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छोटा कारोबार बचाएं Editorial page 5th Nov 2018

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) के लिए जिस धमाकेदार दिवाली तोहफे का ऐलान किया, उसके साथ यह राहत का भाव जुड़ा है कि अर्से बाद सरकार छोटे कारोबारियों की फिक्र करती नजर आई है। आज भी भारत में सबसे ज्यादा नौकरियां इसी सेक्टर में मिलती हैं, लिहाजा एमएसएमई का हाल सुधरेगा तो रोजगार के मोर्चे पर भी खुशहाली दिखेगी। लेकिन सवाल यही है कि सरकार की इस चिंता का क्या सचमुच कुछ फायदा इस सेक्टर को मिल पाएगा? प्रधानमंत्री की घोषणाएं पहली नजर में आकर्षक लगती हैं। 

आईएल एंड एफएस के संकट में पड़ने के बाद एनबीएफसी (नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनीज) फंडिंग का स्रोत सूखने का बुरा असर एमएसएमई यूनिटों पर पड़ा है। उनके लिए फंड हासिल करना बहुत मुश्किल हो गया है। ऐसे में एक करोड़ तक के लोन 59 मिनट में दिलवाने का प्रधानमंत्री का आश्वासन काफी मायने रखता है। सरकारी खरीद में 20 फीसदी के बजाय 25 फीसदी हिस्सा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों लिए आरक्षित किया जाना और जीएसटी भरने वाली एमएसएमई यूनिटों को टैक्स में 2 फीसदी तक की छूट भी मायने रखती है। लेकिन क्या ये घोषणाएं इस संकटग्रस्त सेक्टर के लिए संजीवनी का काम कर पाएंगी? 

जिस सबसे बड़ी चुनौती से छोटे कारोबारी जूझ रहे हैं, वह यह है कि बाजार में उनका माल नहीं निकल रहा है। बड़े उद्योगों और बड़ी पूंजी ने खुले बाजार और खुली होड़ का फायदा उठाकर इन्हें मैदान से बाहर कर दिया है। यह पूरा सेक्टर अभी या तो सरकारी खरीद के सहारे टिका है (जो दिनोंदिन कम होती जा रही है), या फिर बड़ी कंपनियों की सब्सिडियरी जरूरतें पूरी कर रहा है। इन बड़ी कंपनियों को जब भी बाजार में अपने माल की खपत डगमगाती दिखती है, सबसे पहले वे सबसिडियरी कंपनियों के ऑर्डर रोकती हैं और उनका भुगतान टाल देती हैं। ऐसे में आसानी से लोन मिल भी जाए तो क्या कोई छोटा-मंझोला कारोबारी सिर्फ सरकारी खरीद के आश्वासन पर नई फैक्टरी डाल देगा? 

हां, कोई महत्वाकांक्षी युवक ज्यादा छानबीन के बगैर एक करोड़ रुपये का लोन पा ले तो इससे अपने नाम पर लोन निकालने की इच्छा रखने वाले अन्य युवा जरूर प्रोत्साहित होंगे। मगर वे लोन लेने के बाद उसका करेंगे क्या, अगर बाजार में उनके प्रॉडक्ट के लिए लंबे समय की संभावनाएं ही नदारद हों? ये कर्जे नए एनपीए की शक्ल लेकर बैंकों के गले का पत्थर न बन जाएं, इस पर भी सरकार को समय रहते सोच लेना चाहिए। 

सरकार की पहल अच्छी है, लेकिन इसके लिए बहुत देर हो चुकी है। पांच विधानसभा चुनावों के साथ ही देश में आम चुनाव का माहौल बनना शुरू हो गया है। नोटबंदी और जीएसटी के बाद विशेष रूप से गड्ढे में गए एमएसएमई सेक्टर के पुनर्जीवन के लिए जिस सुचिंतित प्रयास की जरूरत है, वह इतनी हड़बड़ी में शायद ही हो पाए। 

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