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जातीय जनगणना की ओर Editorial Page 04th Sep 2018

By: D.K Chaudhary

जनगणना में बैकवर्ड समुदायों से जुड़े आंकड़े शामिल करने की मांग स्वीकार करके सरकार ने आरक्षण की व्यवस्था को ज्यादा ठोस और तथ्यपरक आधार देने का रास्ता साफ कर दिया है। ध्यान रहे 1931 के बाद देश में ऐसी कोई जनगणना नहीं हुई जिसमें जाति संबंधी आंकड़े शामिल किए गए हों। जब वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों के मुताबिक अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) के लिए 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की, तभी से यह सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर इस आरक्षण सीमा का आधार क्या है। इसी अनिश्चितता को मुद्दा बनाते हुए ओबीसी समुदायों की ओर से भी यह मांग की जाती रही कि जनगणना में जाति संबंधी आंकड़े भी जुटाए जाएं। 

इन समुदायों का दावा है कि उनकी संख्या कुल आबादी के 50 फीसदी से भी ज्यादा है और इस लिहाज से 27 फीसदी आरक्षण काफी कम है। इन्हीं मांगों के प्रभाव में पिछली यूपीए सरकार के आदेशानुसार 2011-13 के दौरान सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना की गई, मगर इससे जुड़े आंकड़े अभी तक सार्वजनिक नहीं किए जा सके हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि जाति संबंधी ये आंकड़े इतने जटिल और विविधतापूर्ण हैं कि इन्हें वर्गीकृत करना संभव नहीं हो पा रहा। कहते हैं, इनमें 46 लाख तरह की जातियां व उपजातियां बताई गई हैं। ऐसी स्थिति से बचने के लिए 2021 में जनगणनाकर्मियों को पहले से ही वर्गीकृत फॉर्म सौंपे जाने की योजना है ताकि हर परिवार बगैर किसी उलझन के बता दे कि वह फॉर्म की किस कैटिगरी में आता है। बहरहाल, इसमें दो राय नहीं कि मोदी सरकार का यह कदम ओबीसी समुदाय के मन में उसके प्रति अविश्वास को कम कर सकता है। 

आखिर यूपीए सरकार जनगणना के जातीय अनुपात का वह सच देश के सामने नहीं ला सकी, जो यह समुदाय लाना चाहता था। मोदी सरकार इसकी राह खोलती दिख रही है। खास बात यह कि सरकार ने इस कदम को 2017 में गठित ओबीसी आयोग से भी जोड़ा है जिसे यह जांचने का काम सौंपा गया है कि ओबीसी समुदायों में किस हिस्से तक आरक्षण का कितना लाभ पहुंचा है और कौन सा हिस्सा इन लाभों से वंचित है। उम्मीद की जानी चाहिए कि ये कदम आरक्षण की व्यवस्था को ज्यादा तर्कसंगत बनाने में मददगार होंगे।

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