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दुश्मन भी एक साथ Editorial page 14th Sep 2018

By: D.K Chaudhary

विपक्षी दलों ने तेलंगाना में अचानक सामने आ खड़ी हुई चुनाव की चुनौती को ध्यान में रखते हुए जिस तेजी से वहां महागठबंधन का ऐलान किया, वह इस बात का संकेत है कि विपक्ष की सुस्ती दूर हो रही है। और तो और, अपने जन्मकाल से ही कांग्रेस की विरोधी रही तेलुगूदेशम ने भी यहां उसके साथ जाने का फैसला किया है! 

हाल तक देश में सबका ध्यान राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों पर ही लगा था, जहां आगामी लोकसभा चुनावों से पहले विधानसभा चुनाव होने हैं। मगर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने विधानसभा भंग करने की घोषणा से सबको चौंका दिया। कानूनन, विधानसभा भंग होने के छह महीने के अंदर चुनाव होने जरूरी हैं, तो चार राज्यों के सेमीफाइनल मुकाबले में एक और राज्य का इजाफा हो गया। विपक्षी दल ऐसा कोई संकेत नहीं जाने देना चाहते थे कि केसीआर ने अपने दांव से उन्हें पस्त कर दिया है। 

यही वजह है कि कुछ ज्यादा ही तेजी दिखाते हुए यहां कांग्रेस, तेलुगूदेशम और सीपीआई के स्थानीय नेताओं ने आपसी बातचीत में तय कर लिया कि सीटों का बंटवारा होता रहेगा, लेकिन गठबंधन की घोषणा तुरंत कर दी जाए। विधानसभा चुनाव में सीटें बंटना कभी आसान नहीं होता, लेकिन सभी दलों का सर्वोच्च नेतृत्व गठबंधन का निर्णय ले चुका है तो यह करीब-करीब तय है कि वे साथ ही चुनाव लड़ेंगे। तेलंगाना में विपक्ष की इस एकजुटता के बाकी देश के लिए भी कुछ मायने हैं। खासकर तेलुगूदेशम पार्टी और कांग्रेस के साथ आने के, जिनकी टक्कर पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में होनी ही है। 

दूर-दूर तक किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि दोनों पार्टियां तेलंगाना चुनाव से पहले साथ आएंगी। मगर राजनीति में असामान्य चुनौतियों से निपटने के असामान्य तरीके अक्सर अपनाए जाते हैं। इससे पहले यूपी में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को साथ आते हम देख चुके हैं। धीरे-धीरे यह साफ होता जा रहा है कि आगामी चुनावों की चुनौती को विपक्ष भी किसी सामान्य चुनावी मुकाबले से ज्यादा गंभीरता से ले रहा है। हालांकि आम चुनाव अभी दूर हैं और तब तक राजनीति में बहुत सारे खेल-तमाशे देखने को मिल सकते हैं। 

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