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पाबंदी की कथा (Editorial Page) 22nd Jan 2018

By: D.K Chaudhary
सुप्रीम कोर्ट ने चार राज्यों द्वारा फिल्म पद्मावत  के प्रदर्शन पर लगाई गई पाबंदी को गलत करार दिया है। इसके साथ ही संजय लीला भंसाली की इस फिल्म के रिलीज होने का रास्ता अब पूरी तरह साफ हो गया है। उम्मीद है कि कहानी और प्रस्तुतिकरण के मामले में यह एक अच्छी फिल्म होगी। लेकिन यह भी तय है कि इसकी कथा में उतने उतार-चढ़ाव नहीं होंगे, जितने कि इस फिल्म की कहानी से लेकर इसकी रिलीज तक रास्ते में आए। दिसंबर 2016 में जब भंसाली ने इस फिल्म को बनाने की घोषणा की, तब उन्होंने कहा कि वह अपनी अब तक की सबसे बड़ी फिल्म बनाने जा रहे हैं। उस समय तक शायद उन्हें भी नहीं पता था कि वह अब तक के सबसे बड़े विवाद में फंसने जा रहे हैं। फिल्म कथाओं के बारे में अक्सर हमें यह पहले ही पता होता है कि अंत होते-होते कहानी किस तरफ जाएगी। लेकिन भंसाली की इस फिल्म के बारे में अंत तक यह बताना मुश्किल था कि इसका जो राजनीतिक किस्सा इन दिनों गरम है, वह अंत में किस तरफ जाएगा। इस फिल्म की कहानी किसी की भावनाओं को बहुत ज्यादा आहत कर रही होगी, यह आशंका तो पहले भी बहुत नहीं थी, लेकिन इसे लेकर होने वाली राजनीति शुरू से ही कई खतरों की ओर इशारा कर रही थी। डर का एक बड़ा कारण यह भी था कि जिन क्षेत्रों में फिल्म को लेकर विरोध चल रहा है, उनमें से दो प्रदेशों में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे मौकों पर राजनीतिक दल यह सोचने लगते हैं कि अगर हमने इस मुद्दे को छोड़ दिया, तो दूसरा दल पकड़ लेगा। इसी स्पद्र्धा में खतरा बढ़ता जाता है। 

इन्हीं विवादों का दबाव था कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड को प्रमाणपत्र दे देने के बाद भी फिल्म पर फिर से विचार करना पड़ा। हालांकि दोबारा भी उसे फिल्म की कथा में कोई खोट नजर नहीं आया। बस उसे एक ही चीज समझ में आई कि इसे ऐतिहासिक चरित्र पद्मावती से न जोड़कर देखा जाए, इसलिए इसका नाम मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत  पर रखा जाए। हालांकि नाम बदलने का भी बहुत असर नहीं दिखा और विरोध करने वाले विरोध करते रहे। इसी विरोध के दबाव में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और मध्य प्रदेश की सरकारों ने यह घोषणा कर दी कि उनके राज्य में फिल्म पर पाबंदी रहेगी। इसी पाबंदी का मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो कोर्ट ने इसे न सिर्फ गलत ठहराया, बल्कि राज्य सरकारों को यह जिम्मेदारी भी सौंपी कि वे इसकी वजह से कानून-व्यवस्था को न बिगड़ने दें।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का महत्व सिर्फ इतना ही नहीं है कि उसने फिल्म के रिलीज पर लगी पाबंदी को गलत ठहराया, बल्कि यह भी है कि उसने एक संस्था के रूप में सेंसर बोर्ड की हैसियत को भी स्थापित किया है। पिछले कुछ दिनों से यह सवाल पूछा जाने लगा था कि अगर सेंसर बोर्ड द्वारा पास कर दिए जाने पर भी राजनीतिक कारणों से किसी फिल्म पर पाबंदी लग सकती है, तो ऐसे में सेंसर बोर्ड का क्या अर्थ रह गया? इसका संदेश यही जाता कि राजनीति एक संस्था से ज्यादा बड़ी है। अतीत में ऐसा होता भी रहा है कि फिल्म को सेंसर बोर्ड ने तो पास कर दिया, लेकिन राजनीतिक कारणों से फिल्म को कई जगहों पर लोग देख ही नहीं सके। माना जाना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद सब बंद हो जाएगा। विरोध करने वालों और पाबंदी लगाने वालों को भी यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि इंटरनेट के युग में वैसे भी ऐसी पाबंदियों और विरोध का कोई अर्थ नहीं। अब ऐसे तमाम तरीके हैं, जिनसे लोग आसानी से फिल्म देख सकते हैं, कहीं भी और कभी भी

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