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अप्रत्याशित दलबदल (Editorial page) 13th March 2018

By: D.K Chaudhary

अपने बेतुके बयानों और अभद्र टिप्पणियों के लिए चर्चा में रहने वाले नरेश अग्रवाल जिस आसानी के साथ समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा में प्रवेश कर गए, वह निश्चित ही अप्रत्याशित है। नरेश अग्रवाल के भाजपा में आगमन से यही पता चला कि मौकापरस्त नेताओं के लिए किस तरह हर दल में जगह है और यहां तक कि उस दल में भी जो चाल, चरित्र और चेहरे की बात करता है। क्या भाजपा इस तरह औरों से अलग दल की अपनी छवि का निर्माण करेगी? 

आम जनता और साथ ही खुद भाजपा समर्थकों के लिए यह समझना कठिन होगा कि नरेश अग्रवाल जैसे नेता का हाथ थामकर पार्टी ऐसा क्या हासिल करने वाली है कि उसने अपनी छवि को दांव पर लगाने का काम किया? क्या वह सपा के विधायकों की बड़ी टोली के साथ आए हैं या फिर उनके सहयोग से भाजपा उत्तर प्रदेश में विपक्ष के हिस्से की भी राज्यसभा सीटें जीतने जा रही है? इस पर हैरानी नहीं कि भाजपा की सदस्यता ग्रहण करते समय भी नरेश अग्रवाल बेतुके बोल बोलने से बाज नहीं आए। उन्होंने खुद को जया बच्चन से बड़ा नेता साबित करने के फेर में उनके प्रति अभद्र टिप्पणी कर डाली। इससे यही साबित हुआ कि उन्हें भाजपा की रीति-नीति से कोई मतलब नहीं है। वैसे भी यह किसी से छिपा नहीं कि अभी कल तक भाजपा, मोदी सरकार और उसकी नीतियों के बारे में उनके विचार कैसे थे? लगता है नरेश अग्रवाल को अपना बनाने की आतुरता में भाजपा भी उन्हें ऐसी कोई नसीहत देना भूल गई कि कम से कम अब तो वह अपनी जबान पर काबू रखें। सुषमा स्वराज को इसके लिए साधुवाद कि उन्होंने नरेश अग्रवाल को झिड़का और दोटूक कहा कि उनकी अमर्यादित भाषा अस्वीकार्य है। हालांकि इसमें संदेह है कि इस हिदायत का उन पर कुछ असर होगा, लेकिन इतना अवश्य है कि भाजपा के लिए इस सवाल का जवाब देना मुश्किल होगा कि वह राजनीतिक शुचिता और मर्यादा की बातें किस संदर्भ में किया करती है?
लोकतंत्र में न केवल नेताओं की छवि का, बल्कि इसका भी महत्व होता है कि किसी नेता के बारे में जनता क्या सोचती है! हालांकि राजनीतिक दल इससे अच्छी तरह परिचित हैं कि राजनीति में छवि और धारणा असर करती है, लेकिन सियासी फायदे के फेर में वे अक्सर लोकलाज की परवाह नहीं करते। यह और कुछ नहीं, जनता का निरादर ही है। कई बार यह निरादर महंगा पड़ता है। भाजपा को यह विस्मृत नहीं करना चाहिए कि जब उसने बसपा से निकाले गए बाबूसिंह कुशवाहा को गले लगाया था तो किस तरह उसे निंदा का पात्र बनना पड़ा था और इसके चलते उनकी सदस्यता को स्थगित करना पड़ा था। 

माना कि आज की राजनीति में नीति एवं निष्ठा की कोई अहमियत नहीं रह गई है और तात्कालिक राजनीतिक लाभ ही सर्वोपरि हो गया है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि आयाराम-गयाराम की पराकाष्ठा होने लगे। भाजपा यह ध्यान रखे तो बेहतर कि जैसे सवाल दलबदल में महारत हासिल कर चुके नरेश अग्रवाल को लेकर उठ रहे हैं, वैसे ही महाराष्ट्र के नेता नारायण राणे को लेकर भी उठे हैं।

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