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पारदर्शिता के पक्ष में Editorial page 06th Nov 2018

केंद्रीय सूचना आयुक्त (सीआईसी) जिस तरह से भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर को कड़े शब्दों में नोटिस जारी करने को मजबूर हुए हैं, वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश की प्रमुख संस्थाओं के शीर्ष पर बैठे लोग सूचना के अधिकार को हलके में ले रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सोच-समझकर कर्जा न चुकाने वालों (विलफुल डिफॉल्टर्स) की लिस्ट न जारी करने से नाराज सीआईसी ने रिजर्व बैंक के गवर्नर से पूछा है कि क्यों न उन पर अधिकतम जुर्माना लगाया जाए। खास बात यह कि इस मामले में रिजर्व बैंक के गवर्नर अकेले दोषी नहीं हैं। 

प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और वित्त मंत्रालय भी इस मामले में सीआईसी के निशाने पर हैं। हाल के वर्षों में बैंकों का बट्टा खाता और खराब लोन बढ़ने की समस्या लगातार विकराल रूप लेती गई है। इसके बावजूद न तो हमारी बैंकिंग संस्थाएं इसे लेकर सतर्क होती दिखी हैं, न ही सरकार के स्तर पर किसी अतिरिक्त सावधानी के संकेत मिल रहे हैं। संसदीय समिति ने जब बैंकों के डूबते कर्जों की समस्या पर आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन से उनकी राय मांगी, तब उनके जवाब के जरिये देश को यह जानकारी मिली कि ऐसे बड़े लोन डिफॉल्टरों की एक सूची वह पीएमओ को पहले ही सौंप चुके हैं, जिनकी बहु-एजेंसी जांच जरूरी है। यह सूचना सार्वजनिक होने के बाद भी सरकार के संबंधित विभाग और मंत्रालय को यह बताना उचित नहीं लगा कि डिफॉल्टरों की जांच के लिए उन्होंने कोई कदम उठाया है या नहीं। 

जब सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत आवेदन देकर इस आशय की सूचनाएं मांगी गईं, तब भी पीएमओ समेत सारे विभाग इस सवाल को गैरजरूरी बताकर सूचनाएं छुपाते रहे। ऐसे में यह आशंका होना स्वाभाविक है कि सरकार के विभिन्न विभाग और भारतीय रिजर्व बैंक न केवल इन बड़े डिफॉल्टरों के नाम गोपनीय रखे हुए हैं, बल्कि इन्हें किसी भी तरह की कार्रवाई से बचाना चाहते हैं। मुमकिन है कि इसके पीछे पीएमओ, वित्त मंत्रालय और आरबीआई गवर्नर की यह चिंता हो कि चूंकि प्रमुख डिफॉल्टरों की सूची में दिग्गज कारोबारियों और बड़ी-बड़ी कंपनियों के नाम हैं, इसलिए उसे सार्वजनिक करने से इन कारोबारियों और कंपनियों की साख प्रभावित हो सकती है। 

ऐसा हुआ तो देश में आर्थिक विकास के मौजूदा माहौल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। मगर सारे किंतु-परंतु के बाद भी इस हकीकत को झुठलाया नहीं जा सकता कि लोकतंत्र में पारदर्शिता का कोई विकल्प नहीं होता। थोड़े समय के लिए इससे देश का कुछ नुकसान हो तो भी दीर्घकालिक दृष्टि से यह व्यवस्था को बेहतर बनाती है और समाज को बड़े खतरों से बचाती है। इस खास मामले में ही डिफॉल्टरों के खिलाफ समय से कार्रवाई हो जाती तो बैंकों से लोन लेकर उसे साफ हजम कर जाने की लीक न चल पड़ती और देश संभवत: इस संकट से बच जाता।

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