जाएगा। विजेताओं ने इससे नाराज होकर समारोह का बहिष्कार करने का फैसला किया। 53 विजेता अपना पुरस्कार लेने नहीं पहुंचे। अब तक यह पुरस्कार राष्ट्रपति ही देते रहे हैं। सिर्फ वर्ष 2012 में 59वें पुरस्कार तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील के छुट्टी पर होने के कारण तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने दिए थे।
राष्ट्रपति के प्रेस सचिव का कहना है कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद कार्यभार संभालने के बाद से ही ऐसे कार्यक्रमों के लिए केवल एक घंटे का वक्त ही दे रहे हैं। गणतंत्र दिवस या कोई बेहद महत्वपूर्ण बैठक ही इसका अपवाद हो सकती है। आयोजकों को कई हफ्ते पहले बता दिया गया था कि राष्ट्रपति इस कार्यक्रम के लिए एक घंटा ही उपलब्ध रहेंगे। सवाल है कि जब सूचना प्रसारण मंत्रालय को यह पहले से पता था तब विजेताओं को अंधेरे में क्यों रखा गया? क्या सरकार के विभिन्न अंगों के बीच आपसी तालमेल और संवाद की कमी है? लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह जैसा आयोजन प्रेजिडेंट के लिए कम महत्वपूर्ण क्यों हैं? अब तक इन पुरस्कारों का महत्व ही इसीलिए रहता आया है कि इसे राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है। राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किए जाने का मतलब है, किसी व्यक्ति की सर्वोच्च उपलब्धि के लिए भारतीय राष्ट्र द्वारा उसका सम्मान। 

विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण प्रदर्शन करने वाले नागरिकों को पुरस्कृत कर राजसत्ता दरअसल जनता को गरिमा प्रदान करती है, उसके सामने सिर झुकाती है और इस तरह जनतंत्र का सम्मान करती है। इसीलिए कुछ सर्वश्रेष्ठ सम्मान सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति यानी राष्ट्रपति के हाथों दिए जाते हैं। ऐसा करना राष्ट्रपति के प्रमुख दायित्वों में शामिल है। क्या वर्तमान राष्ट्रपति की प्राथमिकताएं बिना किसी घोषणा के बदल गई हैं? अगर सत्ता प्रमुख देश की कुछ प्रतिभाओं को सम्मानित करने के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पाता तो इसे व्यवस्था के जनता की पहुंच से बाहर होने का संकेत क्यों नहीं माना जाना चाहिए? जिन लोगों को प्रेजिडेंट के हाथों पुरस्कार नहीं मिला, वे तो एक तरह से कमतर मान लिए गए। इस तरह इन पुरस्कारों में दो श्रेणियां हो गईं। यह सिलसिला जारी रहा तो यह पुरस्कार अपनी गरिमा खो देगा, लिहाजा बेहतर होगा कि अगले साल यह गलती सुधार ली जाए। 

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