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ट्रिपल तलाक अध्यादेश Editorial page 20th Sep 2018

By: D.K Chaudhary

संसद के मानसून सत्र में तीन तलाक बिल पास न हो पाने के बाद अब केंद्र सरकार ने दूसरा रास्ता निकाला है। कुल तीन संशोधनों के साथ कैबिनेट ने इस पर अध्यादेश को मंजूरी दी है। अब मार्च 2019 तक इसे ही कानून की तरह बरता जाएगा। छह महीने में सरकार को इसे संसद में पास कराना होगा। कुछ समय पहले केंद्र सरकार ने लोकसभा में इस आशय का जो बिल पास कराया था, उसके कुछ पहलुओं पर विवाद था। बिल में प्रावधान था कि केस कोई भी दर्ज करा सकता है और पुलिस खुद भी केस दर्ज करके बगैर वारंट के गिरफ्तारी कर सकती है। यह गैर जमानती संज्ञेय अपराध था, जिसमें समझौते का कोई प्रावधान नहीं था। 

इन प्रावधानों को लेकर सशंकित विपक्ष ने मांग की कि बिल को चयन समिति के पास भेजा जाए, ताकि इसके हर पहलू पर विचार हो सके। सरकार ने विपक्ष की यह मांग सिरे से खारिज कर दी। लेकिन अभी कैबिनेट ने जो अध्यादेश पास किया है, उसमें किए गए संशोधनों के मुताबिक पीड़िता या उसका कोई सगा रिश्तेदार ही केस दर्ज करा सकेगा, न कोई बाहरी व्यक्ति और न ही खुद से संज्ञान लेकर पुलिस। गिरफ्तारी तय है, लेकिन इसमें मजिस्ट्रेट को जमानत देने का अधिकार रहेगा। इसके अलावा मजिस्ट्रेट के सामने पति-पत्नी के आपसी समझौते का विकल्प भी खुला रहेगा। निश्चय ही मुस्लिम महिलाओं के लिए कानून की ही तरह यह अध्यादेश भी मील का पत्थर साबित होने वाला है। हां, इसके संज्ञेय अपराध बनाए जाने से कुछेक डर आज भी कायम हैं। जैसे, केस दर्ज होते ही तीन तलाक देने वाले को जेल हो जाएगी तो पीड़िता को गुजारा भत्ता कौन देगा? 

पति की संपत्ति कुर्क करने का रास्ता जरूर खुला है, लेकिन यह भी गुजारा-भत्ते की जिम्मेदारी तय करने जितना ही लंबा और घुमावदार है। ऐसे में पीड़िता की तकलीफ और बढ़ सकती है और उसे अलग तरह के उत्पीड़नों का सामना करना पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग के बावजूद पिछले दिनों देश के कई हिस्सों से एक-साथ तीन तलाक के मामलों में सामाजिक और दैहिक उत्पीड़न के कई समाचार आए। ऐसे में समाज के भीतर भी संवाद जारी रहना चाहिए, ताकि कट्टरपंथी तत्वों को सरकार विरोध का खोल ओढ़कर मुस्लिम समाज को पीछे ले जाने का मौका न मिले।

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