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गिरफ्तारी पर सवाल Editorial page 2nd Sep 2018

By: D.K Chaudhary

बहुचर्चित भीमा-कोरेगांव मामले में जिस तरह से पुणे पुलिस ने अलग-अलग शहरों में छापेमारी कर पांच जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया, उससे कुछ सवाल खड़े हो गए। यह अकारण नहीं है कि रोमिला थापर, प्रभात पटनायक, देवकी जैन, सतीश देशपांडे और माजा दारूवाला जैसे देश के जाने-माने बुद्धिजीवी और मानवाधिकार कार्यकर्ता इस मामले में आगे आए और इन गिरफ्तारियों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। गौर करने की बात है कि गिरफ्तारी के बाद मीडिया को जिस तरह से ब्रीफ किया गया, उसमें भी काफी अनिश्चितता रही। इसका नतीजा यह हुआ कि इन गिरफ्तारियों को ‘शहरी नक्सली तंत्र’ से लेकर प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश तक से जोड़ा जाने लगा। अगले दिन सुप्रीम कोर्ट में पुलिस के हलफनामे से ही यह साफ हो सका कि मामला भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा से संबंधित है। हत्या की साजिश में शामिल होने का आरोप कितना पुख्ता है, इसकी जांच अभी होनी है। अदालतें उपलब्ध साक्ष्यों की रोशनी में तय प्रक्रिया के अनुरूप इस जांच को आगे बढ़ाएंगी। लेकिन जांच इस बात की भी होनी चाहिए कि पुलिस ने इन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई। सुप्रीम कोर्ट ने अगर पांचों आरोपियों को फिलहाल उनके घर में ही नजरबंद रखने की व्यवस्था दी है तो इसके पीछे उसका मकसद इस बात को लेकर पूरी तसल्ली कर लेना है कि इन पांचों की गिरफ्तारी केस की जांच के लिए कितनी जरूरी है।

अदालत ने असहमति को लोकतंत्र के लिए सेफ्टी वॉल्व जितना जरूरी बताते हुए यह स्पष्ट किया कि पुलिस किसी भी सूरत में इस तरह काम न करे, जिससे लगे कि उसका इस्तेमाल असहमति की आवाज को दबाने के लिए हो रहा है। इस मामले से जुड़े तथ्य अदालत के विचाराधीन हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस-प्रशासन को नागरिक अधिकारों के संबंध में सावधान करने की जरूरत महसूस की है तो उसकी इस बात को हमें पूरी गंभीरता से लेना चाहिए। जिस तरह देश के गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू इन गिरफ्तारियों के बचाव में खुद सामने आए और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को नक्सलियों का समर्थन न करने की हिदायत दी, वह खुद में एक चकित करने वाली बात है। अभी इस बात की जांच भी नहीं हुई है कि इन कार्यकर्ताओं के नक्सलियों से संबंध हैं या नहीं, और हैं तो किस तरह के। नक्सली हिंसा से निपटना, उसके कारणों को निर्मूल करना और इसमें शामिल लोगों को देश की मुख्यधारा में लाना सरकारों का दायित्व है। लेकिन ऐसा करते हुए खासकर केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि भारत जैसे परिपक्व लोकतंत्र में किसी पुलिस एक्शन से भय और संदेह का वातावरण न बनने पाए। इमर्जेंसी के दौरान लंबी लड़ाई लड़कर इस देश ने अपने नागरिक अधिकार गारंटी किए हैं। सरकारों के लिए उनकी रखवाली का काम भी देश का जीडीपी बढ़ाने जितना ही जरूरी होना चाहिए।

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