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दिल्ली का विवाद Editorial page 14th June 2018

By: D.K Chaudhary

दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार और उप-राज्यपाल के बीच लंबे समय से चली आ रही खींचतान और जुबानी जंग जिस मुकाम पर पहुंच चुकी है, उसे जल्द ही किसी ठौर बैठना होगा। ताजा जंग दिल्ली सरकार की डोरस्टेप डिलिवरी की फाइल क्लियर करने और कथित तौर पर हड़ताल कर रहे सरकारी अफसरों पर विभागीय कार्रवाई की मांग को लेकर है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके कुछ मंत्री इसे लेकर कई दिनों से उप-राज्यपाल दफ्तर के स्वागत कक्ष में धरने पर बैठे हैं। दो मंत्री मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन तो भूख हड़ताल पर हैं। दिल्ली सरकार और उप-राज्यपाल के बीच विवाद की शुरुआत तत्कालीन उप-राज्यपाल नजीब जंग के समय में ही हो चुकी थी, जो अब मौजूदा उप-राज्यपाल अनिल बैजल तक नए-नए रूप में सामने आती रही है। सरकार आरोप लगाती है कि उप-राज्यपाल उसे ठीक से काम नहीं करने दे रहे और उसके हर अच्छे काम में रोड़े अटकाते हैं। उप-राज्यपाल इसे अपने अधिकारों का हनन बताते हैं और कहते हैं कि दिल्ली सरकार उन्हें सरपास करके काम करना चाहती है, जो नियमत: संभव नहीं है। हाल में मुख्य सचिव से मारपीट की कथित घटना के बाद नौकरशाही इस विवाद का तीसरा कोण बनकर उभरी है।

आम आदमी पार्टी की सरकार शुरू से ही अधिकारों यानी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग करती रही है और उसका मानना है कि बिना इसके दिल्ली का ठीक से विकास नहीं हो सकता। वह अपने कामकाज पर उप-राज्यपाल का संविधान प्रदत्त नियंत्रण बर्दाश्त नहीं कर पा रही और सीधे टकराव की मुद्रा में है। राज्यों और केंद्र सरकार के बीच टकराव कोई नई चीज नहीं है। राज्य अपनी उपेक्षा का आरोप लगाते रहे हैं और कई बार यह सच भी होता है। लेकिन दिल्ली के मामले में तो यह बात इसलिए भी सहज नहीं लगती कि दिल्ली की उपेक्षा आसान नहीं है। सच है कि दिल्ली में न तो पहली बार सरकार चल रही है, न ही पहली बार उप-राज्यपाल की व्यवस्था ईजाद हुई है। केंद्र शासित क्षेत्र होने के कारण इसे आसानी से बदला भी नहीं जा सकता। हां, एक बात जरूर है। आम आदमी पार्टी की सरकार और उसके नेता जिस पाश्र्वभूमि से आते हैं, संभव है कि कुछ नया करने के उत्साह में वे कुछ अतिरेकी हुए हों। एक नई पार्टी के इस तरह के उभार में पारंपरिक राजनीतिक दलों का गुणा-गणित भी कहीं न कहीं गड़बड़ाया होगा। ऐसे में, ‘राजनीति’ नहीं होगी, यह मानकर बैठना भी गलत होगा। यह भी सच है कि लोक व्यवस्था में उसके लोकाचारों के साथ कदम-ताल भी करना ही पड़ता है और संभव है ये लोकाचार किसी को रास न आ रहे हों। 

दिल्ली सरकार का विवाद आज जिस मोड़ तक पहुंच चुका है, उसमें तत्काल हस्तक्षेप कर रास्ता निकालने की जरूरत है। राजनीतिक अहं के टकराव में किसी को भी बहुत दूर जाने की इजाजत तो दी नहीं जा सकती। इस बात की तह में जाना भी जरूरी है कि यह महज एक नए मिजाज वाले दल की राजनीति का मामला है या इस नए मिजाज वाले दल के साथ शेष सभी की मिली-जुली मोर्चाबंदी से उपजी राजनीति का मामला। फैसला आसान नहीं है। हां, कुछ भी करने से पहले ठहरकर दिल्ली के मन की थाह लेना जरूरी है कि वह क्या चाहती है? कुल मिलाकर इतना तो तय है कि व्यापक जनहित में इस प्रकरण पर तत्काल विराम लगाने की जरूरत है।

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